मोर्शी विधानसभा सीट (कॉन्सेप्ट फोटो)
अमरावती: महाराष्ट्र में चुनावी रणभेरी बजने को है। सियासी पार्टियां पूरी तरह से चुनावी महासमर की तैयारी में जुट गई हैं। इस बीच यह चर्चा भी होने लगी है कि कौन सी सीट पर किस पार्टी का दबदबा है? किस सीट पर कैसे जातीय समीकरण हैं? कहां कौन सा नेता डॉमिनेट कर रहा है? वगैरह, वगैरह। यही वजह है कि हम सीट दर सीट विवरण आपके लिए लेकर आ रहे हैं। इसी कड़ी आती है अमरावती की मोर्शी विधानसभा सीट। तो चलिए जानते हैं इस सीट से जुड़ी हर एक बात।
महाराष्ट्र के अमरावती जिले में आने वाली यह विधानसभा सीट महाराष्ट्र स्वाभिमान पक्ष के खाते में है। 2019 के महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में देवेन्द्र महादेवराव भुयार ने 2014 के विजेता और भाजपा प्रत्याशी डॉ. अनिल सुखदेवराव बोंडे को 10 हजार से ज्यादा वोटों के अंतर से मात देते हुए जीत दर्ज की थी। लेकिन इस बार यहां कहानी कुछ दूसरी होने वाली है।
मोर्शी विधानसभा सीट पूरी तरह से दलित और आदिवासियों के दबदबे वाली सीट मानी जाती है। 2011 की जनगणना के मुताबिक यहां अनुसूचित जाति के मतदाताओं की संख्या लगभग 41 हजार 960 है, जो कि कुल वोट का 14.3 फीसदी है। इसके अलावा 40 हजार 229 यानी कुल वोट का 13.71 प्रतिशत आदिवासी वोटर्स भी हैं।
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बात करें मुस्लिम मतदाताओं की तो उनकी संख्या भी अच्छी खासी है। मोर्शी विधानसभा में मुस्लिम मतदाताओं की संख्या लगभग 24 हजार 354 है। यह संख्या कुल वोट की 8.3 प्रतिशत है। इसीलिए यहां दलित-मुस्लिम और आदिवासी-मुस्लिम का गठजोड़ जीत या हार तय कर देता है। इसके अलावा यहां चुनाव में गांव-गरीब के मुद्दे ज्यादा हावी होते हैं। क्योंकि 70.27 फीसदी ग्रामीण वोटर्स हैं, जबकि 29.73 प्रतिशत शहरी वोटर्स भी शामिल हैं। पिछले चुनाव में यहां 65.43% वोट पड़े थे।
मोर्शी विधानसभा सीट पर कांग्रेस शुरुआती दौर में कांग्रेस का दबदबा रहा था। 1972 से लेकर 1985 तक यहां लगातार कांग्रेस के उम्मीदवार को विजयश्री मिलती रही। इसके बाद 1990 के चुनाव में निर्दलीय प्रत्याशी को जनता ने जनादेश दिया। लेकिन 1995 और 1999 फिर से कांग्रेस ने सत्ता में वापसी की। लेकिन उसके बाद से आज तक कांग्रेस यहां जीत नहीं दर्ज कर सकी है। इसके बाद 2004 में जेएसएस, 2009 में निर्दलीय, 2014 में भाजपा तो 2019 में महाराष्ट्र स्वाभिमान पक्ष को जीत मिली। यूं कहें कि पिछले चार चुनावों में यहां कोई दो बार लगातार जीत नहीं दर्ज कर सका है।
पिछले चार चुनावों पर नजर डालें तो इस बार भी यहां मामला पेचीदा नजर आ रहा है। पिछली बार की विजेता एसडब्ल्यूपी के लिए यहां इस बार राह आसान नहीं होने वाली है। जबकि कांग्रेस के लिए वापसी कर पाना भी मुश्किल है। ऐसे में इस बात का सही-सही अंदाजा लगा पाना कि यहां ऊंट किस करवट बैठेगा उतना ही कठिन है जितना की नजरों से सागर की गहराई मापना।
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