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कलाईनार: एक नास्तिक जो राजनीति का ‘भगवान’ बन गया, जिसकी धाक तमिलनाडु से लेकर दिल्ली तक थी
तमिलनाडु आज अपने नेता व पूर्व मुख्यमंत्री एम करुणानिधि की जयंती मना रहा है। करुणानिधि को उनके चाहने वाले कलाईनार कहते थे। इस खबर में जानिए उनसे जुड़ी अहम जानकारियां।
- Written By: Saurabh Pal

एम करुणानिधि (फोटो-सोशल मीडिया)
चेन्नईः काला चश्मा, सफेद कुर्ता, पीला गमछा ऐसा था तमिल लोगों के दिमाग में ऐसी ही यादें एम करुणानिधि की हैं, जिन्हें उनके समर्थक प्यार से कलाईनार कहते थे। आज ही के दिन (3 जून 1924 ) को उनका जन्म ब्रिटिश भारत के नागपट्टिनम के तिरुक्कुलभलई में हुआ था। इनका पूराम नाम मुत्तुवेल करुणानिधि था। ईवी रामास्वामी परियार के विचारों से प्रेरित थे। उन्होंने पेरियार के विचारों को पूरे दक्षिण भारत फैलाया। करुणानिधि के जन्मदिन पर इस आर्टिकल में हम जानेंगे कैसे एक लेखक सियासत के फलक पर चमका और नास्तिक व्यक्ति भगवान बन गया।
कलाईनर एक तमिल शब्द है, जो हिंदी में एक वाक्य बन जाता है। इसका मतलब कला का विद्वान होता है। हालांकि उनको न सिर्फ लेखन में महारत हासिल थी, बल्कि वह सियासी गुणागणित को भी भलीभांति समझते थे। करुणानिधि ने तमिल फिल्म उद्योग में एक पटकथा लेखक के रूप में अपने करियर का शुभारम्भ किया था। अपनी बुद्धि और भाषण कौशल के माध्यम से वे बहुत जल्द एक राजनेता बन गए। वे द्रविड़ आंदोलन से जुड़े थे और उसके समाजवादी और बुद्धिवादी आदर्शों को बढ़ावा देने वाली ऐतिहासिक और सामाजिक (सुधारवादी) कहानियां लिखने के लिए मशहूर थे।
राजनीतिक सफर
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एम करुणानिधि भारतीय राजनीति के वरिष्ठ नेताओं में से एक थे। द्रविड़ मुन्नेत्र कड़गम (डीएमके) के प्रमुख थे, जिसकी सत्ता वर्तमान में भी तमिलनाडु में है। डीएमके के संस्थापक सीएन अन्नादुराई थे। इनकी मृत्यु के बाद पार्टी की कमान एम करुणानिधि के हाथों में आई। इसके बाद डीएमके दक्षिण का उगता हुआ सियासी सूरज बन गई। करुणानिधि का राजनीतिक प्रभाव न केवल दक्षिण भारत रहा, बल्कि राष्ट्रीय राजनीति में उनकी मजबूत पकड़ थी। 2004 यूपीए की सरकार बनवाने में उनका बहुत बड़ा योगदान था। वह तमिलनाडु के 5 बार मुख्यमंत्री बने।
राजनीति के भगवान बन गए करुणानिधि
करुणानिधि का हिंदू संबंध हिंदू परिवार से था। उनके पिता का नाम मुत्तुवेल और माता अंजुगम थीं। करुणानिधि एक राजनेता होने के साथ-साथ समाज सुधारक और लोगों के बीच में रहकर काम करने वाले नेता थे। उन्होंने ने अपने जीते जी अपना मकान दान कर दिया। उनकी इच्छानुसार उनकी मृत्यु के बाद इस घर को गरीबों के इलाज के लिए अस्पताल में तब्दील कर दिया गया। करुणानिधि के दमदार भाषण, समाज के पिछड़े तबकों के लिए आवाज उठाने, सियासी सफलता ने उन्हें राजनीति का भगवान बना दिया। उनके पदचिन्हों पर ही आज भी डीएमके राज्य में सफलता हासिल कर रही है।
14 साल की उम्र में शुरु हुआ राजनीतिक सफर
महज 14 साल की उम्र में जस्टिस पार्टी के अलगिरिस्वामी के एक भाषण से प्रेरित होकर करुणानिधि ने राजनीति में प्रवेश किया और हिंदी विरोधी आंदोलन में कूद पड़े। उन्होंने अपने इलाके के युवाओं के लिए एक संगठन की स्थापना की। बाद में उन्होंने द्रविड़ राजनीति के लिए मंद्रम नामक छात्र संगठन भी बनाया। उन्होंने अपने संगठन के सदस्यों के लिए एक अखबार की स्थापना की, जो बाद में डीएमकेका मुखपत्र बन गया।
1957 में पहली बार विधानसभा पहुंचे करुणानिधि
वर्ष 1957 में करुणानिधि पहली बार विधानसभा चुनाव जीत कर तमिलनाडु विधानसभा पहुंचे थे। 1957 से 2006 तक तमिलनाडु के विभिन्न विधानसभा सीटों से चुनाव जीतकर विधानसभा के सदस्य बनते रहे। 1967 में पहली बार उन्हें सरकार में शामिल किया गया और लोक निर्माण विभाग का मंत्री बनाया गया। 1969 में तत्कालीन मुख्यमंत्री अन्नादुराई के निधन के बाद उन्हें पहली बार राज्य के मुख्यमंत्री बने। इसके बाद वह लगातार 5 बार राज्य के मुख्यमंत्री रहे। अपने 60 साल के राजनीतिक करियर में अपनी भागीदारी वाले हर चुनाव में जिस सीट से चुनाव लड़ा हर बार रिकॉर्ड मतों से विजयी हुए।
100 से ज्यादा किताबें लिखीं
करुणानिधि द्वारा लिखी गई पुस्तकों में रोमपुरी पांडियन, तेनपांडि सिंगम, वेल्लीकिलमई, नेंजुकू नीदि, इनियावई इरुपद, संग तमिल, कुरालोवियम, पोन्नर शंकर, और तिरुक्कुरल उरई उनके द्वारा लिखी प्रमुख और सबसे ज्यादा चर्चित पुस्तकें हैं। उन्होंने 100 से ज्यादा पुस्तकें लिखी है। करुणानिधि का रक्तचाप कम होने की वजह से उन्हें 28 जुलाई को गोपालपुरम स्थित आवास से कावेरी अस्पताल लाया गया था। पहले वह वार्ड में भर्ती थे, बाद में हालत बिगड़ने पर उन्हें आईसीयू में भर्ती किया गया। जिसके बाद 7 अगस्त 2018 को 94 साल की उम्र में उनका निधन हो गया।
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