शतक मूवी रिव्यू (फोटो- सोशल मीडिया)
Ashish Mall Movie Shatak Review: फिल्म ‘शतक’ एक दमदार कहानी के साथ दर्शकों के सामने पेश की गई है। इसका निर्देशन आशीष मॉल ने किया है। फिल्म के प्रोड्यूसर वीर कपूर हैं, जबकि इसे कृधान मीडियाटेक के बैनर तले बनाया गया है। फिल्म का कॉन्सेप्ट अनिल धनपत अग्रवाल का है। फिल्म के को-प्रोड्यूसर आशीष तिवारी हैं, वहीं एसोसिएट प्रोड्यूसर के तौर पर अशोक प्रधान, मयंक पटेल और कबीर सदानंद जुड़े हैं। कहानी को नितिन सावंत, रोहित गहलोत और उत्सव दान ने मिलकर लिखा है। फिल्म को 5 में से 3.5 स्टार की रेटिंग दी गई है।
करीब एक सदी से भारत की धड़कनों में मौजूद नाम राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS)। समर्थन और विरोध के बीच, बहस और विश्वास के बीच, यह संगठन लगातार चर्चा के केंद्र में रहा है। इसी उथल-पुथल भरे इतिहास को लेकर फिल्म ‘शतक’ सामने आती है, सिर्फ कहानी सुनाने के लिए नहीं, बल्कि उस विचार की जड़ों तक जाने के लिए जिसने हजारों लोगों की दिशा तय की। यह फिल्म सवालों से भागती नहीं, बल्कि उस सफर को परदे पर रखती है जिसने एक छोटे से बीज को बड़े वृक्ष में बदलते देखा।
‘शतक’ इतिहास को सुरक्षित दूरी से नहीं दिखाती बल्कि वह आपको उसके बीच खड़ा कर देती है। इसी माहौल से ‘शतक’ अपनी रफ्तार पकड़ती है। फिल्म शुरुआत के छोटे-छोटे कदमों से लेकर बड़े ऐतिहासिक मोड़ों तक का सफर सीधे और असरदार तरीके से दिखाती है। यह समझाने की कोशिश है कि कैसे एक साधारण-सा विचार समय के साथ फैलता गया और मजबूत संगठन में बदल गया।
तकनीकी तौर पर भी फिल्म पकड़ बनाए रखती है। लाइव-एक्शन और आधुनिक विजुअल इफेक्ट्स का इस्तेमाल कई दृश्यों को बेहद जीवंत बना देता है। कुछ सीन ऐसे हैं जो सिर्फ दिखते नहीं, बल्कि आपको उस दौर के बीचों-बीच ले जाकर खड़ा कर देते हैं। डॉ. केशव बलीराम हेडगेवार को फिल्म में किसी बड़े नायक की तरह नहीं, बल्कि एक साधारण इंसान की तरह दिखाया गया है, जो बड़ी सोच रखता है। सीमित संसाधन, छोटे दायरे की बैठकें और एक साफ मकसद। यही सादगी आगे चलकर ताकत बनती है।
स्क्रीन पर साफ दिखता है कि शुरुआत भले छोटी थी, लेकिन इरादा बड़ा था। जैसे ही कहानी माधव सदाशिव गोलवलकर के समय में जाती है, माहौल बदल जाता है। देश नए दौर में था, लेकिन हालात आसान नहीं थे। महात्मा गांधी की हत्या के बाद लगे प्रतिबंधों ने हालात और कड़े कर दिए। फिल्म इस हिस्से को बिना शोर-शराबे के दिखाती है, लेकिन तनाव साफ महसूस होता है। यही संघर्ष और वापसी की कोशिश कहानी को और असरदार बना देती है। फिल्म जब दादरा और नगर हवेली और कश्मीर जैसे संवेदनशील अध्यायों को छूती है, तो एहसास होता है कि इतिहास सिर्फ भाषणों और सुर्खियों से नहीं बनता।
कई फैसले शोर के बिना लिए जाते हैं, कई कदम बिना तालियों के उठाए जाते हैं, लेकिन उनका असर पीढ़ियों तक जाता है। स्क्रीन पर दिखते ये पल याद दिलाते हैं कि पर्दे के पीछे भी एक अलग जंग चलती रहती है। इसका सबसे ज्यादा असर तब होता है जब कैमरा उन चेहरों पर ठहरता है, जो चुपचाप सब कुछ छोड़कर निकल पड़े। घर की चौखट पार करते युवा, पीछे खड़े परिवारों की नम आंखें, और अनकहा डर, ये दृश्य दिल पर सीधा वार करते हैं। यहीं फिल्म सिर्फ इतिहास नहीं रहती, एक एहसास बन जाती है। जानकारी से आगे बढ़कर यह जुड़ाव पैदा करती है, जो देर तक साथ रहता है।
अगर आप सिर्फ सुनी-सुनाई बातों के बजाय किसी विचार की जड़ तक जाना चाहते हैं, तो ‘शतक’ देखनी चाहिए। यह फिल्म राय बनाने की जल्दी नहीं करती, बल्कि आपको पूरा सफर दिखाती है जैसे शुरुआत, संघर्ष और बदलाव। इतिहास में दिलचस्पी हो, सामाजिक बदलाव को समझना हो या बस एक अलग तरह का सिनेमाई अनुभव चाहिए ‘शतक’ इन सबका मेल है। यह फिल्म देखने के बाद आप खाली दिमाग से नहीं, कई सवाल और कई एहसास लेकर निकलते हैं और शायद यही इसकी सबसे बड़ी खासियत है।