रोजमर्रा की जिंदगी में इस्तेमाल हो रहे प्लास्टिक उत्पाद (सौ. एआई)
Plastic Health Risk: आज प्लास्टिक हमारे जीवन का एक अहम हिस्सा बन चुकी है। जिसके बिना जीवन की कल्पना करना मुश्किल है। पानी की बोतल, खाने की पैकिंग, कपड़े, इलेक्ट्रॉनिक सामान हर जगह प्लास्टिक पर निर्भरता बढ़ती जा रही है। लेकिन यह धीरे-धीरे इंसानी सेहत को संकट में डाल रही है।
रिसर्चर द्वारा प्रकाशित एक डरावनी रिसर्च ने खुलासा किया है कि प्लास्टिक का पूरा लाइफसाइकिल तेल निकालने से लेकर कचरा बनने तक इंसानों को समय से पहले मौत और बीमारियों की ओर धकेल रहा है। द लैंसेट प्लैनेटरी हेल्थ में छपी इस स्टडी में पहली बार यह अनुमान लगाया गया है कि प्लास्टिक के कारण दुनिया भर में लोग अपनी स्वस्थ लाइफ के कितने साल खो रहे हैं।
शोधकर्ताओं ने अपनी गणना के लिए DALYs (Disability-Adjusted Life Years) नाम के वैश्विक पैमाने का उपयोग किया। यह पैमाना यह मापता है कि किसी बीमारी या समय से पहले हुई मौत के कारण एक व्यक्ति ने अपने जीवन के कितने स्वस्थ साल खो दिए।
स्टडी के आंकड़े चौंकाने वाले हैं। साल 2016 में प्लास्टिक के कारण खोए गए स्वस्थ सालों की संख्या 21 लाख थी जो मौजूदा रुझानों के आधार पर 2040 तक बढ़कर 45 लाख से भी ज्यादा होने का अनुमान है। यानी अगर हमने आज प्लास्टिक का मोह नहीं छोड़ा तो आने वाली पीढ़ी अपनी जिंदगी का एक बड़ा हिस्सा बीमारियों में गुजार देगी।
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लंदन स्कूल ऑफ हाइजीन एंड ट्रॉपिकल मेडिसिन की प्रमुख लेखिका मेगन डीनी का कहना है कि यह अनुमान तो सिर्फ हिमशैल का सिरा है। असल नुकसान इससे कहीं ज्यादा हो सकता है क्योंकि इस स्टडी में माइक्रोप्लास्टिक और पैकेजिंग से निकलने वाले रसायनों के खतरों को अभी पूरी तरह शामिल नहीं किया गया है।
रिसर्च के अनुसार सेहत को सबसे ज्यादा नुकसान प्लास्टिक उत्पादन के दौरान निकलने वाली ग्रीन हाउस गैसों से होता है। इसके बाद वायु प्रदूषण और जहरीले रसायनों का नंबर आता है। एक सामान्य प्लास्टिक की बोतल जब बनती है तो वह हवा में जहर घोलती है और जब वह कचरे के ढेर में जाती है तो वह मिट्टी और पानी के जरिए हमारी थाली तक वापस पहुंचती है।
अक्सर हम मानते हैं कि प्लास्टिक को रीसायकल करना पर्याप्त है लेकिन शोधकर्ताओं ने इस दावे को खारिज कर दिया है। रिपोर्ट में साफ कहा गया है कि केवल रीसाइक्लिंग से इस संकट को नहीं टाला जा सकता। सबसे प्रभावी उपाय यह है कि गैर-जरूरी प्लास्टिक का उत्पादन ही बंद किया जाए।
हालांकि तेल उत्पादक देशों के विरोध के कारण प्लास्टिक प्रदूषण पर वैश्विक संधि फिलहाल अटकी हुई है लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि अब इंतजार करने का समय नहीं है। देशों को अपनी राष्ट्रीय सीमाओं के भीतर सख्त नियम बनाने होंगे ताकि इस सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातकाल से बचा जा सके।
प्लास्टिक की समस्या अब केवल समुद्र में तैरते कचरे तक सीमित नहीं है यह हमारे खून और कोशिकाओं तक पहुंच चुकी है। यदि हम 2040 तक अपनी और अपने बच्चों की सेहत को सुरक्षित रखना चाहते हैं तो हमें आज ही प्लास्टिक के प्रति अपनी निर्भरता को खत्म करना होगा।