The Networker Review: नेटवर्किंग से व्यापार खड़ा करने का सपना दिखाती है विक्रम कोचर स्टारर ‘द नेटवर्कर’
The Networker Review In Hindi: द नेटवर्कर फिल्म रिलीज हो चुकी है। फिल्म में विक्रम कोचर, दुर्गेश कुमार और इश्तियाक खान जैसे उम्दा कलाकार भी हैं लेकिन ये फिल्म एक हॉलीवुड फिल्म की रीमेक से बढ़कर कुछ भी नहीं है।
- Written By: अनिल सिंह
विक्रम कोचर स्टारर ‘द नेटवर्कर’
- फिल्म: द नेटवर्कर
- निर्देशक: विकास विश्वकर्मा
- रनटाइम : 2 घंटे
- रेटिंग्स: 1.5 स्टार्स
The Networker Review: एक बार फिर बॉलीवुड ने हॉलीवुड की 2015 की फिल्म ‘द नेटवर्कर’ का रीमेक पेश किया है, जिसका निर्देशन विकास विश्वकर्मा ने किया है। उम्मीद थी कि फिल्म कुछ नया कहेगी, वहीं ये बस एक अधूरी, सतही नकल बनकर रह गई है जिसमें न भावनाएं हैं, न कोई ठोस संदेश।
कहानी: कहानी है आदित्य (विक्रम कोचर) की, जिसकी मल्टी-लेवल मार्केटिंग (एमएएलएम) कंपनी ध्वस्त हो जाती है और इसके साथ ही उसके परिवार और निवेशकों की उम्मीदें भी। मजबूरी में वो अपने दोस्त राघव (ऋषभ पाठक) और अनुभवी ठग लल्लन (दुर्गेश कुमार) के साथ मिलकर एक नया जाल बुनता है। एक फर्जी एआई रोबोटिक्स कंपनी बनाई जाती है जो आम जनता के लिए तकनीकी क्रांति का वादा करती है। कंपनी के मुखिया बनाए जाते हैं प्रदीप विश्वास (इश्तियाक ख़ान), जो झूठ को सच साबित करने में माहिर हैं। कुछ ही समय में वे 10,000 करोड़ रुपये की निवेश राशि जुटा लेते हैं और फिर दुबई भाग जाते हैं।
अभिनय: अभिनय की बात करें तो विक्रम कोचर और ऋषभ पाठक अपनी सीमित स्क्रिप्ट में जितना कर सकते थे, करते हैं। दुर्गेश कुमार भी लल्लन के किरदार में ठीक-ठाक हैं। इश्तियाक खान थोड़ी संवेदनशीलता लाने की कोशिश करते हैं, लेकिन स्क्रिप्ट उन्हें बांध देती है।
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फाइनल टेक: फिल्म कॉमेडी-ड्रामा कहलाना चाहती है, लेकिन इसमें न हंसी है, न ही कोई सच्चा इमोशनल कनेक्शन। बृजेन्द्र काला और इश्तियाक खान जैसे कलाकार कुछ पल को हल्का-फुल्का हास्य जरूर लाते हैं, लेकिन पूरी फिल्म में ऐसा कुछ नहीं है जो दिल छू जाए। सबसे ज्यादा निराशाजनक यह है कि इतने बड़े घोटाले के शिकार बने आम लोगों की पीड़ा को फिल्म बस एक सतही मोंटाज में समेट देती है। किसी की मां का इलाज नहीं हो पाता, कोई छात्र कॉलेज में दाखिला नहीं ले पाता, किसी की शादी टूट जाती है। ये गंभीर मसले हैं, लेकिन इन पर फिल्म की नजर सिर्फ एक ‘पैचवर्क’ की तरह है, न कि संवेदनशील कहानी की तरह। असल में, इस फिल्म का सबसे बड़ा ‘स्कैम’ इसकी कहानी में नहीं, बल्कि इसके प्रस्तुतीकरण में है। यह फिल्म खुद को व्यंग्य और सामाजिक संदेश वाली कहानी के तौर पर बेचती है, लेकिन हकीकत में यह एक खोखली पटकथा है जो केवल चालाकी और बनावटी इमोशन्स पर टिकी है।
