बारिश के मौसम में शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में मदद कर सकते हैं ये 3 आयुर्वेदिक काढ़े
Immunity Drink For Health: बारिश के मौसम में संक्रमण और मौसमी बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है। ऐसे में कुछ आयुर्वेदिक काढ़े शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को सहारा देने में मददगार माने जाते है।
- Written By: सीमा कुमारी
आयुर्वेदिक काढ़े (सौ.सोशल मीडिया)
Ayurvedic Immunity Drink : बरसात का मौसम अपने साथ ठंडी फुहारें और गर्मी से राहत तो लेकर आता है, लेकिन इसी दौरान सर्दी, खांसी, जुकाम, गले में खराश और वायरल संक्रमण जैसी समस्याएं भी तेजी से बढ़ने लगती हैं। वातावरण में बढ़ी नमी वायरस और बैक्टीरिया के पनपने के लिए अनुकूल मानी जाती है। ऐसे में शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता का मजबूत होना बेहद जरूरी है।
अगर आप मानसून के दौरान अपनी सेहत का बेहतर तरीके से ख्याल रखना चाहते हैं, तो आयुर्वेद में बताए गए कुछ पारंपरिक काढ़े आपकी दिनचर्या का हिस्सा बन सकते हैं। हालांकि ये किसी बीमारी का इलाज नहीं हैं, लेकिन संतुलित आहार और स्वस्थ जीवनशैली के साथ इनका सीमित मात्रा में सेवन प्रतिरक्षा तंत्र को समर्थन देने में सहायक माना जाता है।
काढ़ा क्या होता है और मानसून में इसका सेवन क्यों किया जाता है?
काढ़ा आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियों, मसालों और औषधीय पौधों को पानी में उबालकर तैयार किया जाने वाला पारंपरिक पेय है। आयुर्वेद के अनुसार, यह पाचन क्रिया को बेहतर बनाने, कफ को संतुलित रखने और शरीर की प्राकृतिक रोग प्रतिरोधक क्षमता को सहयोग देने में मददगार माना जाता है। यही वजह है कि बारिश के मौसम में कई लोग इसका सीमित मात्रा में सेवन करते हैं।
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तुलसी, अदरक और काली मिर्च का काढ़ा
मानसून में सबसे अधिक पसंद किए जाने वाले घरेलू काढ़ों में तुलसी और अदरक का काढ़ा शामिल है। इसे बनाने के लिए दो कप पानी में 10–12 तुलसी की पत्तियां, एक छोटा टुकड़ा कुटा हुआ अदरक और 3–4 कुटी हुई काली मिर्च डालकर तब तक उबालें, जब तक पानी आधा न रह जाए। इसके बाद इसे छानकर हल्का गुनगुना होने पर स्वादानुसार गुड़ या शहद मिलाकर पिया जा सकता है।
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आयुर्वेद के अनुसार तुलसी और अदरक गले की खराश, मौसमी सर्दी-खांसी और शरीर की प्राकृतिक प्रतिरक्षा क्षमता को समर्थन देने में सहायक माने जाते हैं।
गिलोय, हल्दी और पुदीना से तैयार काढ़ा
गिलोय और हल्दी का काढ़ा भी आयुर्वेद में काफी लोकप्रिय माना जाता है। इसे बनाने के लिए गिलोय की डंडी का छोटा टुकड़ा कूटकर दो कप पानी में डालें। इसमें आधा चम्मच हल्दी और 4–5 पुदीने की पत्तियां मिलाकर पानी को आधा होने तक उबालें। फिर इसे छानकर हल्का गुनगुना होने पर स्वादानुसार मिश्री या सेंधा नमक मिलाकर सेवन करें।
आयुर्वेद में गिलोय और हल्दी को शरीर की प्राकृतिक रोग प्रतिरोधक क्षमता को सहयोग देने वाला माना गया है। हालांकि यह किसी भी बीमारी या बुखार का उपचार नहीं है। यदि तेज बुखार, लगातार खांसी या गंभीर लक्षण हों, तो डॉक्टर से तुरंत सलाह लें।
दालचीनी, लौंग और काली मिर्च का हर्बल काढ़ा
मानसून के दौरान दालचीनी, लौंग और काली मिर्च से बना काढ़ा भी पारंपरिक रूप से पिया जाता है। इसे तैयार करने के लिए दो कप पानी में एक छोटा दालचीनी का टुकड़ा, 2–3 लौंग, 3–4 काली मिर्च और चाहें तो कुछ तुलसी की पत्तियां डालकर अच्छी तरह उबालें। पानी आधा रह जाए तो छानकर गुनगुना सेवन करें।
आयुर्वेद के अनुसार यह मिश्रण पाचन को बेहतर रखने, गले को आराम पहुंचाने और मौसम बदलने के दौरान शरीर की प्रतिरोधक क्षमता को सहयोग देने में मददगार माना जाता है।
काढ़ा पीते समय किन बातों का ध्यान रखना चाहिए?
काढ़ा फायदेमंद माना जाता है, लेकिन इसका सेवन सीमित मात्रा में ही करना चाहिए। सामान्य तौर पर दिन में एक या दो बार आधा कप काढ़ा पर्याप्त माना जाता है। अधिक मात्रा में सेवन करने से कुछ लोगों को एसिडिटी, पेट में जलन या अन्य असुविधा हो सकती है।
यदि काढ़े में शहद मिलाना हो, तो पहले उसे थोड़ा गुनगुना होने दें। बहुत गर्म पेय में शहद मिलाने से बचना बेहतर माना जाता है।
यदि आप गर्भवती हैं, स्तनपान करा रही हैं, किसी पुरानी बीमारी से पीड़ित हैं या नियमित दवाइयों का सेवन करते हैं, तो किसी भी आयुर्वेदिक काढ़े को नियमित रूप से पीने से पहले डॉक्टर या योग्य आयुर्वेद विशेषज्ञ की सलाह अवश्य लें। स्वस्थ आहार, पर्याप्त नींद, नियमित व्यायाम और चिकित्सकीय सलाह के साथ ही ऐसे पारंपरिक उपाय सबसे अधिक लाभकारी साबित हो सकते हैं।
