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नई दिल्ली: जलियांवाला बाग हत्याकांड भारतीय इतिहास में एक कलंकित घटना है, जिसने पुरे देश को झकझोर दिया था। अमृतसर के जलियांवाला बाग में जब एक भीड़ शांतिपूर्ण तरीके से इकट्ठी हुई थी, जिस पर ब्रिटिश सरकार ने गोली चलवा दी थी। इस घटना में अनेक निर्दोष और निहत्थे लोगों की जान चली गई थी। जलियाँवाला बाग़ नरसंहार को भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में महत्वपूर्ण मोड़ के रूप में देखा जाता है। इस नरसंहार ने “अंग्रेजी राज” का क्रूर और दमनकारी चेहरा सामने लाया था।
आज ही के दिन (13 अप्रैल) वर्ष 1919 को जलियांवाला बाग में एक शांतिपूर्ण सभा के लिए जमा हुए हजारों भारतीयों पर अंग्रेज हुक्मरान ने अंधाधुंध गोलियां बरसाई थीं। इसमें कई मासूमों सहित 350 से अधिक लोग मारे गए और 1200 लोग घायल हो गए थे। यह घटना भारतीय इतिहास में ‘जलियांवाला बाग हत्याकांड’ के नाम से जानी जाती है। आज इस नरसंहार की घटना को 104 साल पूरे हुए है।
अंग्रेजी हुकूमत ने 10 मार्च, 1919 को रॉलेट एक्ट (ब्लैक एक्ट) पारित किया गया था। जिसमें सरकार को बिना किसी मुकदमे के देशद्रोही गतिविधियों से जुड़े किसी भी व्यक्ति को कैद करने के लिए अधिकृत किया गया था। इससे देशव्यापी अशांति फैल गई थी। इस रॉलेट एक्ट के विरोध में गांधी ने सत्याग्रह की शुरुआत की थी। ब्रिटिश अधिकारियों ने गांधी को पंजाब में प्रवेश करने से रोकने और आदेशों की अवहेलना करने पर उन्हें गिरफ्तार करने के आदेश जारी किए गए थे।
पंजाब के लेफ्टिनेंट गवर्नर सर माइकल ओ डायर (1912-1919) ने सुझाव दिया कि गांधी को बर्मा निर्वासित कर दिया जाए, लेकिन उनके साथी अधिकारियों ने इसका विरोध किया क्योंकि उन्हें लगा कि यह जनता को उकसा सकता है। डॉ सैफुद्दीन किचलू और डॉ सत्यपाल, दो प्रमुख नेताओं, जो हिंदू-मुस्लिम एकता के प्रतीक थे। उन्होंने अमृतसर में रॉलेट एक्ट के खिलाफ शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन किया। 9 अप्रैल, 1919 को ओ डायर ने उन्हें गिरफ्तार करने का आदेश जारी किया था।
पंजाब के अमृतसर के जलियांवाला बाग में अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ रॉलेट एक्ट के विरोध में हजारों सिख यहाँ पर एक साथ आए थे। कहा जाता है कि अंग्रेजों की दमनकारी नीति, और सत्यपाल और सैफुद्दीन की गिरफ्तारी के खिलाफ भी लोग इस सभा में एकजुट हुए थे। शहर में कर्फ्यू था और हजारों की संख्या में लोग बैठक में पहुंचे थे। बाग में चल रही सभा में जनरल रेजिनाल्ड डायर पहुंचा और उसने सैनिकों को फायरिंग का आदेश दिया।
ऐसा बताया जाता है कि, इस जगह पर 5 हजार लोग मौजूद थे। यहां जनरल डायर ने अपने 90 ब्रिटिश सैनिकों के साथ घेर लिया और यह नरसंहार किया। इस प्रदर्शन को दबाने के लिए जनरल डायर ने जो अपराध किया, उसने ब्रिटिश साम्राज्य को कुछ सालों तक भारत पर शासन करने की ताकत भले दे दी, लेकिन भारत की जनता इस जख्म को भूल नहीं सकी। जलियांवाला बाग नरसंहार में बहे खून ने भारत के स्वाधीनता आंदोलन को नई दिशा दे दी।
जलियांवाला बाग हत्या कांड के दोषी जनरल डायर (General Dyer) की हत्या भारत मां के एक वीर सपूत ने 21 साल बाद कि थी । जिन्हें सरदार उधम सिंह (Sardar Udham Singh) के नाम से जाता जाता है। जलियांवाला बाग में हुए नरसंहार का बदला लेने के लिए भारत मां का लाल सरदार उधम सिंह लंदन पहुंचे थे। उन्होंने कई सालों की योजनाओँ के बाद आखिरकार 13 मार्च 1940 को डायर को एक बैठक में भाषण देते वक्त गोलियों से भून दिया था। भलेही इसके बाद सरदार उधम सिंह सजा मिली लेकिन उन्होंने अपना बदला ले लिया था।