Ikka Review: सनी देओल की चीख-पुकार, अक्षय खन्ना के घिसे-पिटे अंदाज ने कोर्टरूम ड्रामा इक्का का किया कबाड़ा
Sunny Deol Film: सनी देओल स्टारर इक्का दमदार कोर्टरूम थ्रिलर बनने का मौका गंवा देती है। कमजोर कहानी, बनावटी ट्विस्ट, फीका स्क्रीनप्ले और स्टारडम पर जरूरत से ज्यादा फोकस फिल्म को निराशाजनक बना देता है।
- Written By: सोनाली झा
इक्का मूवी रिव्यू (फोटो सोर्स-सोशल मीडिया)
Sunny Deol Film Ikka Review: कागज पर सनी देओल और अक्षय खन्ना को एक कोर्टरूम ड्रामे में आमने-सामने देखना एक बेहद रोमांचक आइडिया लगता है, लेकिन निर्देशक सिद्धार्थ पी. मल्होत्रा की फिल्म ‘इक्का’ इस सुनहरे मौके को पूरी तरह बर्बाद कर देती है। फिल्म का नाम ‘इक्का’ होने के बजाय अगर ‘फीका’ होता, तो ज्यादा बेहतर होता। कहानी अल्थिया कौशल द्वारा लिखी गई है, जिसमें एक रसूखदार राजनेता का बेटा शौर्यमान गौर यानी अक्षय खन्ना एक लड़की सोमा यानी आकांक्षा रंजन कपूर के साथ पार्टी करता है और अगले ही पल वह लड़की सड़क किनारे अधमरी हालत में मिलती है।
शौर्यमान को गिरफ्तार कर लिया जाता है और वह अपने बचाव के लिए मशहूर वकील अर्जुन मेहरा उर्फ इक्का यानी सनी देओल को चुनता है। अर्जुन पहले तो केस लेने से मना कर देता है, लेकिन तभी उसकी बेटी को एडवांस स्टेज का कैंसर डायग्नोस होता है और उसका इकलौता बोन मैरो डोनर खुद शौर्यमान निकलता है। कहानी की यह शुरुआत ही इतनी बनावटी और इत्तेफाकों से भरी है कि यह एक समझदार थ्रिलर बनने के बजाय बेहद कमज़ोर और बचकानी लगने लगती है। ऐसे में नवभारत इस फिल्म को 2 स्टार्स रेटिंग देता है और इसके पीछे की वजह जानने के लिए पढ़ें इसका ये मूवी रिव्यू।
अदालत की बहस पर भारी पड़ता स्टारडम
इस फिल्म की सबसे बड़ी खामी यह है कि यह कानूनी दांव-पेंच या अदालत की तीखी बहस पर ध्यान देने के बजाय अपने दोनों मुख्य अभिनेताओं के स्टारडम को चमकाने में ज्यादा व्यस्त रहती है। फिल्म में शौर्यमान और अर्जुन की व्यक्तिगत कहानियों को इतनी अधकची और सतही तरह से दिखाया गया है कि दर्शकों का उनसे कोई जुड़ाव नहीं हो पाता।
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सनी देओल पर था मेकर्स का ध्यान
मेकर्स ने सारा ध्यान इस बात पर लगा दिया कि सनी देओल को टेबल थपथपाने और जोर से चिल्लाने का मौका मिले, जबकि अक्षय खन्ना को अपने चिर-परिचित अंदाज में भौहें सिकोड़कर इंटेंस दिखने का स्पेस मिले। हद तो तब हो जाती है जब मर्डर केस के एक आरोपी को कोर्ट में पेश करते समय बैकग्राउंड में लाउड म्यूजिक बजता है और वह स्लो-मोशन में एंट्री लेता है जैसे कि वह कोई सुपरहीरो हो। वास्तविकता से कोसों दूर यह ड्रामा फिल्म को एक गंभीर कोर्टरूम थ्रिलर बनने से पूरी तरह रोकता है।
किरदारों का खराब स्क्रीनप्ले और दोहराव
अभिनय के मामले में भी यह फिल्म निराश करती है। पूरी फिल्म में दूसरे किरदार बार-बार डायलॉग्स में बताते रहते हैं कि सनी देओल का किरदार अर्जुन मेहरा कितना जीनियस वकील है, लेकिन अदालत के भीतर वह अपनी काबिलियत साबित करने वाला एक भी काम नहीं करता। एक लाचार पिता और अपनी बेटी की बीमारी से जूझ रहे इंसान के रूप में सनी देओल का अभिनय कोई इमोशनल इम्पैक्ट छोड़ने में पूरी तरह नाकाम रहता है।
फिल्म के स्टार कास्ट का किरदार
वहीं अक्षय खन्ना पर उनकी फिल्म ‘धुरंधर’ का हैंगओवर साफ नजर आता है और वह खराब विग के साथ अपने पुराने किरदार को ही दोहराते दिखते हैं। दीया मिर्जा एक बार फिर वैसी ही लाचार मां के रोल में टाइपकास्ट हो गई हैं जैसी वो फिल्म ‘अल्फा’ में थीं। इसके अलावा, तिलोत्तमा शोम जैसी शानदार अभिनेत्री को सरकारी वकील के रूप में एक बेहद कमजोर रोल दिया गया है और आकांक्षा रंजन कपूर के पास फिल्म का मुख्य केंद्र होने के बावजूद करने के लिए कुछ खास नहीं बचा।
घिसा-पिटा और निराशाजनक क्लाइमेक्स
कुल मिलाकर, ‘इक्का’ एक ऐसी फिल्म है जो थियेटर से निकलने के बाद दर्शकों को इसके कानूनी दांव-पेंच या बेहतरीन ट्विस्ट पर चर्चा करने का कोई मौका नहीं देती। यह फिल्म सिर्फ इस बात का अहसास कराती है कि सनी देओल और अक्षय खन्ना जैसे दमदार कलाकारों की मौजूदगी के बावजूद एक बेहतरीन विषय को कितना साधारण और उबाऊ बनाया जा सकता है। अगर फिल्म की राइटिंग थोड़ी पैनी होती और मेकर्स अभिनेताओं के ‘लार्जर दैन लाइफ’ इमेज के बजाय कहानी के सस्पेंस पर भरोसा दिखाते, तो यह एक बेहतरीन कोर्टरूम थ्रिलर बन सकती थी।
