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West Bengal Assembly Elections 2026: सिलीगुड़ी शहर इन दिनों केवल अपनी चाय और पर्यटन के लिए नहीं, बल्कि सियासी पारा चढ़ने के कारण चर्चा में है। पश्चिम बंगाल के तीसरे सबसे बड़े शहरी केंद्र सिलीगुड़ी में 23 अप्रैल 2026 को लोकतंत्र का महापर्व मनाया जाएगा। रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण यह शहर न केवल उत्तर-पूर्व भारत का प्रवेश द्वार है, बल्कि नेपाल, बांग्लादेश और भूटान जैसे देशों की सीमाओं के करीब होने के कारण इसका आर्थिक और सांस्कृतिक महत्व भी बहुत अधिक है।
पिछले चुनाव में यहां भाजपा ने पहली बार अपना खाता खोला था, जिससे सिलीगुड़ी की पारंपरिक राजनीति में एक बड़ा बदलाव आया। अब सवाल यह है कि क्या भाजपा अपनी इस बढ़त को बरकरार रख पाएगी या तृणमूल कांग्रेस इस बार कोई नया करिश्मा दिखाएगी।
सिलीगुड़ी विधानसभा सीट का इतिहास काफी उतार-चढ़ाव भरा रहा है। साल 1951 में अस्तित्व में आने वाली यह सीट दार्जिलिंग लोकसभा क्षेत्र का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। 1991 से लेकर 2006 तक यहां माकपा के कद्दावर नेता अशोक भट्टाचार्य का एकतरफा राज रहा, जिन्होंने लगातार चार बार इस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया। हालांकि, साल 2011 की ममता लहर में तृणमूल कांग्रेस के रुद्र नाथ भट्टाचार्य ने उन्हें हरा दिया था। लेकिन राजनीति के मंझे हुए खिलाड़ी अशोक भट्टाचार्य ने 2016 में फिर से वापसी की और पूर्व भारतीय फुटबॉलर भाईचुंग भूटिया को शिकस्त दी।
साल 2021 का चुनाव यहां के लिए सबसे बड़ा मोड़ साबित हुआ क्योंकि भाजपा के शंकर घोष ने तृणमूल के ओमप्रकाश मिश्रा को 35 हजार से अधिक वोटों के भारी अंतर से हराकर पहली बार इस सीट पर भगवा लहराया। इस हार के साथ अशोक भट्टाचार्य तीसरे स्थान पर खिसक गए थे।
सिलीगुड़ी की अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से चार स्तंभों पर टिकी है जिसमें चाय, लकड़ी, पर्यटन और परिवहन शामिल हैं। यहां के हरे-भरे चाय बागान दुनिया भर में अपनी पहचान रखते हैं और हजारों परिवारों की रोजी-रोटी का मुख्य जरिया हैं। हिमालय के पहाड़ों और दार्जिलिंग की सैर पर जाने वाले पर्यटकों को यहीं से होकर गुजरना पड़ता है, जिससे होटल और स्थानीय परिवहन उद्योग को काफी सहारा मिलता है। लेकिन विकास के इन सुनहरे आंकड़ों के पीछे कुछ गंभीर चिंताएं भी छिपी हैं। यह पूरा क्षेत्र भूकंप के लिहाज से बेहद संवेदनशील माना जाता है और हाई-रिस्क सिस्मिक जोन चार में आता है।
साल 2011 में आए भूकंप की यादें आज भी लोगों के जेहन में ताजा हैं। इसके अलावा महानंदा और तीस्ता नदियों के किनारे बसे होने के कारण यहां मानसून के दौरान बाढ़ का खतरा भी बना रहता है। स्थानीय जनता अब विकास के साथ-साथ इन प्राकृतिक चुनौतियों से निपटने के पुख्ता इंतजामों की मांग कर रही है।
आगामी 2026 के चुनावों में मुकाबला मुख्य रूप से भाजपा और तृणमूल कांग्रेस के बीच ही सिमटता नजर आ रहा है। साल 2021 के चुनाव परिणामों पर गौर करें तो भाजपा ने यहां करीब 50 प्रतिशत वोट हासिल किए थे, जो उनकी मजबूत जमीनी पकड़ को दर्शाता है। दूसरी ओर, ममता बनर्जी की पार्टी सिलीगुड़ी की इस रणनीतिक सीट को फिर से हासिल करने के लिए अपनी पूरी ताकत झोंक रही है।
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हालांकि वाम मोर्चा और कांग्रेस गठबंधन की स्थिति यहां पहले की तुलना में काफी कमजोर हुई है और उनका वोट शेयर पिछले कुछ चुनावों में लगातार गिरा है, लेकिन वे अब भी कुछ हद तक त्रिकोणीय मुकाबले की स्थिति पैदा कर सकते हैं। सिलीगुड़ी में मतदान का प्रतिशत ऐतिहासिक रूप से हमेशा काफी ऊंचा रहा है, जो यहां की जनता की राजनीतिक जागरूकता का प्रमाण है। 23 अप्रैल को होने वाली वोटिंग में यह तय होगा कि शहर के 33 वार्डों की जनता इस बार किस चेहरे पर अपना भरोसा जताती है।
सिलीगुड़ी की भौगोलिक स्थिति इसे किसी भी अन्य भारतीय शहर से बिल्कुल अलग और खास बनाती है। यह नेपाल सीमा से महज 30 किलोमीटर और बांग्लादेश की सीमा से लगभग 65 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। भूटान की सरहद भी यहां से ज्यादा दूर नहीं है। इस सामरिक स्थिति की वजह से यहां की सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक गतिविधियों का महत्व राष्ट्रीय स्तर पर बहुत बढ़ जाता है। रेल और सड़क मार्ग से पूरे उत्तर-पूर्व भारत को शेष देश से जोड़ने वाला यह शहर एक बड़े व्यापारिक हब के रूप में उभरा है।
अंग्रेजों के समय से ही परिवहन केंद्र के रूप में विकसित इस शहर ने समय के साथ खुद को एक आधुनिक महानगर में बदला है। ऐसे में चुनाव के दौरान यहां की कानून व्यवस्था और सुरक्षा एक बड़ी चुनौती होती है। 4 मई को जब वोटों की गिनती होगी, तब यह साफ हो जाएगा कि सिलीगुड़ी की जनता ने किसे अपनी आवाज बनाया है।