Supreme Court का फैसला, प्रत्युषा मौत केस में आत्महत्या के लिए उकसाने की सजा बरकरार
Supreme Court On Pratyusha Death Case: तमिल-तेलुगू अभिनेत्री प्रत्युषा की मौत मामले में सुप्रीम कोर्ट ने हत्या की आशंका से इनकार किया। अदालत ने स्पष्ट किया कि मौत जहर खाने से हुई थी।
- Written By: सोनाली झा
प्रत्युषा मौत केस (फोटो-सोशल मीडिया)
Pratyusha Death Case: तमिल और तेलुगू सिनेमा की मशहूर अभिनेत्री प्रत्युषा की मौत के करीब 23 साल बाद सुप्रीम कोर्ट ने मामले में अहम फैसला सुनाया है। मंगलवार को शीर्ष अदालत ने हत्या की आशंका से साफ इनकार करते हुए कहा कि उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर यह मामला जहर खाने से हुई मौत का है। हालांकि, कोर्ट ने आरोपी गुडिपल्ली सिद्धार्थ रेड्डी को आत्महत्या के लिए उकसाने का दोषी माना है और उनकी दोषसिद्धि को बरकरार रखा है।
जस्टिस राजेश बिंदल की अगुवाई वाली बेंच ने सिद्धार्थ रेड्डी की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें उन्होंने आत्महत्या के लिए उकसाने के आरोप में अपनी सजा को चुनौती दी थी। साथ ही अदालत ने अभिनेत्री की मां सरोजिनी देवी की उस याचिका को भी खारिज कर दिया, जिसमें उन्होंने अपनी बेटी की मौत को हत्या बताया था।
सुप्रीम कोर्ट ने कही ये बात
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि गला घोंटकर हत्या किए जाने की संभावना को साक्ष्य समर्थन नहीं देते। अदालत ने अपने फैसले में कहा कि प्रत्यक्षदर्शी और चिकित्सकीय साक्ष्य यह साबित करते हैं कि मौत जहर खाने से हुई थी। कोर्ट ने यह भी माना कि आरोपी के खिलाफ बलात्कार का आरोप सिद्ध नहीं होता। साथ ही दुर्घटनावश जहर खाने के बचाव को भी अदालत ने अस्वीकार कर दिया।
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प्रत्युषा और सिद्धार्थ ने किया था आत्महत्या का प्रयास
मामले के तथ्यों के अनुसार, 22 फरवरी 2002 को प्रत्युषा ने अपने दोस्त सिद्धार्थ रेड्डी के साथ कथित रूप से जहर खाकर आत्महत्या का प्रयास किया था। दोनों के बीच प्रेम संबंध थे, लेकिन परिवार इस रिश्ते से खुश नहीं था। घटना के बाद दोनों को अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां इलाज के दौरान प्रत्युषा की मौत हो गई, जबकि सिद्धार्थ की जान बच गई।
सिद्धार्थ रेड्डी ठहराया गया दोषी
निचली अदालत ने सिद्धार्थ रेड्डी को आत्महत्या के लिए उकसाने और आत्महत्या के प्रयास के आरोप में दोषी ठहराते हुए पांच साल की सजा सुनाई थी। बाद में आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट ने 2004 में सजा घटाकर दो वर्ष कर दी थी। अब सुप्रीम कोर्ट ने दोषसिद्धि को बरकरार रखते हुए आरोपी को चार सप्ताह के भीतर आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया है। इस फैसले के साथ ही लंबे समय से चले आ रहे इस बहुचर्चित मामले पर कानूनी रूप से विराम लग गया है।
