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Kolathur Assembly Profile: 15 साल से CM स्टालिन का अभेद किला, अबकी बदल जाएगी कोलाथुर की हवा? जानें पूरा समीकरण
Kolathur Constituency History: तमिलनाडु के सीएम एम.के. स्टालिन का निर्वाचन क्षेत्र कोलाथुर अपनी राजनीतिक अहमियत के साथ लोगों की समस्याओं के लिए चर्चा में है, जहां बुनियादी जरूरतों के लिए जंग जारी है।
- Written By: प्रतीक पांडेय

फोटो- नवभारत डिजाइन
Kolathur Assembly Constituency Profile: चेन्नई की घनी आबादी वाली गलियों के बीच स्थित ‘कोलाथुर’ कोई साधारण इलाका नहीं है। यह वह सीट है जिसने तमिलनाडु को उसका वर्तमान मुख्यमंत्री दिया है। एम.के. स्टालिन यहां से लगातार तीन बार जीत चुके हैं, लेकिन एक मुख्यमंत्री का क्षेत्र होने के बावजूद यहां की चुनौतियां किसी आम बस्ती से कम नहीं हैं।
ऊंची इमारतों और बढ़ते व्यापारिक केंद्रों के बीच यहां का आम नागरिक आज भी बारिश के पानी और ट्रैफिक जाम से जूझ रहा है। कोलाथुर की यह कहानी केवल सत्ता के गलियारों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उन हजारों परिवारों के संघर्ष की भी है जो हर मानसून में बाढ़ के साये में जीने को मजबूर हैं।
कोलाथुर की राजनीतिक अहमियत
कोलाथुर विधानसभा सीट आज पूरे तमिलनाडु की सियासत का सबसे महत्वपूर्ण केंद्र बनी हुई है। डीएमके (DMK) प्रमुख एम.के. स्टालिन ने साल 2011, 2016 और फिर 2021 में यहां से जीत की हैट्रिक लगाई है। पिछले चुनाव के नतीजों पर नजर डालें तो स्टालिन ने 1,05,522 वोट हासिल कर 60.9% के बड़े वोट शेयर के साथ एकतरफा जीत दर्ज की थी।
उनके सामने एडीएमके के आदिराजाराम जैसे प्रतिद्वंद्वी थे, जिन्हें मात्र 35,138 वोट मिले। यह आंकड़े साबित करते हैं कि यह सीट न केवल डीएमके का अभेद्य किला है, बल्कि मुख्यमंत्री की व्यक्तिगत साख का प्रतीक भी है।
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बढ़ती आबादी के बोझ तले दबता बुनियादी ढांचा
कभी अर्ध-औद्योगिक क्षेत्र रहा कोलाथुर आज एक विशाल शहरी आवासीय केंद्र में बदल चुका है। पेराम्बूर, विल्लीवक्कम और माधवराम के बीच स्थित यह इलाका अब बड़े अपार्टमेंट समूहों और व्यावसायिक कॉरिडोर से भरा हुआ है। यहां निम्न और मध्यम आय वर्ग के परिवारों के साथ-साथ छोटे व्यापारी और प्रवासी लोग बड़ी संख्या में रहते हैं। तेजी से होते इस शहरीकरण और बढ़ते अपार्टमेंट कल्चर ने यहां के बुनियादी ढांचे पर भारी दबाव डाल दिया है। यहाँ की सकरी अंदरूनी सड़कें और पुरानी पड़ चुकी सीवर लाइनें अब इस बढ़ती आबादी का बोझ उठाने में नाकाम साबित हो रही हैं।
क्या कोलाथुर को मिल जाएगा स्थायी समाधान?
कोलाथुर के मतदाताओं के लिए सबसे बड़ा सिरदर्द मानसून के दौरान आने वाली भीषण बाढ़ है। यहां के निवासियों की प्राथमिकता आज भी बाढ़ नियंत्रण और पानी की सुचारू सप्लाई है। खराब जल निकासी व्यवस्था, पुराने पड़ चुके ड्रेनेज सिस्टम पर अतिक्रमण और कचरा प्रबंधन की खामियां यहां के जीवन को कठिन बना देती हैं। व्यापारियों के लिए पार्किंग की कमी एक बड़ी समस्या है, तो वहीं बुजुर्ग पैदल चलने के लिए सुरक्षित फुटपाथ और बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं की मांग करते हैं। एक मुख्यमंत्री का क्षेत्र होने के नाते यहाँ के लोगों की उम्मीदें बहुत ज्यादा हैं, लेकिन जमीनी हकीकत आज भी सुधार की मांग कर रही है।
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कोलाथुर की बदली हुई चुनावी हवा
इस क्षेत्र की राजनीति अब केवल पारंपरिक नारों तक सीमित नहीं रह गई है। यहां की जागरूक जनता अब ‘सर्विस डिलीवरी’ और बेहतर जीवन स्तर को ही पैमाना मानती है। कोलाथुर में रेजिडेंट वेलफेयर एसोसिएशन (RWA) और अपार्टमेंट निकायों की भूमिका बढ़ती जा रही है, जो राजनीतिक राय बनाने में अहम भूमिका निभाते हैं।
एक्सपर्ट्स की मानें तो यहां का वोटर उसी प्रतिनिधि को पसंद करता है जो न केवल जमीन पर सक्रिय हो, बल्कि नागरिक एजेंसियों के बीच समन्वय बनाकर समस्याओं का समाधान करने में सक्षम हो। आने वाले समय में यहाँ की चुनावी दिशा इस बात पर निर्भर करेगी कि सरकार इन बुनियादी नागरिक समस्याओं को कितनी गंभीरता से सुलझा पाती है।
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