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‘ब्राह्मण-मुक्त’ हुई तमिलनाडु की सियासत! जयललिता की पार्टी ने भी मोड़ लिया मुंह, क्या खत्म हो जाएगा वजूद?

Tamil Nadu Election 2026 में एक ऐतिहासिक बदलाव देखने को मिल रहा है। राज्य की सभी प्रमुख पार्टियों ने ब्राह्मण समुदाय से एक भी उम्मीदवार नहीं उतारा है, जो पिछले 35 वर्षों में पहली बार हुआ है।

  • Written By: प्रतीक पांडेय
Updated On: Apr 06, 2026 | 01:39 PM

प्रतीकात्मक फोटो. सोर्स- सोशल मीडिया

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Brahmin Candidates in Tamil Nadu Election: तमिलनाडु की राजनीति, जिसे ‘सामाजिक न्याय की प्रयोगशाला’ कहा जाता है, इस बार एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है जहां एक समय का सबसे प्रभावशाली समुदाय चुनावी मैदान से लगभग गायब नजर आ रहा है। राज्य की चारों बड़ी पार्टियों- DMK, AIADMK, कांग्रेस और BJP ने अपनी कैंडिडेट लिस्ट में ब्राह्मण समुदाय को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया है।

यह पिछले साढ़े तीन दशक में पहली बार है कि मुख्यधारा की राजनीति में ब्राह्मणों की ऐसी ‘बेरुखी’ देखी जा रही है। अब तमिलनाडु में जातीय समीकरण और ‘जीतने की क्षमता’ अब केवल बड़ी आबादी वाले समुदायों के इर्द-गिर्द सिमट गई है।

जयललिता के विरासत वाली पार्टी ने भी फेरा मुंह

सबसे ज्यादा चर्चा एआईएडीएमके के रुख को लेकर हो रही है। कभी इस पार्टी को ब्राह्मण समुदाय का सबसे मजबूत समर्थन प्राप्त था और पूर्व मुख्यमंत्री जे. जयललिता खुद इसी समुदाय से आती थीं। उनके समय में ब्राह्मण उम्मीदवारों को हमेशा तवज्जो दी जाती थी, लेकिन उनके निधन के 10 साल बाद पार्टी की रणनीति पूरी तरह बदल गई है।

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साल 2021 के चुनाव में पार्टी ने कम से कम एक ब्राह्मण उम्मीदवार (आर. नटराज) को मैदान में उतारा था, लेकिन इस बार वह भी नदारद हैं। विश्लेषकों का मानना है कि जयललिता के बाद ब्राह्मण मतदाताओं का झुकाव भाजपा की ओर बढ़ गया है, जिससे अब एआईएडीएमके को इस समुदाय को टिकट देने में कोई ‘चुनावी लाभ’ नजर नहीं आ रहा है।

भाजपा और कांग्रेस ने भी किया किनारा, पर क्यों?

चौंकाने वाली बात यह है कि ब्राह्मण संगठनों का समर्थन पाने वाली भाजपा ने भी अपने कोटे की 27 सीटों में से एक पर भी इस समुदाय को टिकट नहीं दिया है। जानकारों का मानना है कि भाजपा को डर है कि ब्राह्मण उम्मीदवार उतारने से उसका अन्य पिछड़ा वर्ग और दलित वोट बैंक छिटक सकता है।

दरअसल, राज्य की कुल आबादी में ब्राह्मणों की हिस्सेदारी मात्र 3 प्रतिशत है, जिसे ‘वोट बैंक’ के लिहाज से अब पार्टियां निर्णायक नहीं मानतीं। द्रविड़ विचारधारा, जो ब्राह्मणवाद के विरोध पर टिकी है, उसके कारण भी बड़ी पार्टियां अब अन्य समुदायों जैसे मुथुराय्यर, थेवर और वन्नियार को प्राथमिकता दे रही हैं।

सिर्फ छोटे दलों ने थामा ‘ब्राह्मणों’ का हाथ

एक तरफ जहां बड़ी पार्टियों ने दरवाजे बंद कर लिए हैं, वहीं कुछ नई और छोटी पार्टियों ने इस समुदाय को साधने की कोशिश की है। अभिनेता विजय की पार्टी ‘तमिलागा वेट्री कषगम’ ने 2 ब्राह्मण उम्मीदवारों को टिकट दिया है। वहीं, तमिल राष्ट्रवादी नेता सीमन की पार्टी ‘नाम तमिलर काचि’ (NTK) ने सबसे ज्यादा 6 ब्राह्मण उम्मीदवार मैदान में उतारे हैं।

यह भी पढ़ें: ‘गुजरात के लोग अनपढ़ हैं और…’, खड़गे के बिगड़े बोल, भाजपा ने गांधी-पटेल के अपमान का लगाया आरोप

इन उम्मीदवारों को मायलापुर और श्रीरंगम जैसी सीटों पर उतारा गया है, जहां ब्राह्मण मतदाताओं की संख्या अच्छी खासी है। सीमन की इस रणनीति को ‘द्रविड़ दीवार’ को गिराने की एक वैचारिक कवायद के रूप में देखा जा रहा है।

एक पहलू यह भी है

तमिलनाडु में 69 फीसदी आरक्षण लागू है और यहां की राजनीति हमेशा से पिछड़ी जातियों के उत्थान के इर्द-गिर्द बुनी गई है। द्रविड़ राजनीति में ब्राह्मणों को अक्सर ‘बाहरी’ या ‘आर्य’ के रूप में पेश किया गया है, जिससे किसी ब्राह्मण नेता के लिए खुद को ‘विशुद्ध तमिल हितों’ का रक्षक साबित करना एक बड़ी चुनौती बन गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य में भी छोटे समुदायों की राजनीतिक भागीदारी और सीमित हो सकती है, जबकि बड़ी आबादी वाले समुदाय सत्ता पर हावी रहेंगे।

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Published On: Apr 06, 2026 | 01:39 PM

Topics:  

  • Assembly Election 2026
  • Tamil Nadu
  • Tamil Nadu Assembly Election

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