

Lal Bahadur Shastri Biography: भारत के दूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री का जीवन आज भी लाखों भारतीयों को प्रेरित करता है। सादगी, त्याग और अटूट संकल्प की मिसाल रहे शास्त्री जी का जन्म 2 अक्टूबर 1904 को उत्तर प्रदेश के मुगलसराय में एक साधारण ब्राह्मण परिवार में हुआ था।
चार साल की उम्र में उन्होंने मुगलसराय के ईस्ट सेंट्रल रेलवे इंटर कॉलेज में दाखिला लिया, जहां मौलवी बुधन मियां उनके पहले शिक्षक बने। बनारस के हरिश्चंद्र हाई स्कूल में अपने शिक्षक निष्कामेश्वर प्रसाद मिश्र के प्रभाव से वे स्वतंत्रता संग्राम की ओर आकर्षित हुए।
महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन (1921) ने उनकी अंतरात्मा को गहराई से झकझोर दिया। उन्होंने ब्रिटिश शासन के विरोध में स्थापित राष्ट्रीय संस्थान 'काशी विद्यापीठ' में भी दाखिला लिया। वहां उन्होंने दर्शनशास्त्र और नीतिशास्त्र में प्रथम श्रेणी के साथ स्नातक किया और 'शास्त्री' की उपाधि प्राप्त की।
लाल बहादुर शास्त्री ने स्वतंत्रता संग्राम में अहम भूमिका निभाई। वे 1921 में कांग्रेस पार्टी से जुड़े और गांधीजी के नमक सत्याग्रह (1930) में सक्रिय रूप से भाग लिया। उन्होंने ब्रिटिश जेलों में कुल नौ साल बिताए और पश्चिमी दार्शनिकों, क्रांतिकारियों और समाज सुधारकों की रचनाएं पढ़कर अपने ज्ञान को समृद्ध किया।
रिहा होने के बाद उन्होंने कई आंदोलनों का नेतृत्व किया। उनकी देशभक्ति का प्रमाण यह था कि उन्होंने कभी पद या सत्ता की चाह नहीं की। इसके बजाय, उन्होंने जनसेवा को अपना पवित्र कर्तव्य माना।
1947 में भारत की आजादी के बाद, लाल बहादुर शास्त्री का राजनीतिक करियर तेजी से आगे बढ़ा। उन्होंने पहले उत्तर प्रदेश में संसदीय सचिव और बाद में परिवहन और वित्त मंत्री के रूप में कार्य किया। 1952 में नेहरू मंत्रिमंडल में रेल मंत्री के तौर पर उन्होंने भारतीय रेलवे को एक नई दिशा दी।
हालांकि, 1956 में एक ट्रेन दुर्घटना में 146 यात्रियों की मौत के बाद, उन्होंने नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए अपने पद से इस्तीफ दे दिया। यह राजनीतिक ईमानदारी का एक बेहतरीन उदाहरण है। बाद में, देश के गृह मंत्री (1961-63) और वाणिज्य मंत्री के तौर पर उन्होंने प्रशासनिक सुधारों को मजबूत किया।
उनके कार्यकाल के दौरान 1965 का मद्रास हिंदी-विरोधी आंदोलन एक बड़ी चुनौती बनकर सामने आया। दक्षिण भारत में हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने के कदम का विरोध हो रहा था, लेकिन शास्त्री जी ने संयम के साथ स्थिति को संभाला और भाषाई सद्भाव पर जोर दिया।
उनकी सादगी से जुड़े कई किस्से मशहूर हैं। प्रधानमंत्री रहते हुए भी वे साइकिल से बाजार जाते थे, धोती पहनते थे और सादा जीवन जीते थे। एक बार तो उन्होंने अपनी सारी दुनियावी चीजें दान कर दीं, जिनमें बस कुछ किताबें और कपड़े ही थे।
9 जून 1964 को जवाहरलाल नेहरू के निधन के बाद लाल बहादुर शास्त्री भारत के दूसरे प्रधानमंत्री बने। हालांकि उनका कार्यकाल सिर्फ 19 महीने का था, लेकिन यह चुनौतियों से भरा था। 1965 में पाकिस्तान के साथ युद्ध छिड़ गया। सीमाओं पर सैनिकों की वीरता और देश में अनाज की कमी के बीच, शास्त्री जी ने "जय जवान, जय किसान" का नारा दिया। एक ऐसा नारा जो आज भी प्रासंगिक है।
"जय जवान, जय किसान" नारे ने सेना का मनोबल बढ़ाया और किसानों को आत्मनिर्भर बनने के लिए प्रेरित किया। युद्ध के दौरान, उन्होंने गेहूं का उत्पादन बढ़ाने के लिए हरित क्रांति की नींव रखी और दूध उत्पादन को भी बढ़ावा दिया।
उनका जीवन नैतिकता और पारदर्शिता का उदाहरण था, यहां तक कि उनके छोटे-छोटे कामों में भी यह दिखता था। ताशकंद समझौते के बाद 11 जनवरी 1966 को रहस्यमय परिस्थितियों में हुई उनकी मौत ने पूरे देश को सदमे में डाल दिया।