Dhamaal 4 Review: नॉस्टैल्जिया के सहारे चली अजय देवगन की ‘धमाल 4’, कॉमेडी से ज्यादा चीख-पुकार ने किया निराश
Dhamaal 4 Rating: अजय देवगन की 'धमाल 4' कॉमेडी के बजाय नॉस्टैल्जिया पर निर्भर नजर आती है। फिल्म की कहानी 'धमाल' की कॉपी जैसी लगती है, जबकि कमजोर स्क्रीनप्ले, फीका म्यूजिक और खराब CGI निराश करते हैं।
- Written By: सोनाली झा
धमाल 4 मूवी समीक्षा (फोटो सोर्स-सोशल मीडिया)
Ajay Devgn Dhamaal 4 Review: अगर आप ‘धमाल 4’ में कुछ नया देखने की उम्मीद कर रहे हैं, तो आपको भारी निराशा होगी। फिल्म के लेखक परितोष पेंटर ने साल 2007 में आई पहली फिल्म की कहानी की सिर्फ फोटो कॉपी करने का काम किया है। पहले पूरी गैंग एक बड़े से ‘W’ के नीचे छिपे खजाने को ढूंढ रही थी, और इस बार सारा तामझाम एक ‘M’ के नीचे छिपे खजाने के लिए रचा गया है। इस एक अक्षर को बदलने के अलावा निर्देशक इंद्र कुमार और फिल्म की टीम ने फिल्म की कहानी में कोई नयापन लाने की जहमत नहीं उठाई।
फिल्म का पहला हाफ सिर्फ चीखने-चिल्लाने और जबरदस्ती के सब-प्लॉट्स से भरा पड़ा है। डायरेक्टर इंद्रा कुमार ने इस गलतफहमी में पूरी फिल्म बना दी कि अगर परदे पर बहुत सारे कलाकार पागलों की तरह चिल्लाएंगे, अजीब शक्लें बनाएंगे और एक-दूसरे पर गिरेंगे, तो दर्शक हंसने लगेंगे। नतीजा यह हुआ कि इस भारी शोर-शराबे में वे इक्का-दुक्का चुटकुले भी दब गए जिनमें थोड़ा-बहुत दम था। ऐसे में नवभारत ने इस फिल्म को 2 स्टार्स रेटिंग दी है और वो क्यों? ये जानने के लिए पढ़ें फिल्म का पूरा रिव्यू।
बकवास कॉमेडी और रीसायकल किया गया म्यूज़िक
फिल्म का दूसरा हिस्सा पहले से भी ज्यादा उबाऊ और थका देने वाला साबित होता है। मेकर्स ने अपना सारा ध्यान कॉमेडी को बेहतर बनाने के बजाय खराब विजुअल इफेक्ट्स पर लगा दिया, जो स्क्रीन पर बेहद नकली लगते हैं। काश मेकर्स ने थोड़ा वीएफएक्स अपनी कहानी में जान फूंकने और हंसी लाने के लिए भी इस्तेमाल किया होता। फिल्म का संगीत भी उतना ही घिसा-पिटा है जितना कि इसका स्क्रीनप्ले। कुछ नया और ओरिजिनल बनाने के बजाय फिल्म में ‘गुलाबी साड़ी’ और ‘गिलोरी बिना चटनी’ जैसे पहले से ही सोशल मीडिया पर वायरल गानों को ठूंस दिया गया है, जो इस कमजोर कहानी को बिल्कुल सहारा नहीं दे पाते।
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कलाकारों का तालमेल और अभिनय
जब फिल्म की स्क्रिप्ट ही इतनी कमजोर हो, तो बेहतरीन से बेहतरीन कलाकार भी कुछ खास नहीं कर पाता, और यही इस फिल्म के साथ भी हुआ है। पूरी कास्ट में सिर्फ रितेश देशमुख ही इकलौते ऐसे कलाकार नजर आते हैं जो अपने किरदार के साथ न्याय करने की कोशिश कर रहे हैं और फिल्म के कुछ चुनिंदा मजेदार पलों की वजह वही हैं।
अरशद वारसी और जावेद जाफरी की जोड़ी
दूसरी तरफ, अजय देवगन पूरी फिल्म में बेहद थके हुए और बिना किसी दिलचस्पी के काम करते दिखते हैं। अरशद वारसी और जावेद जाफ़री की वह आइकॉनिक जोड़ी, जिसने कभी दर्शकों को हंसने पर मजबूर कर दिया था, इस बार अपनी पुरानी कॉमिक केमिस्ट्री दोहराने में पूरी तरह नाकाम रही। संजय मिश्रा जैसे मंझे हुए अभिनेता को केवल हर डायलॉग के अंत में ‘Bro’ बोलने तक सीमित कर दिया गया। वहीं अंजलि आनंद और संजीदा शेख जैसी अभिनेत्रियों के हिस्से केवल ऐसे किरदार आए हैं, जिनका इस्तेमाल फिल्म में बॉडी-शेमिंग और फूहड़ मजाक उड़ाने के लिए किया गया है।
नॉस्टेल्जिया के भरोसे होगी मोटी कमाई
अंतिम फैसला एक ऐसी फ्रैंचाइज़ी जिसके नाम में ही ‘धमाल’ हो, उसका इस कदर फीका होना वाकई खटकता है। यह फिल्म केवल दर्शकों की पुरानी यादों और नॉस्टेल्जिया के भरोसे मोटी कमाई करने की एक नाकाम कोशिश है। फिल्म में न तो कोई नयापन है, न ही अच्छा संगीत और न ही कोई ढंग का मजाक। फिल्म के मेकर्स ‘M’ के नीचे खजाना ढूंढ रहे थे, लेकिन इस चक्कर में उन्होंने उस असली कॉमेडी और जादू को पूरी तरह से दफन कर दिया जिसने पहली ‘धमाल 4’ को एक कल्ट क्लासिक बनाया था। यह फिल्म देखने जाना समय और पैसे दोनों की बर्बादी है।
