भारत 12 साल से पोलियो मुक्त, फिर भी हर साल बच्चों को क्यों पिलाई जाती हैं दो बूंद जिंदगी की? जानिए बड़ी वजह
India Polio Free: भारत को 2014 में पोलियो मुक्त घोषित किया गया था, लेकिन इसके बावजूद हर साल राष्ट्रीय पल्स पोलियो अभियान चलाया जाता है। आखिर इसकी जरूरत क्यों पड़ती है? पढ़िए पूरा एक्सप्लेनर।
- Written By: आकाश मसने
पल्स पोलियाे अभियान (सोर्स: AI)
Pulse Polio Campaign: एक समय था जब भारत में हर साल हजारों बच्चे पोलियो की वजह से हमेशा के लिए दिव्यांग हो जाते थे। गांवों से लेकर महानगरों तक यह बीमारी माता-पिता के लिए सबसे बड़ा डर बन चुकी थी। लेकिन वर्षों तक चले राष्ट्रीय पल्स पोलियो अभियान, लाखों स्वास्थ्यकर्मियों की मेहनत और करोड़ों बच्चों के टीकाकरण के बाद भारत ने इस बीमारी पर ऐतिहासिक जीत हासिल की।
27 मार्च 2014 को विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने भारत को आधिकारिक तौर पर पोलियो मुक्त देश घोषित किया। यह भारत के सार्वजनिक स्वास्थ्य इतिहास की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक मानी जाती है।
पोलियो क्या है और यह कितना खतरनाक है?
पोलियो एक वायरल बीमारी है, जो मुख्य रूप से 5 साल से कम उम्र के बच्चों को प्रभावित करती है। यह वायरस शरीर के तंत्रिका तंत्र (Nervous system) और रीढ़ की हड्डी पर हमला करता है और कई मामलों में हाथ या पैर को हमेशा के लिए लकवाग्रस्त बना सकता है। गंभीर मामलों में यह सांस लेने वाली मांसपेशियों को भी प्रभावित कर सकता है, जिससे जान का खतरा पैदा हो सकता है।
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भारत में आखिरी पोलियो मरीज कब मिला था?
भारत में पोलियो का आखिरी मामला 13 जनवरी 2011 को पश्चिम बंगाल में दर्ज हुआ था। वहीं महाराष्ट्र की बात करें तो यहां आखिरी मरीज सितंबर 2010 में बीड जिले में मिला था। इसके बाद लगातार तीन साल तक कोई नया मामला सामने नहीं आया, जिसके आधार पर विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने 27 मार्च 2014 को भारत को पोलियो मुक्त घोषित किया।
फिर हर साल पोलियो अभियान क्यों चलाया जाता है?
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब लगभग 12 साल पहले WHO ने भारत को पोलियो मुक्त देश घोषित कर दिया है फिर भी हर साल पल्स पोलियो अभियान चलाकर बच्चों को दो बूंद जिंदगी की क्यो पिलाई जाता है। इसका जवाब यह है कि भारत पोलियो मुक्त जरूर है, लेकिन दुनिया के कुछ देशों में अब भी पोलियो वायरस पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है।
कुछ पड़ोसी देशों में अभी भी पोलियो के मामले मिल रहे हैं, अंतरराष्ट्रीय यात्रा और लोगों की आवाजाही के कारण वायरस दोबारा भारत में प्रवेश कर सकता है। इसलिए सावधानी बरतना जरूरी है। इसी खतरे को रोकने के लिए हर साल राष्ट्रीय पल्स पोलियो अभियान चलाया जाता है, ताकि हर बच्चे की रोग प्रतिरोधक क्षमता बनी रहे।
पल्स पोलियाे अभियान में भारत का सफर (सोर्स: AI)
दो बूंद जिंदगी की अभियान कितना बड़ा है?
राष्ट्रीय पल्स पोलियो अभियान दुनिया के सबसे बड़े टीकाकरण अभियानों में गिना जाता है। हर साल देशभर में करोड़ों बच्चों को पोलियो की खुराक पिलाई जाती है। इस अभियान में लाखों डॉक्टर, आशा कार्यकर्ता, आंगनवाड़ी सेविकाएं, नर्सें और स्वास्थ्य कर्मचारी भाग लेते हैं।
भारत में पोलियो से जुड़े 5 बड़े तथ्य
- 1995 में राष्ट्रीय पल्स पोलियो अभियान शुरू हुआ।
- 13 जनवरी 2011 को भारत में आखिरी पोलियो मरीज मिला।
- 27 मार्च 2014 को WHO ने भारत को पोलियो मुक्त घोषित किया।
- महाराष्ट्र में आखिरी मामला सितंबर 2010 में बीड में मिला था।
- आज भी हर साल करोड़ों बच्चों को पोलियो की खुराक दी जाती है।
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28 जून को पल्स पोलियाे अभियान
केंद्र सरकार के दिशानिर्देशों के अनुसार, पूरे देश में रविवार यानी 28 जून 2026 को राष्ट्रीय पल्स पोलियो टीकाकरण अभियान चलाया जाएगा। इस अभियान के दौरान 0-5 साल की उम्र के बच्चों को सुबह 8 बजे से शाम 5 बजे के बीच बाइवेलेंट ओरल पोलियो वैक्सीन (bOPV) की दो बूंदें दी जाएंगी।
महाराष्ट्र में इस बार कितने बच्चों को दवा पिलाई जाएगी?
महाराष्ट्र सरकार के अनुसार, 28 जून 2026 को राज्य में लगभग 1.03 करोड़ बच्चों को पोलियो की खुराक दी जाएगी। इसके लिए पूरे राज्य में 89,489 पोलियो बूथ, 26,530 ट्रांजिट टीमें, 13,518 मोबाइल टीमें, 586 नाइट शिफ्ट टीमें तैनात की गई हैं।
