सुप्रीम कोर्ट-नेपथ्य में कर्नाटक हाई कोर्ट (डिजाइन फोटो)
Supreme Court: सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को एक अहम फैसला सुनाया। कोर्ट ने कहा कि अगर कोई व्यक्ति परीक्षा में आरक्षित श्रेणी का फायदा उठाता है, तो वह अनारक्षित यानी सामान्य श्रेणी में नियुक्ति का दावा नहीं कर सकता। सर्वोच्च अदालत के इस फैसले को बेहद अहम माना जा रहा है।
बीते कल यानी मंगलवार 6 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट ने यूनियन ऑफ इंडिया बनाम जी. किरण और अन्य के मामले की सुनवाई की। सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने कहा कि अगर परीक्षा के किसी भी चरण में छूट का फायदा उठाया जाता है, तो उसे बाद के चरणों में नज़रअंदाज नहीं किया जा सकता।
हाल ही में 19 दिसंबर को राजस्थान के एक मामले में भी सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया था कि अगर कोई आरक्षित श्रेणी का उम्मीदवार बिना किसी छूट या फायदे के सामान्य श्रेणी के उम्मीदवार से बेहतर प्रदर्शन करता है तो उसे सरकारी नौकरियों के लिए सामान्य श्रेणी का प्रतियोगी माना जाएगा।
जी. किरण मामले में केंद्र सरकार ने कर्नाटक हाई कोर्ट के आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। सुप्रीम कोर्ट ने याचिका स्वीकार कर ली। 6 जनवरी को सुनवाई में जस्टिस जे.के. माहेश्वरी और विजय बिश्नोई की बेंच ने हाई कोर्ट के आदेश को रद्द कर दिया।
अपने लिखित आदेश में जस्टिस जे.के. माहेश्वरी ने कहा कि इंडियन फॉरेस्ट सर्विस (IFS) एक इंटीग्रेटेड चयन प्रक्रिया है जिसके दो अनिवार्य चरण हैं। मुख्य परीक्षा में बैठने के लिए प्रारंभिक परीक्षा पास करना एक अनिवार्य शर्त है। इसलिए प्रारंभिक चरण में ली गई किसी भी छूट को बाद के चरणों में नज़रअंदाज नहीं किया जा सकता।
यह मामला कर्नाटक से जुड़ा है। 2013 में इंडियन फॉरेस्ट सर्विस परीक्षा दो चरणों में आयोजित की गई थी। सामान्य श्रेणी के लिए कट-ऑफ 267 था, जबकि छूट के साथ अनुसूचित जाति के उम्मीदवारों के लिए कट-ऑफ 233 था। अनुसूचित जाति से संबंधित जी. किरण ने छूट वाले कट-ऑफ का फायदा उठाया और कुल 247.18 अंक हासिल किए। दूसरी ओर सामान्य श्रेणी के एंटनी एस. मारियाप्पा ने 270.68 अंक हासिल किए।
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अंतिम मेरिट सूची में जी. किरण को 19वीं रैंक और एंटनी को 37वीं रैंक मिली। हालांकि, मामला कैडर आवंटन में फंस गया। कर्नाटक में केवल एक सामान्य इनसाइडर पद खाली था और कोई अनुसूचित जाति इनसाइडर पद उपलब्ध नहीं था। इस संबंध में केंद्र सरकार ने एंटनी को कर्नाटक कैडर आवंटित किया।
दूसरी तरफ जी किरण भी वही कैडर चाहते थे। इसके बजाय उन्हें पड़ोसी राज्य तमिलनाडु का कैडर दिया गया। जी. किरण ने सेंट्रल एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल (CAT) और कर्नाटक हाई कोर्ट में सरकार के फैसले को चुनौती दी थी। दोनों कोर्ट ने जी. किरण के ऊंचे रैंक की वजह से उनके पक्ष में फैसला सुनाया था। अब देश की सबसे बड़ी अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट ने कर्नाटक हाई कोर्ट के फैसले को पलट दिया है।