Mahatma Gandhi Jayanti Special: 2 अक्टूबर को पूरा देश महात्मा गांधी की जयंती मनाता है। महात्मा गांधी के जीवन की तमाम घटनाएं आज भी लोगों के बीच रहस्य है। आज उनकी जीवनी के मौके पर उनके जीवन से जुड़ा वो पन्ना आपके सामने है जिसके बारे में कम लोग ही जानते हैं।
राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का नाम सुनते ही हमारे सामने सत्य, अहिंसा और स्वतंत्रता आंदोलन की तस्वीर उभरतने लगती है। देश की स्वतंत्रता की लड़ाई में उनके योगदान को झूठलाया नहीं जा है, लेकिन गांधी जी के जीवन का एक ऐसा प्रसंग भी है, जिसे उन्होंने खुद दुनिया के सामने रखा था।
यह कहानी उस समय की है, जब मोहनदास करमचंद गांधी बाल्यावस्था की दहलीज को लांघकर किशोरावस्था में कदम रखे थे और उन्होंने एक ऐसी गलती कर दी थी, जिसने आगे चलकर उनके जीवन और विचारों पर गहरा असर डाला।
गांधी जी ने अपनी आत्मकथा सत्य के प्रयोग में अपने जीवन की इस वाक्या का जिक्र किया है। खास बात यह है कि उन्होंने इसमें अपनी उपलब्धियों के साथ-साथ अपनी गलतियों और कमजोरियों को भी ईमानदारी से सामने रखा।
गांधी जी ने अपनी आत्मकथा सत्य के प्रयोग में एक घटना का जिक्र करते हुए लिखते है कि जब वो किशोरावस्था में थे तो उनके बड़े भाई पर कुछ कर्ज हो गया था। परिवार की परिस्थितियों के बीच गांधी जी को उस कर्ज को चुकाने की चिंता थी। इसी दरमियान गांधी जी ने अपने भाई के सोने के कड़े से सोने का एक छोटा हिस्सा निकाल लिया। उस सोने को बेचकर मिली रकम से भाई का कर्ज चुकाया गया।
उस समय शायद उन्हें लगा हो कि यह समस्या का रास्ता है, लेकिन जब समझदारी हुई तो उनके भीतर अपराधबोध पैदा होने लगा। सत्य के प्रयोग में लिखते है कि चोरी की बात किसी और से छिपाना जितना आसान था, खुद से छिपाना उतना ही मुश्किल हो रहा था। गांधी जी के मन में लगातार यह बात चलती रही कि उन्होंने गलत किया है। आखिरकार उन्होंने तय किया कि वह अपने पिता से यह बात छिपाएंगे नहीं।
गांधी जी अपने पिता करमचंद गांधी के सामने कम ही बोलते थे। डर, संकोच और खुद में शर्मिदगी महसूस करते हुए पिता के सामने सीधे जाकर अपनी गलती बताने का साहस नहीं जुटा पा रहे थे। इसलिए उन्होंने एक पत्र लिखने का फैसला किया।
इस पत्र में उन्होंने अपनी गलती स्वीकार की और अपने किए पर पछतावा जताया। उन्होंने यह भी भरोसा दिलाया कि भविष्य में ऐसी गलती दोबारा नहीं करेंगे। इसके बाद उन्होंने वह पत्र अपने पिता को सौंप दिया।
महात्मा गांधी जी ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि उनके पिता ने पत्र पढ़ा। उन्होंने बेटे को डांटा या सजा नहीं दी। इसके बजाय उनकी आंखों से आंसू निकल आए।
पिता की यह प्रतिक्रिया गांधी जी के लिए बेहद भावुक करने वाली थी। उन्होंने महसूस किया कि बिना कठोर शब्दों के भी किसी को उसकी गलती का एहसास कराया जा सकता है। उस क्षण का उनके मन पर गहरा प्रभाव पड़ा।
गांधी जी के जीवन में यह घटना सिर्फ एक गलती स्वीकार करने तक सीमित नहीं रही। उनके जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ा। इस घटना को वो अपने आत्मिक विकास से जोड़कर देखे। उनके लिए यह अनुभव इस बात का उदाहरण बन गया कि सच स्वीकार करना व्यक्ति को भीतर से हल्का कर सकता है।
आगे चलकर सत्य गांधी जी के जीवन-दर्शन का सबसे महत्वपूर्ण आधारशीला बन गया। उन्होंने सत्य और अहिंसा को अपने सार्वजनिक जीवन और स्वतंत्रता आंदोलन में केंद्रीय स्थान दिया। उनके आंदोलनों में भी सत्याग्रह का विचार इसी विश्वास पर आधारित था कि सत्य के लिए दृढ़ता से खड़ा हुआ जा सकता है।
गांधी जी की आत्मकथा की खासियत भी यही है। उन्होंने उसमें खुद को किसी आदर्श व्यक्ति के रूप में पेश करने के बजाय अपने जीवन के प्रयोगों, गलतियों, असमंजस और उनसे मिली सीख को दर्ज किया।
महात्मा गांधी के जीवन को अगर केवल स्वतंत्रता आंदोलन के नजरिए से देखा जाए तो हम सबकी बड़ी भूल होगी। साथ ही उनके व्यक्तित्व का एक बड़ा हिस्सा छूट जाएगा। उनका जीवन हम सभी के लिए लगातार खुद को समझने और सुधारने के प्रयासों से भी जुड़ा है।
किशोरावस्था की यह घटना बताती है कि गांधी बनने से पहले वह भी एक सामान्य इंसान थे, जिसने गलतियां कीं, उनसे परेशान हुए और फिर अपनी गलती स्वीकार कर खुद के जीवन में सुधार का रास्ता चुना।
शायद यही वजह रही होगी जिस कारण उन्होंने अपनी आत्मकथा का नाम ‘सत्य के प्रयोग’ रखा। उनके लिए सत्य कोई एक दिन में हासिल होने वाली चीज नहीं थी, बल्कि पूरे जीवन चलने वाला सतत प्रक्रिया और जीवन में प्रतिदिन का प्रयोग था।
उनकी यह कहानी आज भी एक साधारण लेकिन गहरी सीख देती है—गलती होना इंसानी कमजोरी हो सकती है, लेकिन अपनी गलती स्वीकार करने का साहस व्यक्ति के चरित्र को बदल सकता है।