मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई (सोर्स- सोशल मीडिया)
CJI Gavai Warning about Misuse of AI Against Judiciary: भारत के मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई ने सोमवार को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के बढ़ते दुरुपयोग पर चिंता जताई। उन्होंने बताया कि कई न्यायाधीशों की मॉर्फ्ड तस्वीरें सोशल मीडिया पर फैलाई जा रही हैं। सीजेआई ने कहा कि ऐसी हरकतें न्याय व्यवस्था की साख पर चोट कर सकती हैं। उन्होंने AI पर नियंत्रण के लिए सख्त नियमों की मांग की है।
मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई ने खुलासा किया कि न्यायपालिका के सदस्यों की मॉर्फ्ड (छेड़छाड़ की गई) तस्वीरें इंटरनेट पर वायरल की जा रही हैं। उन्होंने कहा, “हां, हमने भी अपनी मॉर्फ्ड तस्वीरें देखी हैं।” यह टिप्पणी उन्होंने एक जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई के दौरान कही, जिसमें न्यायिक और अर्ध-न्यायिक संस्थानों में जनरेटिव एआई (GenAI) के उपयोग के लिए नीति बनाने की मांग की गई थी।
याचिकाकर्ता अधिवक्ता कार्तिकेय रावल ने अदालत में बताया कि AI और जनरेटिव AI में बड़ा फर्क है। जहां पारंपरिक AI सिर्फ उपलब्ध डेटा का विश्लेषण करता है, वहीं जनरेटिव AI नया डेटा बना सकता है, यहां तक कि झूठे केस कानून भी तैयार कर सकता है। इससे न्यायिक प्रक्रिया में भ्रम और फर्जी सूचनाओं के खतरे बढ़ जाते हैं।
याचिका में कहा गया है कि जनरेटिव एआई की “ब्लैक बॉक्स” प्रकृति न्याय व्यवस्था में पारदर्शिता को प्रभावित कर सकती है। ऐसे सिस्टम नए और काल्पनिक कानूनी उदाहरण तैयार कर सकते हैं, जिससे गलत निर्णय या Hallucination जैसी स्थिति बन सकती है। यह भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता के अधिकार) का उल्लंघन माना जा सकता है।
याचिकाकर्ता ने कहा कि किसी भी AI सिस्टम को न्यायपालिका में लागू करने से पहले डेटा की गुणवत्ता, निष्पक्षता और स्वामित्व सुनिश्चित किया जाना चाहिए। AI के उपयोग में सभी हितधारकों की जवाबदेही तय होनी चाहिए ताकि कोई भी पक्षपात न हो।
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न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की पीठ ने फिलहाल इस मामले की सुनवाई दो हफ्ते के लिए स्थगित कर दी है। सुप्रीम कोर्ट अब जल्द ही AI के नियमन पर इस महत्वपूर्ण याचिका पर सुनवाई करेगा। सीजेआई गवई की यह टिप्पणी इस बात की ओर इशारा करती है कि AI तकनीक जहां सुविधाएं ला रही है, वहीं उसका गलत इस्तेमाल न्याय और सच्चाई पर गहरा खतरा बन सकता है।