Explainer: बिना वर्दी पुलिस की ड्यूटी कितनी कानूनी? जंतर-मंतर पर लाठीचार्ज के बाद मचा बवाल, क्या कहते हैं नियम
Delhi Jantar Mantar Protest: जंतर-मंतर प्रदर्शन के बाद सादे कपड़ों में पुलिस की भूमिका पर सवाल उठे हैं। जानिए कानून क्या कहता है, कब बिना वर्दी ड्यूटी की अनुमति होती है और बल प्रयोग के नियम क्या हैं।
- Written By: अक्षय साहू
सादी वर्दी में प्रदर्शनकारियों पर लाठीचार्ज करती दिल्ली पुलिस (सोर्स- सोशल मीडिया)
Jantar Mantar CJP Protest: दिल्ली के जंतर-मंतर पर जारी विरोध प्रदर्शन के दौरान पुलिस की कार्रवाई को लेकर नया विवाद खड़ा हो गया है। प्रदर्शन कर रहे छात्रों का आरोप है कि कुछ पुलिसकर्मी सादे कपड़ों में आए और उन्होंने प्रदर्शनकारियों के साथ मारपीट की तथा लाठियां चलाईं। इस घटना के कई वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुए, जिसके बाद पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल उठने लगे। सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या पुलिस बिना वर्दी के ड्यूटी कर सकती है और क्या ऐसे पुलिसकर्मियों को बल प्रयोग करने का अधिकार होता है? आइए आसान भाषा में समझते हैं।
जंतर-मंतर पर विरोध प्रदर्शन के दौरान सोशल मीडिया पर कई तस्वीरें और वीडियो सामने आए। इनमें से कुछ लोग सादे कपड़ों में हाथों में लाठी लिए पुलिस के साथ दिखाई दिए। प्रदर्शनकारियों ने आरोप लगाया कि यही लोग भीड़ के खिलाफ बल प्रयोग कर रहे थे। वीडियो वायरल होने के बाद दिल्ली पुलिस ने अपने अधिकारियों को निर्देश दिया कि ड्यूटी पर तैनात सभी पुलिसकर्मी वर्दी में रहें ताकि उनकी पहचान स्पष्ट रहे और किसी तरह का भ्रम न पैदा हो।
क्या पुलिस सादे कपड़ों में ड्यूटी कर सकती है?
भारतीय कानून में ऐसा कोई नियम नहीं है जो पुलिस को हर स्थिति में केवल वर्दी पहनकर ही ड्यूटी करने के लिए बाध्य करता हो। कई परिस्थितियों में पुलिसकर्मियों को सादे कपड़ों में भी तैनात किया जाता है। हालांकि, यह सामान्य व्यवस्था नहीं होती बल्कि विशेष परिस्थितियों में वरिष्ठ अधिकारियों की मंजूरी के बाद ही ऐसा किया जाता है। ऐसी तैनाती का उद्देश्य कानून-व्यवस्था बनाए रखने में मदद करना होता है, न कि खुलकर कार्रवाई करना।
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सादे कपड़ों में दिल्ली पुलिस के जवान (सोर्स- सोशल मीडिया)
किसी विरोध प्रदर्शन, रैली या दंगे जैसी स्थिति में सादे कपड़ों में मौजूद पुलिसकर्मियों का मुख्य काम खुफिया जानकारी जुटाना होता है। वे भीड़ में मौजूद रहकर यह पता लगाते हैं कि कहीं कोई उपद्रवी माहौल खराब करने की कोशिश तो नहीं कर रहा। इसके अलावा वे हिंसा भड़काने वाले लोगों की पहचान करते हैं और जरूरत पड़ने पर वीडियो या तस्वीरें भी रिकॉर्ड करते हैं ताकि बाद में कानूनी कार्रवाई की जा सके।
कब दी जाती है ऐसी तैनाती की अनुमति?
हर राज्य का अपना पुलिस मैनुअल होता है, जिसमें सादे कपड़ों में ड्यूटी से जुड़े दिशा-निर्देश दिए गए हैं। दिल्ली, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र समेत सभी राज्यों में ऐसी तैनाती सिर्फ खासपरिस्थितियों में की जाती है। आमतौर पर डीसीपी, एसपी, पुलिस कमिश्नर या अन्य वरिष्ठ अधिकारी लिखित आदेश जारी करके ही पुलिसकर्मियों को सिविल ड्रेस में ड्यूटी पर भेज सकते हैं। बिना अनुमति ऐसी तैनाती नहीं की जाती।
This CJP protest has exposed the system like never before… Modi administration will do just anything to crush the protest, but listen to the students… How is it possible that NONE of these officers at Jantar Mantar have name plates? What is this sinister planning? pic.twitter.com/bfYAWw9QcN — Komal (@Komal_Indian) July 23, 2026
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) के अध्याय-11 में सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने और भीड़ नियंत्रण से जुड़े प्रावधान दिए गए हैं। हालांकि इसमें यह स्पष्ट नहीं लिखा गया कि पुलिसकर्मी सादे कपड़ों में ड्यूटी कर सकते हैं या नहीं। कानून यह जरूर कहता है कि भीड़ हटाने या कार्रवाई का अधिकार पुलिस अधिकारी और मजिस्ट्रेट को होता है। इसलिए आदेश देने वाले अधिकारी की पहचान स्पष्ट होना बेहद जरूरी माना जाता है।
पहचान सबसे अहम सवाल क्यों है?
विशेषज्ञों का कहना है कि अगर कोई व्यक्ति बिना अपनी पहचान बताए भीड़ को आदेश देता है या बल प्रयोग करता है, तो आम लोगों के लिए यह समझना मुश्किल हो जाता है कि वह वास्तव में पुलिसकर्मी है या कोई अन्य व्यक्ति। ऐसी स्थिति में कार्रवाई की वैधता पर भी सवाल उठ सकते हैं। इसी कारण पुलिस की पहचान स्पष्ट होना कानून और जवाबदेही दोनों के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जाता है।
Who are these lathi-armed goons in plainclothes @DelhiPolice? Who have you hired on your force to beat us up? Why are such monsters called police in India? pic.twitter.com/h3pXcz3RKQ — Cockroach is Back (@Cockroachisback) July 20, 2026
क्या सादे कपड़ों में पुलिस बल प्रयोग कर सकती है?
नियमों और पुलिस प्रोटोकॉल के मुताबिक सादे कपड़ों में तैनात पुलिसकर्मियों की भूमिका मुख्य रूप से निगरानी और सूचना जुटाने तक सीमित होती है। आम तौर पर उन्हें लाठीचार्ज, आंसू गैस छोड़ने या भीड़ पर सीधे बल प्रयोग करने की अनुमति नहीं होती। ऐसी कार्रवाई की जिम्मेदारी वर्दीधारी पुलिस बल और विशेष दंगा नियंत्रण इकाइयों, जैसे रैपिड एक्शन फोर्स (RAF), की होती है।
हालांकि, विशेष परिस्थितियों में यदि सादे कपड़ों में मौजूद पुलिसकर्मी पर जानलेवा हमला होता है या उसकी सुरक्षा को तत्काल खतरा पैदा हो जाता है, तो वह आत्मरक्षा के अधिकार का इस्तेमाल कर सकता है। लेकिन ऐसी हर कार्रवाई की बाद में जांच होती है और यह देखा जाता है कि बल प्रयोग वास्तव में जरूरी था या नहीं। इसलिए यह अधिकार भी पूरी तरह सीमित और जवाबदेही के दायरे में रहता है।
गिरफ्तारी के समय क्या नियम हैं?
यदि सादे कपड़ों में मौजूद कोई पुलिसकर्मी किसी व्यक्ति को हिरासत में लेता है या गिरफ्तार करता है, तो उसे तुरंत अपनी पहचान बतानी होती है। उसे अपना आधिकारिक पहचान पत्र दिखाना पड़ता है ताकि गिरफ्तार किए जा रहे व्यक्ति को यह स्पष्ट हो सके कि कार्रवाई करने वाला व्यक्ति वास्तव में पुलिस अधिकारी है। यह नियम पारदर्शिता और नागरिक अधिकारों की सुरक्षा के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है।
प्रदर्शनकारियों पर लाठीचार्ज करती दिल्ली पुलिस (सोर्स- सोशल मीडिया)
सुप्रीम कोर्ट ने साल 1997 में डी.के. बसु बनाम पश्चिम बंगाल राज्य मामले में गिरफ्तारी और हिरासत को लेकर महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश दिए थे। अदालत ने कहा था कि गिरफ्तारी करने वाले पुलिस अधिकारी की पहचान स्पष्ट होनी चाहिए और उसका नाम या पहचान चिन्ह दिखाई देना चाहिए। हालांकि यह फैसला भीड़ नियंत्रण पर नहीं बल्कि गिरफ्तारी और हिरासत की प्रक्रिया से जुड़ा था, फिर भी पहचान की पारदर्शिता पर अदालत ने विशेष जोर दिया था।
मानवाधिकार आयोग का भी स्पष्ट रुख
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) और अदालतें लगातार यह कहती रही हैं कि कानून-व्यवस्था बनाए रखने के नाम पर पुलिस मनमानी नहीं कर सकती। यदि किसी नागरिक के खिलाफ कार्रवाई की जाती है तो पुलिस की पहचान स्पष्ट होना जरूरी है। इससे नागरिकों के अधिकारों की रक्षा होती है और किसी भी विवाद की स्थिति में जवाबदेही तय करना आसान हो जाता है।
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क्या हैं विशेषज्ञों की राय?
विशेषज्ञों का मानना है कि प्रदर्शन या दंगे जैसी संवेदनशील परिस्थितियों में सादे कपड़ों में पुलिस की मौजूदगी पूरी तरह गैरकानूनी नहीं है। लेकिन उनकी भूमिका खुफिया जानकारी जुटाने, उपद्रवियों की पहचान करने और सबूत इकट्ठा करने तक सीमित रहनी चाहिए। भीड़ पर सीधा लाठीचार्ज, बल प्रयोग या सार्वजनिक आदेश देने की जिम्मेदारी वर्दीधारी पुलिस की ही होती है। यही व्यवस्था पारदर्शिता, जवाबदेही और नागरिकों के अधिकारों की रक्षा के लिए सबसे उपयुक्त मानी जाती है।
