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Assam Assembly Election 2026: असम के ऊपरी हिस्से में स्थित जोरहाट को महज एक शहर कहना गलत होगा; यह राज्य की ‘सांस्कृतिक राजधानी’ है, जिसकी हवाओं में चाय के बागानों की महक और ब्रह्मपुत्र की सहायक नदी भोगदोई की लहरें घुली हुई हैं। विधानसभा चुनाव 2026 की आहट के साथ ही यह इलाका अब एक हाई-प्रोफाइल सियासी अखाड़े में तब्दील हो चुका है।
यहां की लड़ाई सिर्फ वोटों की नहीं, बल्कि अस्मिता और भविष्य के दावों की भी है। जहां एक तरफ कांग्रेस के कद्दावर नेता और सांसद गौरव गोगोई पहली बार विधानसभा की दहलीज पर कदम रखने की तैयारी में हैं, वहीं दूसरी तरफ भाजपा के अनुभवी रणनीतिकार हितेंद्र नाथ गोस्वामी अपना किला बचाने के लिए पूरी ताकत झोंक रहे हैं।
जोरहाट की मिट्टी से कांग्रेस का रिश्ता बहुत पुराना और गहरा रहा है। यह इलाका राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री तरुण गोगोई की राजनीतिक कर्मभूमि रहा है, जो यहां से दो बार सांसद और उनके बगल की सीट तिताबोर से करीब 20 साल तक विधायक रहे। अब उनके बेटे और वर्तमान सांसद गौरव गोगोई के कंधों पर उस विरासत को आगे ले जाने की भारी जिम्मेदारी है।
गौरव ने नामांकन के दौरान साफ किया कि उनकी यह लड़ाई सीधे मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के खिलाफ है। वे इस चुनाव को ‘तरुण गोगोई के आदर्शों’ बनाम ‘सत्ता की राजनीति’ के रूप में पेश कर रहे हैं। हालांकि, उनके लिए चुनौती कम नहीं है, क्योंकि वे पहली बार राज्य विधानसभा के लिए चुनाव लड़ रहे हैं।
दूसरी तरफ, भाजपा के हितेंद्र नाथ गोस्वामी चुनावी बिसात के मझे हुए खिलाड़ी हैं। वे 1991 में पहली बार असम गण परिषद के टिकट पर विधायक बने थे और बाद में भाजपा में शामिल होकर विधानसभा अध्यक्ष के पद तक पहुंचे। गोस्वामी का कहना है कि गौरव गोगोई ने सांसद रहते हुए जोरहाट के लिए कुछ नहीं किया और वे चुनाव हारकर वापस दिल्ली लौट जाएंगे। हालांकि, आंकड़े बताते हैं कि 2021 के चुनाव में उनकी जीत का अंतर सिमटकर मात्र 6,488 वोट रह गया था, जो भाजपा के लिए चिंता का सबब हो सकता है। इसके अलावा, जोरहाट की वह मशहूर ‘गोस्वामी बनाम गोस्वामी’ (राणा गोस्वामी बनाम हितेंद्र गोस्वामी) की प्रतिद्वंद्विता अब खत्म हो चुकी है, क्योंकि राणा गोस्वामी 2024 में भाजपा में शामिल हो चुके हैं।
साल 2021 का हिसाब-किताब कुछ ऐसा है:
जैसे-जैसे मतदान की तारीख नजदीक आ रही है, विपक्षी एकजुटता में पड़ती दरारें कांग्रेस के लिए सिरदर्द बन रही हैं। जोरहाट के चाय बागानों और आदिवासी समुदायों में प्रभाव रखने वाला झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) इस बार अकेले चुनाव लड़ रहा है। पार्टी ने साफ कर दिया है कि वे 19 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतार रहे हैं, जिससे आदिवासी वोटों के बंटने का सीधा खतरा पैदा हो गया है। कांग्रेस के रणनीतिकारों का मानना है कि जेएमएम का यह कदम भाजपा विरोधी वोटों को कमजोर कर सकता है, जिसका सीधा फायदा सत्ताधारी दल को मिल सकता है। जोरहाट में जहां 64 प्रतिशत से अधिक मतदाता शहरी हैं, वहां बागान श्रमिकों के वोटों का इधर-बदल होना किसी का भी खेल बिगाड़ सकता है।
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चुनावी गणित केवल विपक्षी गठबंधन तक सीमित नहीं है; भाजपा के भीतर भी टिकट बंटवारे को लेकर असंतोष की लहर देखी जा रही है। कई इलाकों में पुराने नेताओं के टिकट कटने से वे निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर मैदान में कूद गए हैं, जो भाजपा के आधिकारिक उम्मीदवारों के लिए चुनौती खड़ी कर रहे हैं। जोरहाट की इस सियासी फिल्म में जुबीन गर्ग की मौत का मुद्दा भी जनता के बीच भावनात्मक असर डाल रहा है, जिसे विपक्षी दल पूरी ताकत से उठा रहे हैं। अब देखना यह होगा कि 4 मई को जब नतीजे आएंगे, तो जोरहाट की जागरूक जनता विकास के दावों पर मुहर लगाती है या गौरव गोगोई के जरिए पुरानी विरासत को फिर से जिंदा करती है।