

Rahul Gandhi PM Residence Protest: भारत में इस समय सियासी पारा काफी गरम है। संसद से लेकर सड़क तक इस समय केवल नीट पेपर लीक का मुद्दा छाया हुआ है। हालांकि, सरकार को एक साथ दो अलग-अलग मोर्चों पर आलोचनाओं का सामना करना पड़ रहा है। एक ओर जहां जंतर-मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) हजारों छात्रों के साथ सरकार के खिलाफ मोर्चा खोला है। मंगलवार को जहां सीजेपी का समर्थन करने अरविंद केजरीवाल, शरद पावर, सुप्रिया सुले और उद्धव ठाकरे जैसे विपक्ष के दिग्गज नेता पहुंचे। मंगलवार को पूरे दिन एक ओर जहां विपक्ष के बड़े नेता सीजेपी का समर्थन करने के लिए जंतर-मंतर जा पहुंच रहे थे, वहीं देश की सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी कांग्रेस और उनके नेता राहुल गांधी जंतर-मंतर से नादरद थे। हालांकि, शाम होते-होते नजारा बिल्कुल बदल गया और राहुल हर न्यूज चैनल पर थे। क्योंकि राहुल ने जंतर-मंतर जाने की जगह 7, लोक कल्याण मार्ग स्थित प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आधिकारिक आवास के बाहर धरने पर बैठ गए थे। राहुल के एक कदम से सरकार सकते में आ गई और तुंरत राज्य मंत्री जितेंद्र सिंह को उन्हें मनाने भेजा। ऐसे में सवाल आता है कि राहुल गांधी क्यों जंतर-मंतर नहीं गए? राहुल ने जंतर-मंतर की जगह पीएम आवास को ही धरने के लिए क्यों चुना? और सबसे बड़ा सवाल राहुल क्यों CJP के साथ मंच साझा नहीं कर रहे हैं?
मंगलवार को विपक्ष के अधिकांश नेता सीजेपी और सोनम वांगचुक के समर्थन में जंतर-मंतर पर पहुंच रहे थे। एनसीपी (शरद पवार गुट) के प्रमुख शरद पवार और आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल ने भी प्रदर्शनकारियों से मुलाकात की। लेकिन राहुल गांधी ने अलग रास्ता चुना। उन्होंने सीधे प्रधानमंत्री आवास के बाहर बैठकर संदेश दिया कि उनकी लड़ाई सिर्फ एक आंदोलन के समर्थन की नहीं, बल्कि सरकार से सीधे जवाब मांगने की है।
सबसे दिलचस्प बात ये है कि कांग्रेस ने इस प्रदर्शन की योजना पहले ही नहीं बनाई थी। इसके चलते इसकी खबर न ही सरकार को थी, न ही मीडिया को। मीडिया के पास कांग्रेस के प्रदर्शन की खबर तब आई जब राहुल गांधी मार्च करते हुए पीएम आवास पर पहुंचकर धरने पर बैठ गए थे। कांग्रेस के इस अचानक धरने से एक पल के लिए सरकार भी सकते में आ गई थी। क्योंकि प्रधानमंत्री आवास न सिर्फ दिल्ली बल्कि पूरे देश के सबसे संवेदनशील इलाका है। ऐसे में इतनी बड़ी संख्या में कांग्रेस नेताओं के प्रदर्शन ने सरकार के सामने सुरक्षा को लेकर भी चिंताएं बढ़ा दी थीं।
पीएम आवास के सामने प्रदर्शन करने को कांग्रेस और राहुल गांधी का मास्टर स्ट्रोक माना जा रहा है। ऐसा इसलिए क्योंकि पूरी मीडिया सोमवार से लेकर मंगलवार शाम तक सिर्फ सीजेपी को कवर कर रही थी। ऐसे में राहुल गांधी भी अगर जंतर-मंतर पहुंचे तो मीडिया उन्हें केवल सीजेपी के समर्थन में आए दूसरे विपक्षी नेता की तरह ही दिखाती। ऐसे में राहुल ने दूसरा रास्ता अपनाया और पीएम आवास के सामने धरने पर बैठ गए। ऐसे में यह हो ही नहीं सकता था कि मीडिया के कैमरे उनसे ज्यादा देर तक दूर नहीं रह सकते थे।
वरिष्ठ पत्रकार राजदीप सरदेसाई ने सोशल मीडिया मंच एक्स पर लिखा कि यह उन दुर्लभ दिनों में से एक था जब लगभग हर समाचार बुलेटिन के केंद्र में राहुल गांधी थे और इस बार सरकार बचाव की मुद्रा में नजर आ रही थी। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार सार्वजनिक धारणा की राजनीति में यह बदलाव महत्वपूर्ण माना जाता है।
राहुल गांधी के प्रदर्शन की सबसे बड़ी उपलब्धि यह रही कि, उनके धरने पर बैठने के एक घंटे के अंदर ही प्रधानमंत्री कार्यालय में राज्य मंत्री जितेंद्र सिंह उनसे सरकार की ओर से बातचीत करने के लिए पहुंचे। नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद पिछले12 सालों ऐसे मौके बेहद कम देखने को मिले हैं, जब विपक्ष के किसी विरोध प्रदर्शन पर सरकार ने इतनी जल्दी बातचीत की पहल की हो।
जितेंद्र सिंह ने राहुल गांधी से अनुरोध किया कि प्रधानमंत्री आवास के बाहर विरोध जताना उचित तरीका नहीं है। उन्होंने कहा कि सरकार नीट परीक्षा, कथित पेपर लीक और सोमवार को सीजेपी के नेतृत्व में हुए प्रदर्शन के दौरान प्रशासन के रवैये पर चर्चा के लिए तैयार है। उनके अनुसार राहुल गांधी ने पहले सकारात्मक संकेत दिए, लेकिन बाद में बातचीत पर सहमति नहीं बनी।
बीबीसी ने हाल ही में इस मुद्दे को लेकर पंजाब यूनिवर्सिटी के राजनीति विज्ञान के प्रोफेसर आशुतोष कुमार से बात की है। इसमें आशुतोष कुमार ने माना कि सरकार की तत्काल प्रतिक्रिया यह संकेत देती है कि वह राजनीतिक दबाव महसूस कर रही थी। उनके अनुसार युवा मतदाता, जो लंबे समय तक बीजेपी का मजबूत समर्थन आधार माने जाते रहे, अब शिक्षा और रोजगार जैसे मुद्दों पर सवाल पूछ रहे हैं।
आशुतोष कुमार कहते हैं कि नीट विवाद केवल छात्रों का मुद्दा नहीं रह गया है। इसका असर उस शहरी और मध्यवर्गीय तबके पर भी पड़ा है, जिसने पिछले कई चुनावों में बीजेपी का समर्थन किया। यदि इसी वर्ग में सरकार की विश्वसनीयता पर सवाल उठने लगें तो राजनीतिक असर व्यापक हो सकता है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पेपर लीक और प्रतियोगी परीक्षाओं में गड़बड़ी जैसे मुद्दे सीधे उन परिवारों को प्रभावित करते हैं जिनकी सबसे बड़ी प्राथमिकता शिक्षा और सरकारी नौकरियां होती हैं। ऐसे में यह विवाद केवल एक परीक्षा तक सीमित नहीं रहता बल्कि शासन की क्षमता और पारदर्शिता पर भी सवाल खड़े करता है। विश्लेषकों के अनुसार सरकार की तेज प्रतिक्रिया विपक्ष के प्रति नरमी नहीं, बल्कि उस राजनीतिक जोखिम को कम करने की कोशिश भी हो सकती है जो युवाओं और मध्य वर्ग में बढ़ते असंतोष से पैदा हुआ है।
आशुतोष कुमार के मुताबिक, प्रधानमंत्री आवास के बाहर लंबे समय तक विपक्ष का धरना सरकार के लिए असहज स्थिति पैदा कर सकता था। इसलिए बातचीत की पहल का उद्देश्य तनाव कम करना और राजनीतिक नुकसान को सीमित करना भी हो सकता है। उनका कहना है कि जैसे-जैसे मीडिया में राहुल गांधी के बयान और तस्वीरें प्रमुखता से आने लगीं, सरकार के सामने यह चुनौती थी कि वह स्थिति को ज्यादा लंबा न खिंचने दे। इसलिए तत्काल संवाद की कोशिश को राजनीतिक रणनीति के रूप में भी देखा जा सकता है।
यह सच है कि कॉकरोच जनता पार्टी और सोनम वांगचुक ने नीट पेपर लीक मामले को देश के हर घर तक पहुंचाया। लेकिन इस मुद्दे को सबसे पहले कांग्रेस और राहुल गांधी ने ही उठाया था और फिर बाद में सीजेपी ने इसे लेकर जंतर-मंतर पर धरना प्रदर्शन शुरू किया था। राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, राहुल गांधी नहीं चाहते कि कांग्रेस द्वारा सबसे पहले उठाए गए मुद्दे का श्रेय किसी और को मिले। इसके अलावा कॉकरोच जनता पार्टी के संस्थापक अभिजीत दीपके पहले आम आदमी पार्टी से जुड़े रहे हैं और कांग्रेस को लगता है कि भविष्य में सीजेपी आम आदमी पार्टी (AAP) में शामिल हो सकती है। इसके चलते कांग्रेस दीपके से दूरी बनाए हुए है।
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