मायावती व कांशीराम (सोर्स: सोशल मीडिया)
नवभारत डेस्क: दिल्ली के लेडी हार्डिंग अस्पताल में 15 जनवरी 1956 को एक लड़की जन्म हुआ। 15 दिन बाद नामकरण और अन्य धार्मिक अनुष्ठान के लिए माता-पिता ने साधु को बुलाया, तब बच्ची की मां से एक साधु ने कहा कि ‘ये बहुत बड़ी नेता बनेगी।’ उसी दौरान बच्ची के पिता का प्रमोशन हुआ। माता-पिता को लगा कि ये बच्ची की माया की है, और उस बच्ची का नाम रखा गया ‘मायावती।’
साधु की भविष्यवाणी सच हुई और वह बच्ची बड़ी होकर देश के सबसे बड़े सूबे की चार बार मुख्यमंत्री बनी। उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री और बसपा सुप्रीमो मायावती का आज यानी 15 जनवरी 2025 को 69वां जन्मदिन है। उन्हें लोग ‘बहनजी’ के नाम से भी जानते हैं।
मायावती ने 1975 में ग्रेजुएशन करने के बाद BEd कोर्स किया। इसके बाद लॉ की पढ़ाई के लिए वो दिल्ली यूनिवर्सिटी पहुंच गईं, लेकिन मायावती का असली मकसद UPSC की परीक्षा पास कर कलेक्टर बनना था।
1977 में जनता पार्टी ने जातिगत भेदभाव के खिलाफ दिल्ली के कॉन्स्टिट्यूशन क्लब में एक बैठक बुलाई। जिसमें बतौर वक्ता मायावती भी पहुंचीं थी। इस बैठक में रायबरेली से पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को चुनाव हरा चुके ‘जाइंट किलर’ नाम से मशहूर राज नारायण ने अपने भाषण में कई बार दलितों के लिए ‘हरिजन’ शब्द का प्रयोग किया।
इसके बाद जब मायावती की बोलने के बारी आईं, तो उन्होंने कहा कि ‘हरिजन’ शब्द अपमानजनक है। सरकार के एक मंत्री ने सभा में इस शब्द को बार-बार दोहराकर दलितों का अपमान किया है। उन्होंने कहा कि यह सम्मेलन जो जातिगत भेदभाव को खत्म करने के लिए किया गया है, वह एक मजाक बन गया।
मायावती की पुरानी तस्वीर (सोर्स: सोशल मीडिया)
20 साल की मायावती के इस भाषण ने सम्मेलन में मौजूद दलितों में बिजली सी दौड़ा दी। सभागार में राज नारायण को हटाओ, जनता पार्टी को हटाओ…के नारे गूंजे। इस बीच कांशीराम उत्तर प्रदेश में दलितों के बड़े नेता के रूप में अपनी पहचान बना चुके थे। वे ऑल इंडिया बैकवर्ड माइनॉरिटी कम्युनिटीज एम्प्लॉइज फेडरेशन यानी, बामसेफ की नींव रख चुके थे। मायावती का यह भाषण कार्यकर्ताओं के जरिए कांशीराम तक पहुंच चुका था।
बात आई गई हो गई और हर दिन की तरह मायावती रात काे खाना खाने के बाद पढ़ने बैठ गईं। इसी बीच किसी ने उनके घर का दरवाजा खटखटाया। मायावती ने दरवाजा खोला, तो देखा कि एक अधेड़ उम्र का व्यक्ति, जिसके सिर पर ना के बराबर बाल और गले में मफलर लपेटे दरवाजे के बाहर खड़ा था। ये शख्स और कोई नहीं बल्कि कांशीराम थे।
कांशीराम अंदर आए और मेज पर चारों ओर फैली किताबों की तरफ इशारा करते हुए मायावती से पूछा- ‘इतना पढ़-लिखकर क्या बनना चाहती हो?’ मायावती ने तपाक से जवाब देते हुए कहा- ‘मैं कलेक्टर बनकर अपने समुदाय की सेवा करना चाहती हूं।’
तब कांशीराम ने मायावती से कहा कि “तुम बहुत बड़ी गलती कर रही हो। हमारे समुदाय ने कई कलेक्टरों और अफसरों को जन्म दिया है, लेकिन हम अब तक कोई ढंग के नेता नहीं ला सके, जो इन कलेक्टरों और अफसरों को सही रास्ता दिखा सके।” उन्होंने कहा कि मैं तुम्हें इतना बड़ा नेता बनाऊंगा कि तुम्हारे सामने इन्हीं कलेक्टरों की लाइन लग जाएगी।
इसके बाद मायावती ने UPSC की तैयारी करना छोड़ दी और बामसेफ के कार्यक्रमों में जाने लगीं। मायावती के पिता प्रभुदास नहीं चाहते थे कि बेटी राजनीति में उतरे। खफा होकर मायावती ने पिता का घर छोड़ दिया और कांशीराम के कमरे में रहने लगीं।
साल 1984 कांशीराम ने बहुजन समाज पार्टी यानी BSP की नींव रखी। इसी साल मायावती टीचर की नौकरी छोड़ी और बसपा की ऑलटाइम मेंबर बन गईं। धीरे-धीरे बसपा में मायावती का कद बढ़ता गया। 1984 में मायावती पहली बार कैराना लोकसभा सीट चुनाव लड़ीं। कहा जाता है कि मायावती साइकिल पर बैठकर चुनाव प्रचार करती थीं। हालांकि, इंदिरा गांधी की हत्या के बाद कांग्रेस लहर में मायावती यह चुनाव हार गईं।
1985 में बिजनौर और 1987 में मायावती ने हरिद्वार से लोकसभा चुनाव लड़ा। इस बार मायवती को हार का सामना करन पड़ा। 1989 मायावती और बसपा दोनों के लिए खास रहा। इस साल लोकसभा और उत्तर प्रदेश विधानसभा के चुनाव नवंबर-दिसंबर महीने में हुए।
मायावती बिजनौर लोकसभा सीट से चुनाव लड़ीं और 8 हजार वोटों से जीत दर्ज की। इसके बाद 1993 में बसपा और समाजवादी पार्टी ने साथ मिलकर चुनाव लड़ा और जीता। मुलायम सिंह मुख्यमंत्री बने। 1995 में कांशीराम की तबीयत खराब थी वे अस्पताल में भर्ती थे। तभी भाजपा नेता लालजी टंडन से उनकी फोन पर बात हुई। इसके बाद कांशीराम ने मायावती को बुलाया और पूछा कि तुम मुख्यमंत्री बनोगी…?
मायावती को लगा कि कांशीराम उनसे मजाक कर रहे हैं। फिर उन्होंने दूसरे दलों के समर्थन चिट्ठी दिखाई और कहा कि तुम्हें लखनऊ जाकर ये दस्तावेज राज्यपाल को सौंपना हैं। 1 जून 1995 को मायावती ने राज्यपाल मोतीलाल वोरा से मुलाकात की और समाजवादी पार्टी से गठबंधन तोड़कर भाजपा के समर्थन से उत्तर प्रदेश में सरकार बनाने का दावा पेश कर दिया।
3 जून 1995 को मायावती ने देश के सबसे बड़े सूबे यानी उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के तौर पर पहली बार शपथ ली। इसके बाद मायावती ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। मायावती चार बार यूपी की सीएम बनी। 1997, 2002 और 2007 में मायवती उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनी।