वो नेता जिसने पहले पर्दे के पीछे रहकर लगाई ‘आग’, फिर बन गया मुख्यमंत्री, जानिए सियासत ‘कलाईनार’ की कहानी
M Karunanidhi Birthday: एम करुणानिधि के 102वें जन्मदिन पर जानिए कैसे फिल्मों के दमदार डायलॉग्स और द्रविड़ आंदोलन के जरिए उन्होंने तमिलनाडु की राजनीति के शिखर तक का सफर तय किया।
- Written By: अक्षय साहू
एम. करुणानिधि की 102वीं वर्षगांठ (सोर्स- सोशल मीडिया)
M Karunanidhi Birth anniversary: तमिलनाडु में फिल्मी सितारों का राजनीति में आना और फिर तेजी से चमकना कोई नई बात नहीं है। पहले एमजी रामचंद्रन (MGR) और जयललिता फिल्मों से राजनीति में आए और राज्य के मुख्यमंत्री बने और अब वहीं कारमाना थलापति विजय ने कर दिखाया है। लेकिन इसकी शुरुआत नही ही MGR ने की थी और न ही जयललिता ने बल्कि इस सिलसिले को मुथुवेल करुणानिधि यानी (एम करुणानिधि) ने शुरू किया था।
करुणानिधि राजनीति में आने से पहले फिल्म के स्क्रीनप्ले और संवाद लिखते थे। पेरियार और अन्नादुरई के द्रविड़ आंदोलन को अपनी प्रेरणा मानने वाले करुणानिधि की लिखी फिल्मों में इसकी झलक साफ दिखाई देती है। तमिल फिल्म इंडस्ट्री में उनका कद इतना बड़ा था कि फिल्मों के पोस्ट पर हीरो-हिरोइन का नाम बाद में लिखा जाता था करुणानिधि का नाम पहले लिखा जाता था। आज उनका 102वें जन्मदिन के मौक पर हम आपको बताते हैं कि एक आम परिवार में जन्में लड़के ने कैसे तमिलनाडु के घर में अपनी पहचान बनाई और राज्य का मुख्यमंत्री बना गया।
लोगों ने प्यार दिया कलाईनार का नाम
एम करुणानिधि का जन्म तमिलनाडु (मद्रास प्रैज़िडन्सी) के तिरुक्कुरल में 1924 में एक आम परिवार में हुआ था। यह वो दौर था जब पूरे मद्रास में द्रविड़ आंदोलन अपने चरम पर था। करुणानिधि पर भी इसका असर जल्द ही पड़ा। कहा जाता है कि उन्होंने अपनी स्कूली शिक्षा के दौरान की हिंदी थोपे जाने का विरोध करना शुरू कर दिया था। इस दौरान ही उन्होंने अपने हाथ से लिखकर छोटी पत्रिका निकाला शुरू किया। यही पत्रिका आगे चलकर “मुरासोली” अखबार बनी, जो बाद में डीएमके की आवाज बन गई।
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करुणानिधि को मिला कलाईनार नाम (सोर्स- सोशल मीडिया)
करुणानिधि को लोग लोग प्यार से ‘कलाईनार’ कहते थे, जिसका अर्थ है ‘कला का ज्ञाता’। यह नाम उन्हें राजनीति में आने से पहले की फिल्मों और संवादों के लिए दिया गया था। जिसने उनकी ऐसी पहचान बनाई कि वो आगे चलकर राजनीति के शिखर तक पहुंचे।
पराशक्ति के डायलॉग से घर-घर में बनाई पहचान
करुणानिधि ने 1940 के दशक के उत्तरार्द्ध में तमिल फिल्मों के लिए लिखना शुरू किया। लेकिन उन्हें असली पहचान 1952 में आई फिल्म पराशक्ति से मिली। इस फिल्म ने सिर्फ कमाई के मामले में कई रिकॉर्ड बनाए बल्कि इसने करुणानिधि को तमिलनाडु के घर-घर तक पहुंचा दिया।
पराशक्ति के संवादों से घर-घर पहुंचे करुणानिधि (सोर्स- सोशल मीडिया)
फिल्म में सामाजिक कुरीतियों, अंधविश्वास और भेदभाव पर तीखे प्रहार किए गए थे। उस दौर में इन संवादों को लेकर काफी विवाद हुआ, लेकिन जनता ने उन्हें हाथों-हाथ लिया। कहा जाता है कि आने वाले सालों में इस फिल्म के डायलॉग तमिल सिनेमा में घुसने का रास्ता बन गए थे। रजनीकांत और कमल हासन जैसे बड़े सितारों को भी अपनी पहली फिल्म पाने के लिए ऑडिशन में पराशक्ति के ही डायलॉग बोलने को मिले थे।
हमेशा साथ लेकर चलते थे पेन और नोटबुक
करुणानिधि के बारे में एक मशहूर किस्सा है कि वे जहां भी जाते, अपने साथ एक नोटबुक और पेन जरूर रखते थे। चाहे देर रात हो या लंबी यात्रा, कोई विचार आते ही उसे लिख लेते थे। कई बार उनके भाषण, कविताएं और फिल्मी संवाद इसी तरह अचानक जन्म लेते थे। यही वजह थी कि उन्होंने हजारों पन्नों का साहित्य और सैकड़ों भाषण तैयार किए।
हमेशा पेन और नोटबुक अपने पास रखते थे करुणानिधि (सोर्स- सोशल मीडिया)
एमजीआर से दोस्ती और फिर दुश्मनी
उनकी जिंदगी का एक बड़ा हिस्सा एमजीआर के साथ जुड़ा रहा। एक समय दोनों बहुत अच्छे दोस्त थे। एमजीआर फिल्मों के सुपरस्टार थे और करुणानिधि द्रविड़ मुन्नेत्र कड़गम (DMK) के रणनीतिकार। लेकिन बाद में दोनों के रास्ते अलग हो गए और तमिलनाडु की राजनीति में दशकों तक चली सबसे बड़ी प्रतिद्वंद्विता की शुरुआत हुई। चुनावी मंचों पर दोनों एक-दूसरे के खिलाफ खड़े थे, लेकिन निजी जीवन में अक्सर एक-दूसरे के प्रति सम्मान बनाए रखते थे।
एमजीआर से रही पहलाी दोस्ती और फिर दुश्मनी (सोर्स- सोशल मीडिया)
दोनों की दुश्मनी की शुरुआत 1969 में तब हुई जब तमिलनाडु के तत्कालीन मुख्यमंत्री सीएन अन्नादुरई का निधन हो गया। एमजीआर क्योंकि तब बहुत बड़े सुपर स्टार थे और उन्हें लगता था कि अन्नादुरई के निधन के बाद सीएम की कुर्सी उन्हें ही मिलनी चाहिए क्योंकि वो उन्हें पार्टी को जीत दिलाने के लिए अहम भूमिका भी निभाई थी।
नाराज एमजीआर ने बनाई नई पार्टी
हालांकि, पार्टी में करुणानिधि की पकड़ एमजीआर से ज्यादा थी। जिसका फायदा उठाते उन्होंने न सिर्फ खुद को अन्नादुरई का उत्तराधिकारी घोषित किया साथ मुख्यमंत्री भी बन गए। करुणानिधि के मुख्यमंत्री बनते ही एमजीआर की ताकत पार्टी में कम होने लगी। इसके बाद एमजीआर ने 1972 में अपनी नई पार्टी बनाकर अखिल भारतीय अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (AIADMK) बनाकर खुद को अन्नादुरई का असली उत्तराधिकारी बताया। इसके साथ दोनों के बीच दोस्ती खत्म हो गई और सालों तक इनके बीच राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता चलती रही।
