Satluj: जम्मू में दिखाई गई ‘सतलुज’, DGPC ने गुरुद्वारों में आगे भी स्क्रीनिंग कराने का किया ऐलान
Satluj Movie Gurudwara Screening: ओटीटी प्लेटफॉर्म से अचानक हटाए जाने के बाद विवादों में घिरी फिल्म 'सतलुज' की अब जम्मू के एक गुरुद्वारे में विशेष स्क्रीनिंग की गई है, जिसे लेकर भारी क्रेज है।
- Written By: यति सिंह
जम्मू में दिखाई गई फिल्म 'सतलुज (फोटो सोर्स-सोशल मीडिया)
Satluj Movie Jammu Screening: मशहूर एक्टर दिलजीत दोसांझ की अहम भूमिका वाली फिल्म ‘सतलुज’ इन दिनों देश के सामाजिक और राजनीतिक तौर पर भी चर्चा का विषय बन गई है। इस फिल्म को डिजिटल प्लेटफॉर्म जी5 पर रिलीज तो किया गया, मगर महज 48 घंटों के भीतर ही इसे वहां से हटा दिया गया। इस सरकारी और तकनीकी पाबंदी के बाद अब फिल्म ‘सतलुज’ को लेकर जमीन पर एक नया आंदोलन शुरू होता दिख रहा है, जहां लोग खुद आगे आकर इसे आम जनता तक पहुंचाने का जिम्मा उठा रहे हैं।
डिजिटल दुनिया से गायब होने के बाद ‘सतलुज’ को अब सीधे जनता के बीच ले जाया जा रहा है। इसी सिलसिले में जम्मू के नानक नगर स्थित गुरुद्वारा श्री गुरु नानक देव जी में फिल्म ‘सतलुज’ की एक विशेष कम्युनिटी स्क्रीनिंग का गई। जिला गुरुद्वारा प्रबंधक कमिटी यानी डीजीपीसी जम्मू की तरफ से आयोजित इस खास शो में फिल्म देखने के लिए दर्शकों की भीड़ उमड़ पड़ी।
जम्मू के हर गुरुद्वारे में गूंजेगी जसवंत सिंह की कहानी
स्क्रीनिंग के इस मौके पर डीजीपीसी के पदाधिकारियों ने फिल्म को लेकर अपनी भविष्य की योजनाओं को भी पूरी बेबाकी के साथ शेयर किया। खबरों के अनुसार कमिटी के कोषाध्यक्ष सरदार जगपाल सिंह ने बताया कि फिल्म को देखने के लिए सिख समुदाय और आम लोगों के भीतर भारी उत्सुकता देखने को मिल रही है।
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उन्होंने एलान किया कि यह सिलसिला सिर्फ एक शो तक नहीं रुकेगा। आने वाले दिनों में क्षेत्र के अन्य गुरुद्वारों में भी इस फिल्म की स्क्रीनिंग लगातार जारी रखी जाएगी ताकि मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा के जीवन का संघर्ष और उनका संदेश समाज के हर तबके तक पहुंच सके।
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3 साल की सेंसर जंग और सरकारी पाबंदी
फिल्म ‘सतलुज’ के इस पूरे विवाद की जड़ें काफी गहरी हैं जो इस फिल्म के निर्माण के समय से ही जुड़ी हुई हैं। डायरेक्शन हनी त्रेहान के निर्देशन में बनी इस फिल्म का नाम पहले ‘पंजाब 95’ रखा गया था। यह फिल्म अस्सी और 90 के दशक में पंजाब के भीतर कथित तौर पर हुए अवैध दाह संस्कारों और फर्जी मुठभेड़ों के कड़वे सच को उजागर करती है।
इसी संवेदनशील विषय के कारण दिलजीत दोसांझ की फिल्म लगभग 3 साल तक केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड यानी सेंसर बोर्ड की कानूनी प्रक्रियाओं में फंसी रही, क्योंकि बोर्ड ने इसमें कई तरह के बदलावों और कट्स की मांग की थी।
