ममता बनर्जी, फोटो- सोशल मीडिया
West Bengal Election 2026: पश्चिम बंगाल की राजनीति में ममता बनर्जी एक ऐसा नाम हैं, जिन्होंने न सिर्फ दशकों पुराने लेफ्ट विचारधारा को खत्म किया बल्कि लगातार चुनावी जीत के जरिए अपनी पकड़ को और मजबूत बनाया। 2011 में सत्ता में आने के बाद से लेकर 2021 तक, उनकी पार्टी टीएमसी ने राज्य की राजनीति पर निर्णायक पकड़ बनाए रखी है। अब ये जानना जरूरी है कि लगातार इतने सालों में कैसे ममता बनर्जी ने बंगाल को अपना अभेद्य किला बना रखा है।
ममता बनर्जी की राजनीति की सबसे बड़ी खासियत उनकी जमीनी पकड़ और आम जनता से सीधा जुड़ाव है। ‘दीदी’ के नाम से फेमस ममता खुद को एक साधारण, संघर्षशील नेता के रूप में पेश करती हैं। उनकी सादगी- सफेद साड़ी, चप्पल और बिना दिखावे की जीवनशैली उन्हें जनता के और करीब ले जाती है।
बंगाल की राजनीति में ममता बनर्जी का सफर किसी फिल्मी दास्तां से कम नहीं है। उनकी सबसे बड़ी ताकत उनकी सादगी है, जिसके कारण बंगाल के लोग उन्हें ‘दीदी’ के नाम से पुकारते हैं। सफेद साड़ी और हवाई चप्पल वाली उनकी छवि आम जनता को यह भरोसा दिलाती है कि वे उन्हीं के बीच की एक संघर्षशील नेता हैं।
इसके साथ ही ममता बनर्जी सरकार की कल्याणकारी योजनाएं उनकी राजनीतिक सफलता का बड़ा आधार रही हैं। महिलाओं और गरीब वर्ग को केंद्र में रखकर बनाई गई योजनाओं ने एक स्थायी वोट बैंक तैयार किया है। कन्याश्री योजना को यूएन द्वारा भी सम्मानित किया गया। इस योजना ने लाखों लड़कियों को शिक्षा से जोड़ा, जबकि लक्ष्मी भंडार योजना के जरिए करोड़ों महिलाओं को सीधे आर्थिक सहायता मिली। इन पहलों ने महिला मतदाताओं के बीच ममता बनर्जी की लोकप्रियता को काफी बढ़ाया, जिसका असर चुनावी नतीजों में भी साफ दिखाई देता है।
ममता बनर्जी ने खुद को ‘बंगाल की पहचान’ के साथ सफलतापूर्वक जोड़ा है। 2021 के चुनाव में “बंगाल अपनी बेटी को ही चाहता है” जैसे नारों के जरिए उन्होंने विपक्ष को ‘बाहरी’ के रूप में पेश किया, जो स्थानीय मतदाताओं को गहराई तक प्रभावित करता है। इसके अलावा “खेला होबे” जैसे नारों ने चुनावी माहौल को उनके पक्ष में मोड़ने का काम किया है।
नंदीग्राम और सिंगूर के आंदोलनों ने उन्हें गरीबों और किसानों की असली मसीहा के रूप में स्थापित किया था। इसके साथ ही टीएमसी का संगठन आज बंगाल के चकरीबन 70,000 बूथों तक फैला हुआ है, जहां उनकी समर्पित कार्यकर्ताओं की फौज हर समय सक्रिय रहती है। यही कारण है कि तमाम चुनौतियों के बाद भी दीदी को मात देना विपक्षी दलों के लिए कभी भी आसान नहीं रहा है।
अब पश्चिम बंगाल की सियासत आज एक ऐसे ऐतिहासिक चौराहे पर खड़ी है जहां भविष्य की दिशा और दशा दोनों बदल सकती हैं। ममता बनर्जी, जो पिछले 15 सालों से राज्य की सत्ता पर काबिज हैं, उनके सामने इस बार 2026 का चुनाव उनकी अब तक की सबसे बड़ी अग्निपरीक्षा बनकर उभरा है। एक तरफ जहां दीदी का अपना एक अटूट जनाधार है, वहीं दूसरी तरफ बीजेपी इस बार एक ऐसी गंभीर दावेदार बनकर उभरी है जिसने अपनी पुरानी राजनीतिक गलतियों से काफी सबक लिया है।
बदलते समय के साथ बंगाल की राजनीति की तस्वीर भी बदलती दिख रही है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि जो आक्रामकता कभी ममता बनर्जी की ताकत हुआ करती थी, वही अब उनके खिलाफ जाती दिख रही है। चुनाव आयोग से उनकी निरंतर सीधी भिड़ंत और हर प्रशासनिक मुद्दे को राजनीतिक टकराव में बदल देना वोटर्स को रास नहीं आ रहा है।
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एक आम आदमी चाहता है कि उसकी चुनी हुई सरकार विवादों के बजाय विकास और शांतिपूर्ण प्रशासन पर ध्यान दे। इसके साथ ही, पिछले कुछ सालों में सरकार पर लग रहे भ्रष्टाचार जैसे आरोपों ने सत्ता पक्ष की छवि को काफी चोट पहुंचाई है। 15 साल की लंबी सत्ता के बाद पैदा हुई स्वाभाविक एंटी-इंकंबेंसी का असर भी अब धरातल पर दिखने लगा है। बेरोजगारी और औद्योगिक निवेश की कमी जैसे बुनियादी मुद्दे अब युवाओं के बीच चर्चा का मुख्य केंद्र बन गए हैं।
इस बार भारतीय जनता पार्टी ने अपनी चुनावी रणनीति में एक बड़ा और सार्थक फेरबदल किया है। पार्टी अब ममता बनर्जी पर व्यक्तिगत छींटाकशी करने के बजाय सीधे सुशासन और भ्रष्टाचार के ठोस मुद्दों पर अपना ध्यान केंद्रित कर रही है। सबसे बड़ी चाल बीजेपी ने सुवेंदु अधिकारी को भवानीपुर सीट से उतारकर चली है, जो स्वयं मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का अपना राजनीतिक गढ़ है।
इससे ममता को अपनी सीट सुरक्षित करने के लिए ज्यादा मेहनत करनी पड़ रही है जिसका असर उनके राज्यव्यापी चुनाव अभियान पर पड़ सकता है। एक और महत्वपूर्ण बदलाव चुनाव के चरणों की संख्या में हुआ है। इस बार चुनाव केवल दो चरणों में हो रहे हैं, जिससे हिंसा की घटनाओं में कमी आने और केंद्रीय सुरक्षा बलों की बेहतर तैनाती की उम्मीद है।