लोकसभा (Image- Social Media)
Lok Sabha Delimitation 2026 Explained: पिछले 50–55 वर्षों में भारत की जनसंख्या में तेज़ वृद्धि हुई है। 1971 में यह करीब 54 करोड़ थी, जो 2026 तक बढ़कर लगभग 142 करोड़ पहुंच गई यानी करीब 163% की बढ़ोतरी। लेकिन इसके मुकाबले लोकसभा की सीटों की संख्या लगभग स्थिर ही रही और आज भी 543 के आसपास है।
अब सरकार इस असंतुलन को दूर करने के लिए लोकसभा का आकार बढ़ाने की योजना पर काम कर रही है। इसके तहत एक संविधान संशोधन विधेयक लाया गया है, जिसमें सीटों की अधिकतम संख्या 550 से बढ़ाकर 850 करने का प्रस्ताव है। यह बदलाव नारी शक्ति वंदन अधिनियम को लागू करने से भी जुड़ा हुआ है, जिसके तहत 33% सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित की जानी हैं।
प्रस्ताव के अनुसार:
इसके साथ ही परिसीमन की प्रक्रिया लागू होगी, जिसके जरिए सीटों का पुनर्वितरण और सीमाओं का निर्धारण किया जाएगा। प्रस्तावित एक अन्य कानून, परिसीमन विधेयक 2026, एक ऐसे आयोग के गठन का प्रावधान करता है जो राज्यों के बीच लोकसभा सीटों का बंटवारा करेगा, निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाएं दोबारा तय करेगा और अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति तथा महिलाओं के लिए सीटों का आरक्षण सुनिश्चित करेगा।
हालांकि, सीटों के आवंटन का स्पष्ट फॉर्मूला अभी तय नहीं किया गया है, लेकिन दो संभावित तरीके सामने आते हैं, राज्यों को उनके मौजूदा प्रतिशत हिस्से के आधार पर सीटें मिलती रहें या फिर जनसंख्या के अनुपात में सीटों का पुनर्वितरण किया जाए।
विधेयक के अनुसार, आयोग नवीनतम प्रकाशित जनगणना के आंकड़ों का उपयोग करेगा, जिससे 2011 की जनगणना को आधार बनाए जाने की संभावना है। उदाहरण के तौर पर, उत्तर प्रदेश के पास वर्तमान में 80 सीटें हैं, जो कुल 543 सीटों का लगभग 14.7% हिस्सा है। यदि यही प्रतिशत बरकरार रखा जाता है, तो 850 सदस्यीय लोकसभा में इसकी सीटें बढ़कर करीब 124 हो सकती हैं। वहीं, अगर 2011 की जनगणना के आधार पर सीटों का बंटवारा होता है, तो यह संख्या लगभग 138 तक पहुंच सकती है।
सीटों के आवंटन का फॉर्मूला (AI)
इसी तरह, केरल के पास अभी 20 सीटें हैं। यदि उसका मौजूदा हिस्सा बना रहता है, तो यह संख्या बढ़कर लगभग 31 हो सकती है, लेकिन जनसंख्या आधारित वितरण में यह केवल करीब 23 सीटों तक ही पहुंच पाएगी।
850 सीटों वाली लोकसभा में राज्यों के बीच सीटों का बंटवारा किस तरह होगा, इसे समझाने के लिए टेबल के माध्यम से दोनों संभावित स्थितियों के अनुमान दिखाए गए हैं…
| राज्य | वर्तमान सीटें | मौजूदा हिस्सेदारी प्रोजेक्शन | बदलाव | 2011 जनगणना प्रोजेक्शन | बदलाव |
|---|---|---|---|---|---|
| उत्तर प्रदेश | 80 | 124 | +44 | 138 | +58 |
| महाराष्ट्र | 48 | 75 | +27 | 78 | +30 |
| पश्चिम बंगाल | 42 | 65 | +23 | 63 | +21 |
| बिहार | 40 | 62 | +22 | 72 | +32 |
| तमिलनाडु | 39 | 61 | +22 | 50 | +11 |
| मध्य प्रदेश | 29 | 45 | +16 | 50 | +21 |
| कर्नाटक | 28 | 43 | +15 | 42 | +14 |
| गुजरात | 26 | 40 | +14 | 42 | +16 |
| आंध्र प्रदेश | 25 | 39 | +14 | 34 | +9 |
| राजस्थान | 25 | 39 | +14 | 47 | +22 |
| ओडिशा | 21 | 33 | +12 | 29 | +8 |
| केरल | 20 | 31 | +11 | 23 | +3 |
| तेलंगाना | 17 | 26 | +9 | 24 | +7 |
| असम | 14 | 22 | +8 | 21 | +7 |
| झारखंड | 14 | 22 | +8 | 23 | +9 |
| पंजाब | 13 | 20 | +7 | 19 | +6 |
| छत्तीसगढ़ | 11 | 17 | +6 | 18 | +7 |
| हरियाणा | 10 | 16 | +6 | 17 | +7 |
| दिल्ली | 7 | 13 | +6 | 16 | +9 |
| जम्मू-कश्मीर | 5 | 9 | +4 | 12 | +7 |
| उत्तराखंड | 5 | 8 | +3 | 7 | +2 |
| हिमाचल प्रदेश | 4 | 6 | +2 | 5 | +1 |
| अरुणाचल प्रदेश | 2 | 3 | +1 | 2 | 0 |
| गोवा | 2 | 3 | +1 | 2 | 0 |
| मणिपुर | 2 | 3 | +1 | 2 | 0 |
| मेघालय | 2 | 3 | +1 | 2 | 0 |
| त्रिपुरा | 2 | 3 | +1 | 2 | 0 |
| अंडमान एवं निकोबार | 1 | 2 | +1 | 1 | 0 |
| चंडीगढ़ | 1 | 2 | +1 | 1 | 0 |
| दादरा एवं नगर हवेली | 1 | 2 | +1 | 1 | 0 |
| दमन और दीव | 1 | 2 | +1 | 1 | 0 |
| लक्षद्वीप | 1 | 1 | 0 | 1 | 0 |
| मिजोरम | 1 | 2 | +1 | 1 | 0 |
| नगालैंड | 1 | 2 | +1 | 1 | 0 |
| पुदुचेरी | 1 | 2 | +1 | 1 | 0 |
| सिक्किम | 1 | 2 | +1 | 1 | 0 |
| लद्दाख | 1 | 2 | +1 | 1 | 0 |
अगर 2011 की जनगणना के आंकड़ों को आधार बनाया जाता है, तो दक्षिण भारत के पांच राज्यों जैसे तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना—की कुल लोकसभा सीटें बढ़कर लगभग 173 हो सकती हैं, यानी करीब 44 सीटों का इज़ाफा। वहीं, ज्यादा जनसंख्या वृद्धि वाले राज्यों उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश और राजस्थान—की सीटें बढ़कर करीब 307 तक पहुंच सकती हैं, जो 133 सीटों की वृद्धि होगी।
इस मुद्दे पर एम. के. स्टालिन ने इसे “दक्षिणी राज्यों पर थोपा गया एक बड़ा ऐतिहासिक अन्याय” बताया। वहीं रेवंत रेड्डी ने प्रधानमंत्री को लिखे पत्र में कहा कि दक्षिणी राज्यों का आर्थिक योगदान ज्यादा होने के बावजूद संसद में उनकी आवाज कमजोर हो सकती है, जबकि अधिक जनसंख्या वृद्धि वाले राज्यों को disproportionate फायदा मिलेगा। उन्होंने सीटों के बंटवारे के लिए एक वैकल्पिक फॉर्मूला भी सुझाया, जिसमें राज्यों के आर्थिक योगदान को भी शामिल करने की बात कही गई।
पिछले 50 वर्षों में भारत की जनसंख्या 2.5 गुना से ज्यादा बढ़ चुकी है, लेकिन यह वृद्धि सभी राज्यों में समान नहीं रही। राजस्थान, बिहार, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में 1971 से 2027 के बीच जनसंख्या में लगभग 190% से 220% तक वृद्धि का अनुमान है। इसके विपरीत, केरल में करीब 70% और तमिलनाडु में लगभग 88% वृद्धि का अनुमान है। कर्नाटक में 137% और अविभाजित आंध्र प्रदेश में करीब 113% वृद्धि अनुमानित है।
AI Image
दक्षिण भारत में जनसंख्या वृद्धि अपेक्षाकृत कम रही है, जिसका असर प्रतिनिधित्व पर साफ दिखता है। राजस्थान में एक सांसद औसतन करीब 33 लाख लोगों का प्रतिनिधित्व करता है
जबकि केरल में एक सांसद लगभग 18 लाख लोगों का प्रतिनिधित्व करता है। यानी अलग-अलग राज्यों में एक सांसद के हिस्से आने वाली आबादी में बड़ा अंतर है, जो लोकसभा सीटों के पुनर्वितरण की बहस का मुख्य कारण बना हुआ है।
राज्यों के बीच निर्वाचन क्षेत्रों की जनसंख्या में बढ़ता अंतर लंबे समय से भारत के लिए एक गंभीर राजनीतिक चुनौती बना हुआ है, और इसकी एक बड़ी वजह 1970 के दशक से परिसीमन पर लगी रोक रही है। सरल शब्दों में, परिसीमन का मतलब निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं को दोबारा तय करना होता है।
इसका उद्देश्य हर 10 साल में जनगणना के बाद यह प्रक्रिया पूरी करना था, ताकि जनसंख्या में हुए बदलावों के अनुसार सीटों का बंटवारा किया जा सके। इसका मूल विचार यह था कि सभी राज्यों को उनकी आबादी के अनुपात में सीटें मिलें और हर सांसद लगभग समान संख्या में लोगों का प्रतिनिधित्व करे।
यह व्यवस्था संविधान के अनुच्छेद 81 और 82 के तहत अनिवार्य की गई है। अनुच्छेद 81 कहता है कि राज्यों के बीच सीटों और जनसंख्या का अनुपात यथासंभव समान होना चाहिए, जबकि अनुच्छेद 82 के अनुसार हर जनगणना के बाद लोकसभा सीटों का पुनः निर्धारण होना चाहिए।
इंदिरा गांधी (Image- Social Media)
हालांकि, 1976 में संविधान के 42वें संशोधन के जरिए इस प्रक्रिया को अस्थायी रूप से रोक दिया गया था, ताकि राज्यों को जनसंख्या नियंत्रण के लिए समय मिल सके। बाद में 2002 में 84वें संशोधन के तहत इस रोक को 2026 तक बढ़ा दिया गया, जिससे परिसीमन को अगली जनगणना तक टाल दिया गया।
अब प्रस्तावित विधेयक में कहा गया है कि परिसीमन “नवीनतम प्रकाशित जनगणना” के आधार पर किया जा सकता है, यानी 2011 की जनगणना के आंकड़ों का इस्तेमाल भी संभव है। वहीं 2021 की जनगणना टलने के बाद अब 2027 में नई जनगणना कराने की योजना है, जिसका पहला चरण शुरू हो चुका है।
परिसीमन लंबे समय तक न होने और अलग-अलग राज्यों में जनसंख्या वृद्धि की असमान दर के कारण प्रतिनिधित्व में असंतुलन पैदा हो गया है। कुछ राज्यों का प्रतिनिधित्व उनकी आबादी की तुलना में कम है, जबकि कुछ का अधिक।
विशेषज्ञों के अनुसार, दक्षिण भारत के कई राज्यों ने बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं, शिक्षा और परिवार नियोजन के कारण जनसंख्या वृद्धि को नियंत्रित किया है, जिसके चलते वहां अपेक्षाकृत अधिक प्रतिनिधित्व की स्थिति बन गई है। वहीं उत्तर भारत के कुछ राज्यों में जनसंख्या तेजी से बढ़ी है, लेकिन उनके पास उस अनुपात में सीटें नहीं बढ़ीं।
सांकेतिक तस्वीर (Image- Social Media)
ऐसे में यदि लोकसभा की मौजूदा 543 सीटों का पुनर्वितरण किया जाता है, तो दक्षिणी राज्यों को अपनी कुछ सीटें खोनी पड़ सकती हैं, जबकि अधिक जनसंख्या वृद्धि वाले राज्यों को फायदा हो सकता है।
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इसी कारण दक्षिण भारत के कई नेताओं ने चिंता जताई है कि जनसंख्या नियंत्रण के प्रयासों का उल्टा असर उनके प्रतिनिधित्व पर पड़ सकता है। उनका कहना है कि सीटों में कोई भी बदलाव इस तरह होना चाहिए कि राज्यों का मौजूदा अनुपात बना रहे और उनकी राजनीतिक आवाज कमजोर न हो।