चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार, फोटो- सोशल मीडिया
Gyanesh Kumar Impeachment Motion: भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी पंचायत यानी संसद का बजट सत्र इन दिनों एक युद्ध के मैदान में तब्दील होता नजर आ रहा है। एक तरफ सरकार अपनी नीतियों और बजट के भरोसे आगे बढ़ने की कोशिश कर रही है, तो दूसरी तरफ विपक्ष ने ‘फ्रंटफुट’ पर आकर सरकार की घेराबंदी शुरू कर दी है। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने के बाद अब विपक्ष ने एक और बड़ा धमाका किया है।
सूत्रों की मानें तो देश के मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार अब विपक्ष के निशाने पर हैं और उनके खिलाफ महाभियोग लाने की पूरी पटकथा तैयार की जा चुकी है। यह घटनाक्रम केवल राजनीतिक खींचतान नहीं है, बल्कि देश की संवैधानिक संस्थाओं की साख और जनता के भरोसे से जुड़ा एक संवेदनशील मुद्दा बन गया है।
राजनीतिक गलियारों में चर्चा गरम है कि इंडिया गठबंधन के सांसदों ने मुख्य चुनाव आयुक्त को उनके पद से हटाने के लिए कमर कस ली है। जानकारी के अनुसार, इस महाभियोग प्रस्ताव के नोटिस पर अब तक 180 सांसदों ने अपने हस्ताक्षर कर दिए हैं। इसमें लोकसभा के 120 और राज्यसभा के 60 सदस्य शामिल हैं।
सूत्रों का दावा है कि विपक्षी सांसद 12 या 13 मार्च को इस प्रस्ताव को आधिकारिक तौर पर पेश कर सकते हैं। यह केवल संख्या का खेल नहीं है, बल्कि विपक्षी एकजुटता का वह प्रदर्शन है जो सरकार के लिए आने वाले समय में बड़ी चुनौती पेश कर सकता है। जब इतने भारी बहुमत में सांसद किसी संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति के खिलाफ एकजुट होते हैं, तो सरकार के लिए जवाबदेही तय करना अनिवार्य हो जाता है।
आखिर वह क्या वजह है जिसने विपक्ष को इतना बड़ा कदम उठाने पर मजबूर किया? इस पूरी रणनीति के केंद्र में पश्चिम बंगाल के चुनाव और वहां की वोटर लिस्ट का मुद्दा है। तृणमूल कांग्रेस का आरोप है कि बंगाल में ‘स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन’ के नाम पर धांधली की जा रही है और बड़े पैमाने पर सही वोटरों के नाम काटे जा रहे हैं।
टीएमसी नेताओं का कहना है कि उनकी चुनाव आयोग के साथ तीन बार बैठकें हुईं, लेकिन वे सभी बेनतीजा रहीं। इसके अलावा, महाभियोग के ड्राफ्ट में मुख्य चुनाव आयुक्त पर पक्षपातपूर्ण व्यवहार, भेदभाव और संवैधानिक संस्थाओं के दुरुपयोग जैसे गंभीर आरोप लगाए गए हैं। टीएमसी डेलीगेशन के साथ चुनाव आयोग में कथित तौर पर हुए दुर्व्यवहार को भी इस प्रस्ताव का एक मुख्य आधार बनाया गया है।
भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में यह पहली बार होगा जब किसी मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ महाभियोग की प्रक्रिया शुरू की जा रही है। संविधान के अनुच्छेद 324(5) के तहत मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने के प्रावधान वैसे ही हैं, जैसे सुप्रीम कोर्ट के जजों को हटाने के होते हैं। इसके लिए ‘साबित कदाचार’ या अक्षमता का आधार होना जरूरी है।
इससे पहले 1993 में जस्टिस वी. रामास्वामी के खिलाफ महाभियोग का मामला चर्चा में आया था, लेकिन वह प्रस्ताव गिर गया था। ज्ञानेश कुमार के खिलाफ यह कदम उठाकर विपक्ष न केवल एक व्यक्ति को चुनौती दे रहा है, बल्कि चुनाव प्रक्रिया की पारदर्शिता पर भी एक बड़ा सवालिया निशान लगा रहा है।
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विपक्ष इस बात से भली-भांति वाकिफ है कि संसद में संख्या बल के हिसाब से सरकार मजबूत स्थिति में है और शायद यह प्रस्ताव गिर जाए। लेकिन यहां मकसद केवल जीत-हार नहीं, बल्कि एक ‘नैरेटिव’ सेट करना है। राहुल गांधी से लेकर ममता बनर्जी और अखिलेश यादव तक, सभी विपक्षी नेता लगातार यह आरोप लगा रहे हैं कि देश की संवैधानिक संस्थाओं पर सरकार का कब्जा है।
संसद के बजट सत्र के पहले चरण में लोकसभा के भीतर सियासी तनातनी बढ़ गई है। नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी को सदन में बोलने की अनुमति नहीं मिलने के बाद विपक्ष ने लोकसभा स्पीकर ओम बिरला के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने का फैसला किया। बताया जा रहा है कि राहुल गांधी बजट से जुड़े मुद्दों पर बोलने के बजाय पूर्व सेना प्रमुख जनरल मनोज मुकुंद नरवणे की अप्रकाशित किताब में चीन के साथ सीमा विवाद को लेकर लिखे गए अंश पर अपनी बात रखना चाहते थे। हालांकि स्पीकर ने उन्हें इस विषय पर बोलने की अनुमति नहीं दी। इसके बाद विपक्षी दलों ने इसे लेकर नाराजगी जताई और स्पीकर ओम बिरला के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने का फैसला लिया।