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Budget 2026 Analysis: जब भारतीय जनता पार्टी पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव की तैयारी में जुटी है और यूजीसी के नए नियमों को लेकर ‘उच्च जाति’ की नाराजगी का सामना कर रही है, ऐसे में सुस्त केंद्रीय बजट 2026-27 ने सबको चौंका दिया है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के पिटारे में न तो चुनावी राज्यों के लिए कोई बड़ा ऐलान दिखा और न ही कोई स्पष्ट राजनीतिक संदेश नजर आया।
बजट में राजनीतिक लुभावने वादों की जगह आर्थिक और नीतिगत मुद्दों पर ज्यादा जोर दिया गया है, जिसने विश्लेषकों को सोचने पर मजबूर कर दिया है। भाजपा के पारंपरिक वोटर माने जाने वाले मध्यम वर्ग और उच्च जातियों के लिए यह बजट मायूसी लेकर आया। इसके पीछे क्या कारण हैं चलिए विस्तार से जानते हैं…
जहां पिछले साल के बजट में वित्त मंत्री ने ‘मध्यम वर्ग’ शब्द का सात बार जिक्र किया था, वहीं इस बार के भाषण में यह शब्द पूरी तरह नदारद रहा। आयकर में कोई राहत नहीं मिली, बस फॉर्म और नियमों को सरल बनाने का वादा किया गया। सरकार का कहना है कि नए फॉर्म ऐसे होंगे जिन्हें आम आदमी आसानी से भर सके, लेकिन टैक्स में छूट की उम्मीद लगाए बैठे वेतनभोगी वर्ग को इससे कोई खास तसल्ली नहीं मिली है।
साल 2026 में असम, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल और पुडुचेरी में विधानसभा चुनाव होने हैं। असम में भाजपा पिछले दस सालों से मजबूत स्थिति में है, जबकि पश्चिम बंगाल में वह तृणमूल कांग्रेस को कड़ी टक्कर देने के बावजूद अभी तक सत्ता तक नहीं पहुंच पाई है। तमिलनाडु और केरल में पार्टी अपनी जमीन तलाशने में जुटी है।
इतनी बड़ी राजनीतिक लड़ाई के बावजूद बजट भाषण में इन राज्यों का नाम बमुश्किल ही सुनने को मिला। पश्चिम बंगाल का नाम एक बार भी नहीं लिया गया, हालांकि राज्य के सिलीगुड़ी और दुर्गापुर का उल्लेख अलग-अलग परियोजनाओं के संदर्भ में जरूर हुआ। असम का जिक्र भी सिर्फ एक बार प्रस्तावित बौद्ध सर्किट के संदर्भ में किया गया।
हैरानी की बात यह है कि पिछले साल के बजट में बिहार का छह बार जिक्र हुआ था और वहां के लिए कई बड़ी घोषणाएं की गई थीं, जबकि इस बार बिहार में एनडीए को बहुमत मिलने के बावजूद राज्य का कहीं जिक्र नहीं था। इसी तरह आंध्र प्रदेश, जो एनडीए के लिए राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है और जहां सहयोगी टीडीपी की मजबूत पकड़ है, उसका नाम भाषण में सिर्फ दो बार आया।
कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने भी पिछले साल आंध्र प्रदेश की अनदेखी और बिहार पर फोकस को लेकर सवाल उठाए थे, लेकिन इस बार तो चुनावी राज्यों के लिए किसी बड़े पैकेज या राज्य-विशिष्ट वित्तीय आवंटन की घोषणा ही नहीं की गई। ऐसा लगता है कि सरकार ने राज्यों के लिए अलग से बजट मद रखने के बजाय उन्हें बहु-राज्यीय योजनाओं और क्षेत्रीय गलियारों में शामिल करने की रणनीति अपनाई है।
पीएम मोदी व निर्मला सीतारमण (सोर्स- सोशल मीडिया)
भले ही बजट में चुनावी राज्यों का नाम जोर-शोर से नहीं लिया गया हो, लेकिन कुछ घोषणाओं के जरिए वहां के वोटरों को साधने की कोशिश जरूर की गई है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने नारियल और काजू उत्पादन को लेकर बड़ी घोषणाएं कीं, जो सीधे तौर पर केरल और तमिलनाडु जैसे दक्षिणी राज्यों से जुड़ी हैं।
उन्होंने बताया कि देश में करीब 3 करोड़ लोग अपनी आजीविका के लिए नारियल पर निर्भर हैं। सरकार ने पुराने और कम फल देने वाले पेड़ों को हटाकर नए पौधे लगाने की योजना बनाई है। इसके साथ ही, काजू और कोको के लिए एक विशेष कार्यक्रम लाने की बात कही गई है, जिसका लक्ष्य 2030 तक भारतीय उत्पादों को प्रीमियम ग्लोबल ब्रांड बनाना है।
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चंदन की खेती को बढ़ावा देने का वादा भी तमिलनाडु और केरल के लिए एक अप्रत्यक्ष संदेश है। सरकार ने इन राज्यों का नाम लिए बिना कहा कि वह चंदन की प्रोसेसिंग और खेती को बढ़ावा देगी। इसके अलावा, दुर्लभ खनिजों के खनन और प्रसंस्करण के लिए ओडिशा, केरल, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु में विशेष गलियारे बनाने की बात कही गई है। तीन नए अखिल भारतीय आयुर्वेद संस्थानों में से एक के केरल में खुलने की संभावना है, जो राज्य के लिए एक बड़ी सौगात हो सकती है।
कनेक्टिविटी के मोर्चे पर भी कुछ अहम ऐलान किए गए हैं। बजट में सात हाई-स्पीड रेल मार्गों को विकसित करने का प्रस्ताव है। इनमें मुंबई-पुणे, पुणे-हैदराबाद, हैदराबाद-बेंगलुरु, हैदराबाद-चेन्नई, चेन्नई-बेंगलुरु, दिल्ली-वाराणसी और वाराणसी-सिलीगुड़ी शामिल हैं। इनमें से दो कॉरिडोर चेन्नई से और एक पश्चिम बंगाल के सिलीगुड़ी से होकर गुजरेगा, जो इन राज्यों में विकास की गति को तेज करेगा।
पूर्वोत्तर भारत के विकास के लिए असम को बौद्ध परिपथ योजना में शामिल किया गया है। इसके अलावा, असम के तेजपुर में मानसिक स्वास्थ्य संस्थान एनआईएमएनएचएस की शाखा खोलने का प्रस्ताव है, जिससे स्वास्थ्य सुविधाएं बेहतर होंगी। साथ ही, पहाड़ी और सीमावर्ती इलाकों में ‘अगर’ की खेती को बढ़ावा देने की बात कहकर स्थानीय रोजगार पैदा करने की कोशिश की गई है।
एक दिलचस्प राजनीतिक मोड़ तब देखने को मिला जब विपक्ष ने मनरेगा का नाम बदलने की चर्चा पर सरकार की आलोचना की। इसके जवाब में बजट में महात्मा गांधी का नाम एक नई योजना के साथ वापस लाया गया। वित्त मंत्री ने खादी, हथकरघा और हस्तशिल्प को बढ़ावा देने के लिए ‘महात्मा गांधी ग्राम स्वराज पहल’ शुरू करने का ऐलान किया। इसका उद्देश्य इन उत्पादों की वैश्विक ब्रांडिंग करना है।
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कुल मिलाकर, बजट में सांस्कृतिक संदर्भ कम थे और आर्थिक प्राथमिकताओं पर जोर ज्यादा था, लेकिन वित्त मंत्री द्वारा पहनी गई कांजीवरम साड़ी ने दक्षिण भारत के लिए एक प्रतीकात्मक संदेश जरूर दिया। यह बजट चुनावी रेवड़ियों से दूर, दीर्घकालिक आर्थिक सुधारों और बुनियादी ढांचे के विकास पर केंद्रित नजर आता है, भले ही इससे मध्यम वर्ग और चुनावी राज्यों की तत्काल उम्मीदें पूरी न हुई हों।
Ans: बजट 2026 में सरकार ने आयकर छूट या स्लैब में बदलाव की बजाय टैक्स सिस्टम को सरल बनाने पर जोर दिया है। वित्त मंत्री के भाषण में ‘मध्यम वर्ग’ शब्द का जिक्र तक नहीं हुआ, जिससे संकेत मिलता है कि सरकार ने इस बार तात्कालिक राहत की जगह दीर्घकालिक आर्थिक सुधारों को प्राथमिकता दी।
Ans: बजट में चुनावी राज्यों के लिए किसी बड़े राज्य-विशेष पैकेज का ऐलान नहीं हुआ, लेकिन नारियल, काजू, हाई-स्पीड रेल और क्षेत्रीय गलियारों जैसी योजनाओं के जरिए अप्रत्यक्ष रूप से इन राज्यों को साधने की कोशिश की गई है। इसे सरकार की बदली हुई बजट रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है।
Ans: विश्लेषकों के मुताबिक, यह बजट चुनावी लोकलुभावन घोषणाओं से दूर रहकर आर्थिक स्थिरता, इंफ्रास्ट्रक्चर और दीर्घकालिक विकास पर केंद्रित है। इससे यह संकेत मिलता है कि भाजपा फिलहाल वोट बैंक संतुलन से ज्यादा नीतिगत निरंतरता और आर्थिक विश्वसनीयता पर फोकस कर रही है।