क्यों होती है मॉब लिंचिंग, कैसे फैलती है अफवाह? अभिषेक बनर्जी की फिल्म देखने से पहले पढ़ें स्टोलेन का रिव्यू
प्राइम वीडियो पर रिलीज हुई अभिषेक बनर्जी, शुभम वर्धन और मिया मेल्जर की फिल्म स्टोलेन बेहद दमदार है और इसमें यह दिखाया गया है, मॉब लिंचिंग क्यों होती है और अफवाहें कैसे फैलती हैं।
- Written By: अनिल सिंह
स्टोलेन मूवी रिव्यू: दमदार है अभिषेक बनर्जी, मिया मेल्जर और शुभम वर्धन की फिल्म
- एक्टर्स:अभिषेक बनर्जी, शुभम वर्धन, हरीश खन्ना और मिया मेल्जर
- डायरेक्टर : करण तेजपाल
- जॉनर: थ्रिलर, ड्रामा
- अवधि:1 घंटा 37 मिनट
- रेटिंग: 4 स्टार्स
कहानी: स्टोलेन फिल्म की कहानी सच्ची घटना पर आधारित है। फिल्म में झुंपा (मिया मेल्जर) नाम की एक महिला है। जिसकी 5 महीने की बच्ची का अपहरण कर लिया जाता है। अपहरण राजस्थान के एक रेलवे स्टेशन पर होता है। जहां उस वक्त गौतम (अभिषेक बनर्जी) और रमन (शुभम वर्धन) भी मौजूद हैं। गौतम अपने भाई रमन को स्टेशन पर लेने आया है। घर वाले गौतम और रमन का इंतजार कर रहे हैं, लेकिन झुंपा को शक होता है कि रमन ने उसकी बच्ची को चुराया है। इसी बीच गौतम और रमन भी इस मामले में फंस जाते हैं। लेकिन बहुत जल्दी यह पता चल जाता है कि रमन का बच्ची के अपहरण में कोई हाथ नहीं है।
स्टेशन पर मौजूद चाय वाला बच्ची के अपहरण का सुराग देता है। रमन देखता है कि पुलिस बच्ची को ढूंढने में लापरवाही बरत रही है। लिहाजा वह खुद झुंपा की सहायता करने के लिए आगे बढ़ता है, ऐसे में गौतम उसे रोकता है, लेकिन बाद में गौतम भी राजी हो जाता है। दोनों उसे अपनी गाड़ी में बिठाकर बच्ची को ढूंढने निकलते हैं, लेकिन जब वह तय जगह पर पहुंचने की कोशिश करते हैं। वहां के लोगों को यह अफवाह मिल जाती है कि तीन बच्चे चोर गाड़ी में मौजूद हैं, इलाके की भीड़ मॉब लिंचिंग के इरादे से गाड़ी की तरफ बढ़ती है। तीनों भीड़ से अपनी जान कैसे बचाते हैं? झुंपा को उसकी बच्ची मिलती है या नहीं यह जानने के लिए आपको फिल्म देखना होगा।
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डायरेक्शन: फिल्म के डायरेक्टर करण तेजपाल ने बहुत ही संवेदनशील मुद्दे को उठाया है। इसके लिए जो कहानी लिखी गई है, वह भी मामले के इर्द-गिर्द घूमती है और बहुत अच्छे से इसे फिल्म के माध्यम से पेश किया गया है। डायरेक्टर ने बड़ी खूबी के साथ यह दिखाया है कि अफवाह कैसे फैलती है और मॉब लिंचिंग की घटना को अंजाम तक कैसे पहुंचाया जाता है?
सिनेमैटोग्राफी: फिल्म की कहानी को बहुत अच्छे से वीडियो के माध्यम से प्रस्तुत किया गया है। ऐसे में सिनेमैटोग्राफी का अहम रोल होता है, फिल्म में वीडियोग्राफी उम्दा की गई है। कई जगह कुछ दृश्यों के दोहराव आपको हैरान कर सकते हैं, लेकिन कहानी इतनी दमदार है कि दृश्य का दोहराव नजरअंदाज हो सकता है।
संगीत: फिल्म में संगीत के लिए कोई खास जगह नहीं है, लेकिन बैकग्राउंड म्यूजिक जबरदस्त है, जो कहानी के साथ पूरी तरह से मेल खाता है। ऐसे में यह कहा जा सकता है कि फिल्म का म्यूजिक ठीक-ठाक रखा गया है।
क्यों देखें फिल्म: अगर आप सच्ची घटना पर आधारित फिल्म देखने के शौकीन है, तो यह फिल्म बिल्कुल आपके लिए है।
