प्रतीकात्मक फोटो, सोर्स- सोशल मीडिया
Indian Defense Tender 2026: वायुसेना के पुराने लेकिन भरोसेमंद साथी ‘जगुआर’ लड़ाकू विमानों को अब पूरी तरह से आधुनिक बनाने की तैयारी शुरू हो चुकी है। यह केवल एक तकनीकी बदलाव नहीं है, बल्कि बदलते वैश्विक समीकरणों के बीच भारत की अपनी सुरक्षा तैयारियों को पुख्ता करने की दिशा में एक बड़ा रणनीतिक कदम है।
इस पूरी परियोजना का सबसे रोमांचक हिस्सा है जगुआर विमानों में होने वाला हथियारों का बदलाव। वर्तमान में इन विमानों में पुरानी ‘मैजिक’ एयर-टू-एयर मिसाइल प्रणाली का उपयोग किया जा रहा है। अब मंत्रालय ने इसे हटाकर ‘नेक्स्ट जेनरेशन क्लोज कॉम्बैट मिसाइल’ (NGCCM) लगाने का फैसला किया है। यह एक ऐसी आधुनिक मिसाइल है जिसे ‘एडवांस्ड शॉर्ट रेंज एयर-टू-एयर मिसाइल’ (ASRAAM) के रूप में जाना जाता है।
इस अपग्रेड का सीधा असर यह होगा कि जगुआर विमान अब कम दूरी की हवाई लड़ाई में पहले से कहीं ज्यादा खतरनाक साबित होंगे। विमान के पुराने वायरिंग सर्किट को बदलकर उसे नई पीढ़ी की मिसाइलों के अनुकूल बनाया जाएगा, जिससे पायलट के पास दुश्मन को जवाब देने के लिए बहुत ही कम समय में सटीक विकल्प मौजूद होंगे। एक आम नागरिक के तौर पर इसे इस तरह समझा जा सकता है कि आपके पास एक ऐसा हथियार होगा जो पहले के मुकाबले ज्यादा तेज, ज्यादा दूर तक मार करने वाला और पूरी तरह से अचूक होगा।
तकनीक की दुनिया में इसे एक क्रांतिकारी कदम माना जा रहा है। इस अपग्रेड के तहत 74 जगुआर विमानों में ‘हेलमेट माउंटेड डिस्प्ले सिस्टम’ (HMDS) लगाया जाएगा। यह तकनीक पायलट के काम करने के तरीके को पूरी तरह से बदल देगी। अब पायलट को विमान के डैशबोर्ड पर नजर गड़ाने की जरूरत नहीं होगी, बल्कि उसके हेलमेट के शीशे (वाइजर) पर ही उड़ान और लक्ष्य से जुड़ी तमाम जानकारियां दिखाई देंगी।
बताया जा रहा है कि इस प्रोजेक्ट की सबसे बड़ी खूबी यह है कि पायलट जिस दिशा में अपना सिर घुमाएगा, मिसाइल का सिस्टम भी उसी दिशा में लॉक हो जाएगा। यानी अब दुश्मन का विमान पायलट की नजरों से बचकर कहीं नहीं जा पाएगा। इससे हवाई लड़ाई में ‘रिएक्शन टाइम’ बहुत कम हो जाएगा और सटीकता कई गुना बढ़ जाएगी। यह आधुनिक तकनीक हमारे जांबाज पायलटों को युद्ध के मैदान में वह बढ़त दिलाएगी, जिसकी आज के दौर में सबसे ज्यादा जरूरत है।
सरकार ने इस पूरे प्रोजेक्ट में एक बहुत ही महत्वपूर्ण शर्त रखी है- यह काम केवल भारतीय रक्षा कंपनियां ही करेंगी। आत्मनिर्भर भारत नीति के तहत घरेलू कंपनियों से इसके लिए टेंडर आमंत्रित किए गए हैं। यह न केवल देश के रक्षा उद्योग के लिए एक बड़ा अवसर है, बल्कि इससे हजारों लोगों के लिए रोजगार और नई तकनीकों के विकास के रास्ते भी खुलेंगे। चयनित कंपनी को कुल 74 विमानों (जिनमें 24 डारिन-II और 50 डारिन-III शामिल हैं) का अपग्रेड महज तीन साल के भीतर पूरा करना होगा। कंपनी के पास हर विमान को बदलने और उसका परीक्षण करने के लिए लगभग 45 दिनों का समय होगा। यह काम देश के अलग-अलग एयरबेस जैसे अंबाला, जामनगर, भुज, सूरतगढ़ और गोरखपुर में किया जाएगा, जबकि तकनीकी परीक्षण का मुख्य केंद्र बेंगलुरु स्थित हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) होगा।
जगुआर विमान भारतीय वायुसेना में 1970 के दशक के अंत से अपनी सेवाएं दे रहे हैं और अपनी लो-लेवल स्ट्राइक क्षमता के लिए मशहूर रहे हैं। हालांकि वायुसेना अब राफेल और तेजस मार्क-1ए जैसे नए और आधुनिक विमानों को शामिल कर रही है, लेकिन जगुआर बेड़े की अहमियत अभी भी कम नहीं हुई है।
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इस अपग्रेड का मुख्य उद्देश्य इन विमानों को इस दशक के अंत तक सेवा में बनाए रखना है। जब ये विमान जमीन पर हमला करने के मिशन पर होंगे, तब ये आधुनिक हवाई खतरों से अपना बचाव करने में ज्यादा सक्षम होंगे। इस तरह यह पुराना योद्धा एक नए अवतार में देश की रक्षा के लिए तैयार हो जाएगा, जो न केवल किफायती है बल्कि सामरिक दृष्टि से भी अत्यंत आवश्यक है।