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नवभारत विशेष: यौन व्यवसाय पर विराम लगाना संभव नहीं, सुप्रीम कोर्ट की राय
- Written By: अंकिता पटेल
Supreme Court Ruling: सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि स्वेच्छा से सेक्स वर्क करने वाली वयस्क महिला अपराधी नहीं है। अदालत ने कानून की व्याख्या करते हुए पुनर्वास और अधिकारों पर महत्वपूर्ण टिप्पणी की।

सुप्रीम कोर्ट,(सोर्स: सोशल मीडिया)
Sex Workers Legal Rights: सुप्रीम कोर्ट ने अपनी स्वतंत्र इच्छा से सेक्स वर्क करने वाली वयस्क महिलाओं को इस कार्य के लिए आजाद कर दिया है; क्योंकि वह उन्हें न पीड़ित मानता है और न ही अपराधी। अदालत के समक्ष सवाल उन महिलाओं के पुनर्वास का था, जिन्हें वेश्यालयों से मुक्त कराया गया था। इसी संदर्भ में न्यायाधीश जेबी पारदीवाला व न्यायाधीश आर माधवन की खंडपीठ ने कहा कि 20वीं शताब्दी के आरंभ में वेश्यावृत्ति के लिए महिलाओं की तस्करी आम बात थी और उसे ‘अनैतिक’ समझा जाता था, इसलिए यह शब्द कानून से जुड़ गया।
खंडपीठ के मुताबिक, ‘हमें यकीन है कि इस कानून का मुख्य उद्देश्य वेश्यावृत्ति को खत्म करने या वेश्यावृत्ति को आपराधिक जुर्म बनाने का नहीं है बल्कि इसका मकसद वेश्यावृत्ति जीविकोपार्जन का संगठित साधन न हो।’ न्यायाधीश पारदीवाला ने 298-पृष्ठ का फैसला लिखते हुए कहा कि इस कानून के सेक्शन 7 के तहत सार्वजनिक स्थलों के करीब वेश्यावृत्ति करना दंडनीय अपराध है।
सेक्शन 8 के तहत सार्वजनिक स्थलों पर ग्राहकों को लुभाना दंडनीय अपराध है। अदालत ने कहा, ‘यह स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि जहां एकल महिला अपने जीविकोपार्जन के लिए वेश्यावृत्ति करती है, बिना किसी अन्य वेश्या के या उस प्रांगण के प्रबंधन में कोई अन्य व्यक्ति शामिल नहीं है, तो वह घर ‘वेश्यालय’ नहीं माना जायेगा।’
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सेक्स वर्कर्स के अधिकारों पर सुप्रीम कोर्ट की स्पष्ट टिप्पणी
एडल्ट सेक्स वर्कर्स के बचाव, राहत व पुनर्वास संबंधी फ्रेमवर्क को तय करने के लिए सुप्रीम कोर्ट का यह फ़ैसला ‘व्यक्ति द्वारा स्वयं निर्णय लेने और अपने कार्यों को नियंत्रित करने की आंतरिक क्षमता’ पर केंद्रित हैं। सुप्रीम कोर्ट ने वेश्याओं को एकदम स्पष्ट श्रेणियों में रखा है
जिनसे जबरन वेश्यावृत्ति करायी जाती है और जो अपनी इच्छा से सेक्स वर्क में शामिल हैं।
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के समर्थकों का मानना है कि अदालत ने शक्तिशाली, सशक्त करने वाला और प्रगतिशील निर्णय दिया है और अनुच्छेद 32 व 142 में अपनी निहित शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए लिखा है कि पुलिस को अपना मिशन किस तरह से अंजाम देना चाहिए।
सेक्स वर्क पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने छेड़ी नई बहस
अदालत के अनुसार, एडल्ट सेक्स वर्कर्स को रेस्क्यू करने से पहले पुलिस व मजिस्ट्रेट को पुख्ता जांच करनी चाहिए, सवाल करने चाहिएं। जिनको रेस्क्यू किया जाता है, उनके लिए सुरक्षित घरों की व्यवस्था करने हेतु भी सुप्रीम कोर्ट ने विस्तृत शर्तें बयान की हैं। बिना किसी उलझन के स्पष्ट है कि वेश्यावृत्ति वैध है, लुभाना अवैध है और एकल महिला अपनी जीविकोपार्जन के लिए अगर वेश्यावृत्ति कर रही है, तो उसे अपराधी नहीं माना जा सकता।
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सुप्रीम कोर्ट के अनुसार अस्पष्टता इस बात में थी कि कानून सभी सेक्स वर्क को ‘अत्याचारपूर्ण व शोषणकारी’ मान रहा था। यह निर्णय अपनी इच्छा से सेक्स वर्क करने वाली वयस्क महिलाओं का सशक्तिकरण करता है कि पुनर्वास या समुदाय में वापसी पर वह अपनी मर्जी व पसंद से फैसला कर सकेंगी। सुप्रीम कोर्ट ने अपनी स्वतंत्र इच्छा से सेक्स वर्क करने वाली महिलाओं को आजादी से सांस लेने का विकल्प दिया है। लेकिन इस सवाल पर चिंताजनक खामोशी है कि एक सभ्य समाज में जीविकोपार्जन के लिए एकल महिला भी सेक्स वर्क के लिए मजबूर क्यों हो? समाज व सरकार उसका सहारा क्यों न बनें ?
सुप्रीम कोर्ट की राय
अनैतिक व्यापार (रोकथाम) अधिनियम 1956 (आईटीपीए), जिसमें 1986 में व्यापक संशोधन किया गया, भारत में मानव तस्करी व व्यावसायिक यौन शोषण को रोकने के लिए बनाया गया मुख्य कानून है। इस 70 वर्ष पुराने कानून का ‘विस्तृत व सूक्ष्म’ अध्ययन करने के बाद सुप्रीम कोर्ट इस नतीजे पर पहुंचा है कि इसका मुख्य उद्देश्य न तो वेश्यावृत्ति को समाप्त करना है और न ही इसे आपराधिक जुर्म बनाना है बल्कि इसके व्यावसायीकरण को रोकना है। दूसरे शब्दों में सुप्रीम कोर्ट यह स्वीकार कर रहा है कि संसार के सबसे पुराने पेशे पर विराम लगाना संभव नहीं है। दुनिया में इसे कहीं भी रोका नहीं जा सका है।
लेख-डॉ. अनिता राठौर के द्वारा
Supreme court clarifies rights of adult sex workers and interpretation of brothel law
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