जस्टिस प्रशांत अब नहीं कर सकेंगे आपराधिक मामलों की सुनवाई, जानें सुप्रीम कोर्ट ने क्यों लगाई रोक
Supreme Court ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक जज को आपराधिक मामलों की सुनवाई करने से रोका है। कोर्ट ने जज की न्यायिक क्षमता पर सवाल उठाए और उन्हें वरिष्ठ जज के साथ डिवीजन बेंच में बैठने का निर्देश दिया है।
- Written By: प्रतीक पाण्डेय
जस्टिस प्रशांत, फोटो: सोशल मीडिया
Justice Prashant Kumar: सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक जज की न्यायिक क्षमता पर गंभीर प्रश्न उठाते हुए उनके आपराधिक मामलों की सुनवाई करने पर रोक लगा दी है। यह अभूतपूर्व निर्देश सुप्रीम कोर्ट ने उस आदेश पर कड़ी आपत्ति जताते हुए पारित किया, जिसमें हाईकोर्ट ने एक आपराधिक शिकायत को यह कहते हुए रद्द करने से इनकार कर दिया था कि धन की वसूली के लिए सिविल मुकदमे का उपाय प्रभावी नहीं है।
जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने हाईकोर्ट के उस आदेश को “सबसे खराब और गलत आदेशों में से एक” बताया। अदालत ने कहा कि आदेश पारित करने वाले जज को उनकी सेवानिवृत्ति तक किसी भी आपराधिक मामले की स्वतंत्र सुनवाई नहीं सौंपी जानी चाहिए।
क्या कहा सुप्रीम कोर्ट ने?
- संबंधित जज को अब आपराधिक मामलों की स्वतंत्र सुनवाई नहीं सौंपी जाएगी।
- उन्हें अब हाईकोर्ट के एक वरिष्ठ और अनुभवी न्यायाधीश के साथ डिवीजन बेंच में बैठाया जाएगा।
- सुप्रीम कोर्ट ने उनके आदेश को “चौंकाने वाला” बताते हुए कहा कि न्यायिक प्रक्रिया की मूलभूत समझ अपेक्षित है।
मामला क्या था?
सुप्रीम कोर्ट इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार द्वारा पारित उस आदेश के खिलाफ अपील पर सुनवाई कर रहा था, जिसमें आपराधिक दंड संहिता की धारा 482 के तहत धारा 406 (विश्वासघात) के तहत जारी समन रद्द करने की याचिका खारिज कर दी गई थी। हाईकोर्ट ने माना था कि धन की वसूली के लिए सिविल मुकदमे का रास्ता उपलब्ध है, इसलिए आपराधिक कार्यवाही रोकने का आधार नहीं बनता।
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सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को पूरी तरह खारिज करते हुए कहा कि इस तरह के आपराधिक मामले निजी प्रतिशोध के लिए नहीं होने चाहिए और कोर्ट को प्रथम दृष्टया जांच करनी चाहिए कि मामला सिविल प्रकृति का है या आपराधिक।
अब आगे क्या होगा?
हाईकोर्ट के आदेश को रद्द करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने मामले को दोबारा सुनवाई के लिए दूसरी एकल पीठ को भेज दिया है।
संबंधित जज को सीनियर जज की निगरानी में ही अब न्यायिक काम सौंपा जाएगा। सुप्रीम कोर्ट का यह कदम न्यायिक जवाबदेही और गुणवत्ता सुनिश्चित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण संदेश माना जा रहा है।
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कुल मिलाकर सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट कर दिया है कि गैर-जिम्मेदाराना और कानून की मूलभूत समझ से परे किए गए फैसलों को किसी भी स्तर पर स्वीकार नहीं किया जाएगा।
