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शादी से पहले शारीरिक संबंध बनाना कैरेक्टर पर दाग नहीं...सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, जानें पूरा मामला

Supreme Court's Remark: सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि दो अविवाहित वयस्कों के बीच आपसी सहमति से बने शारीरिक संबंध के कारण किसी व्यक्ति के चरित्र पर सवाल नहीं उठाया जा सकता है।

स्निग्धा श्रीवास्तव

Supreme Court's Remark On Consensual Relationship Before Marriage: सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा है कि दो अविवाहित बालिग व्यक्तियों के बीच आपसी सहमति से बने शारीरिक संबंध के कारण किसी व्यक्ति के खराब चरित्र का सर्टिफिकेट नहीं माना जा सकता है। कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि हर प्रेम संबंध का अंत विवाह हो यह जरूरी नहीं और केवल संबंध के विवाह तक न पहुंचने से किसी व्यक्ति को धोखेबाज भी नहीं माना जा सकता।

शादी से पहले 'शारीरिक संबंध' अपराध नहीं

जस्टिस मनमोहन और जस्टिस मनोज मिश्रा की पीठ ने तेलंगाना राज्य स्तरीय पुलिस भर्ती बोर्ड से जुड़े एक मामले की सुनवाई के दौरान कहा कि भारतीय कानून दो अविवाहित वयस्कों को सहमति से संबंध बनाने से नहीं रोकता। बता दें कि मामला एक ऐसे उम्मीदवार से जुड़ा था, जिसका चयन पुलिस कांस्टेबल पद पर हुआ था, लेकिन उसके खिलाफ दर्ज एक पुराने आपराधिक मामले का हवाला देते हुए उसकी नियुक्ति रद्द कर दी गई थी। भर्ती बोर्ड ने तर्क दिया था कि उम्मीदवार के खिलाफ दर्ज मामला उसके नैतिक आचरण से जुंडे हैं और उनके चरित्र पर सवाल उठाते हैं। भर्ती बोर्ड ने कहा था कि उम्मीदवार ने अपनी पड़ोस में रहने वाली एक लड़की से शादी का वादा कर कई सालों तक संबंध बनाए, लेकिन उस लड़की से शादी नहीं की। यह मामला साल 2015 में लोक अदालत में समझौते के बाद समाप्त हुआ था। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस दृष्टिकोण को खारिज कर दिया और उम्मीदवार की नियुक्ति पर पुनर्विचार करने का निर्देश दिया।

शादी से पहले शारीरिक संबंध' किसी के कैरेक्‍टर पर काला धब्‍बा नहीं

भारत में अगर कोई लड़का या लड़की शादी से पहले किसी के साथ शारीरिक संबंध बनाते हैं, तो कई उसे समाज में 'कैरेक्‍टर लेस' यानि चरित्रहीन कह दिया जाता है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि शादी से पहले सहमति से बने 'शारीरिक संबंध' के आधार पर किसी के कैरेक्‍टर पर सवाल नहीं उठा सकते और ना ही उसे खराब चरित्र का व्यक्ति कह सकते है। इस रिलेशन के आधार पर किसी के चरित्र का आकलन नही किया जा सकता है। जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस मनमोहन की पीठ ने तेलंगाना पुलिस कांस्टेबल भर्ती से जुड़े एक मामले में उम्मीदवार गजुला तिरुपति के पक्ष में फैसला सुनाते हुए उन्हें बड़ी राहत दी।

भर्ती बोर्ड की मानसिकता पर उठाए सवाल

जानकारी के मुताबिक उम्मीदवार ने भर्ती प्रक्रिया के दौरान इस आपराधिक मामले की जानकारी अपने सत्यापन फॉर्म में दे दी। इसलिए उस पर तथ्य छिपाने का आरोप नहीं लगाया जा सकता है। इसके बावजूद भर्ती बोर्ड का उसे 'नैतिक अधमता' से जुड़े अपराध में शामिल मानना और पुलिस सेवा के लिए अयोग्‍य घोषित करना किसी भी रूप में सही नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस मामले में भर्ती बोर्ड ने लोक अदालत में हुआ समझौते को अपराध स्वीकार करने के बराबर मान लिया था। जबकि रिकॉर्ड में यह प्रमाण नहीं मिले हैं कि समझौता दबाव, धमकी या बलपूर्वक कराया गया था।

संबंध बनाने के बाद शादी से इनकार धोखा नहीं

कोर्ट ने कहा कि जरूरी नही कि हर प्रेम संबंध का अंत विवाह हो। इसको यह भी नही कहा जा सकता है कि एक पक्ष ने दूसरे के साथ धोखा किया है। आज के माहौल में शादी से पहले शारीरिक संबंध सामान्य बात है। सिर्फ इस आधार पर किसी व्यक्ति के कैरेक्‍टर पर सवाल नही उठा सकते। उन्होंने कहा कि ऐसा कोई कानून नहीं है जो दो अविवाहित वयस्कों को अपनी पसंद से संबंध बनाने पर रोक लगाता हो।

आखिर में सुप्रीम कोर्ट ने भर्ती बोर्ड की स्क्रीनिंग समिति के निर्णय को गलत बताते हुए उम्मीदवार के पक्ष में फैसला दिया और तेलंगाना हाई कोर्ट के सिंगल बेंच के आदेश को बहाल कर उसकी नियुक्ति पर पुनर्विचार करने का निर्देश दिया।

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