जयंती विशेष: 400 रुपये रख लिए अपने पास… पढ़िए ‘बा’ की जिंदगी का वो किस्सा जब गांधी जी हुए थे नाराज
Birth Anniversary Special: कहानी है उस समय की जब गांधी जी और कस्तूरबा साबरमती आश्रम में रह रहे थे। आश्रम के सख्त नियमों के मुताबिक, कोई भी व्यक्ति व्यक्तिगत रूप से कोई चीज नहीं रख सकता था।
- Written By: विकास कुमार उपाध्याय
महात्मा गांधी और कस्तूरबा गांधी
नवभारत डिजिटल डेस्क : हर साल 2 अक्टूबर को देश महात्मा गांधी की जयंती मनाता है। लेकिन इस महानायक की प्रेरणा और ताकत रहीं उनकी जीवनसंगिनी कस्तूरबा गांधी, जिन्हें प्यार से ‘बा’ कहा जाता था, अक्सर इतिहास के पन्नों में छिपी रह जाती हैं। ‘बा’ ने स्वतंत्रता संग्राम में न केवल गांधी जी का साथ दिया, बल्कि कई बार उनके आदर्शों को जमीन पर उतारने का काम भी किया।
उनकी सादगी, त्याग और ईमानदारी से भरी जिंदगी में कुछ ऐसे भी लम्हें थे, जो उन्हें एक साधारण महिला से असाधारण बना देते हैं। इस कस्तूरबा गांधी की जयंती पर जानते हैं उनका एक ऐसा दिलचस्प किस्सा, जिसे खुद महात्मा गांधी ने ‘नवजीवन’ अखबार में “मेरा शोक, मेरी लज्जा” शीर्षक से साझा किया था।
‘बा’ ने चार रुपये रख लिए अपने पास
कहानी है उस समय की जब गांधी जी और कस्तूरबा साबरमती आश्रम में रह रहे थे। आश्रम के सख्त नियमों के मुताबिक, कोई भी व्यक्ति व्यक्तिगत रूप से कोई चीज नहीं रख सकता था। यहां तक की किसी की दी गई उपहार भी। जो कुछ भी आता, वह सब आश्रम के लिए होता।
सम्बंधित ख़बरें
कर्नाटक से खरगे-पवन खेड़ा जाएंगे राज्यसभा, कांग्रेस ने 7 उम्मीदवारों के नाम का किया ऐलान, देखें लिस्ट
भोपाल में बवाल, बरकतुल्लाह यूनिवर्सिटी का नाम बदलने पर भड़की NSUI; गेट पर किया यज्ञ, दी बड़ी चेतावनी- VIDEO
पहले अन्नामलाई…अब कैप्टन अमरिंदर, एक साथ बीजेपी को दो बड़े झटके? कांग्रेस में वापसी कर सकते हैं पूर्व सीएम
Congress News: केपीसीसी अध्यक्ष बी.के. हरिप्रसाद के बयान ने बढ़ाई सियासी हलचल, कहा- पद और सत्ता चाहिए तो….
लेकिन एक दिन गांधी जी को पता चला कि कस्तूरबा ने कुछ पैसे (करीब चार रुपये) अपने पास रख लिए हैं। गांधी जी के मुताबिक, इससे पहले भी उन्होंने कई बार छोटे-मोटे उपहारों को अपने पास रखा था। गांधी जी ने इसे नियमों का उल्लंघन और नैतिक अपराध माना। गांधी जी ने लिखा, “ये चोरी थी। नियम के विरुद्ध था कि कोई भी वस्तु, यहां तक की जब वह ‘बा’ के लिए हो उसे भी वह अपने पास रखे।”
जब डर के मारे खुद ही कुबूल किया अपराध
एक दिन जब आश्रम में चोर घुसे, तब कस्तूरबा को सबसे पहले उस पैसे की चिंता हुई जो उन्होंने छिपा कर रखा था। यहीं से गांधी जी को शक हुआ और उन्होंने पूछताछ की। डर और शर्मिंदगी के साथ ‘बा’ ने अपनी गलती मान ली। उन्होंने साफ कहा कि उन्हें उस समय लगा था कि यह कुछ खास नहीं है, और वे इसे बाद में देने की सोच रही थीं।
गांधी जी ने कहा कि कस्तूरबा ने सच्चे मन से अपनी गलती मानी और कसम खाई कि भविष्य में अगर ऐसी गलती फिर से हो, तो वे आश्रम और गांधी जी दोनों को छोड़ देंगी। गांधी जी ने इस सच्चे पश्चाताप को स्वीकार किया और उन्हें माफ कर दिया।
एक तरफ गांधी जी अपने आदर्शों पर अटल थे, तो दूसरी ओर कस्तूरबा उनमें सामंजस्य बैठाने की कोशिश करती थीं। कस्तूरबा कोई क्रांतिकारी भाषण देने वाली नेता नहीं थीं, लेकिन उनके छोटे-छोटे योगदानों ने आंदोलन को जमीनी ताकत दी। जब गांधी जेल में होते, तब वो आंदोलनों का नेतृत्व करतीं। उन्होंने चंपारण की महिलाओं के लिए काम किया, खादी के प्रचार में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई, और आश्रमों का संचालन भी बखूबी संभाला।
जयंती विशेष खबरों को पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें
‘बा’ थीं गांधी जी की असली ताकत
कस्तूरबा गांधी सिर्फ महात्मा की पत्नी नहीं थीं, बल्कि उनकी आत्मा थीं। उन्होंने हर सुख-दुख, संघर्ष, आंदोलन और यहां तक कि गांधी जी के आदर्शों को भी दिल से अपनाया। उनके त्याग और संघर्ष को याद करना आज के दौर में बेहद जरूरी है।
