बंगाल चुनाव: कूचबिहार दक्षिण की गद्दी पर किसका होगा राज? हर बार चेहरा बदलने वाली जनता का इस बार क्या है मिजाज
Coochbehar Dakshin Seat Profile: पश्चिम बंगाल के कूचबिहार दक्षिण विधानसभा क्षेत्र में 23 अप्रैल 2026 को मतदान होगा, जहां भाजपा अपना किला बचाने और तृणमूल कांग्रेस सत्ता में वापसी के लिए आमने-सामने हैं।
- Written By: प्रतीक पाण्डेय
फोटो- नवभारत
West Bengal Election 2026: पश्चिम बंगाल के उत्तरी छोर पर बसे कूचबिहार जिले की हवाओं में इस समय चुनावी सरगर्मी घुली हुई है। कभी राजघराने की शान रहा यह इलाका आज लोकतंत्र के सबसे बड़े उत्सव की तैयारी कर रहा है। कूचबिहार दक्षिण विधानसभा सीट केवल एक भौगोलिक क्षेत्र नहीं है, बल्कि यह बंगाल की उस बदलती राजनीति का दर्पण है जहां मतदाताओं ने कभी भी किसी एक विचारधारा को स्थायी जगह नहीं दी है।
23 अप्रैल 2026 को जब यहां की जनता वोट डालने निकलेगी, तो उनके मन में बीते सालों का हिसाब और भविष्य की उम्मीदें दोनों होंगी। इस औद्योगिक और कृषि प्रधान क्षेत्र में जीत का सेहरा किसके सिर बंधेगा, यह सवाल आज चाय की दुकानों से लेकर बड़े राजनीतिक दफ्तरों तक में गूंज रहा है।
हर बार नई पार्टी चुनने वाली अनोखी सीट का सियासी सच
इस क्षेत्र की सबसे दिलचस्प बात यह है कि यहां के लोग बदलाव के शौकीन रहे हैं। साल 2011 से लेकर अब तक के आंकड़ों पर गौर करें तो हर विधानसभा चुनाव में जनता ने एक नया चेहरा और नई पार्टी को मौका दिया है। 2011 में जब बंगाल में परिवर्तन की लहर थी, तब यहां से ऑल इंडिया फॉरवर्ड ब्लॉक के अक्षय ठाकुर ने जीत दर्ज की थी।
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पांच साल बाद 2016 में जनता का मन बदला और उन्होंने तृणमूल कांग्रेस के मिहिर गोस्वामी को अपनी पसंद बनाया। लेकिन 2021 के चुनाव ने सबको हैरान कर दिया जब भाजपा के निखिल रंजन दे ने तृणमूल के गढ़ में सेंध लगाते हुए करीब पांच हजार वोटों के अंतर से जीत हासिल की। यह उतार-चढ़ाव दिखाता है कि यहां की जनता किसी भी नेता को हल्के में नहीं लेती और काम के आधार पर अपना फैसला बदल देती है।
खेती और संस्कृति के बीच छिपे मतदान के बड़े समीकरण
कूचबिहार दक्षिण की भौगोलिक बनावट भी इसके मतदान व्यवहार को प्रभावित करती है। तोर्सा नदी के किनारे बसा यह इलाका मुख्य रूप से ग्रामीण है, जहां लगभग 73 प्रतिशत मतदाता गांवों में रहते हैं। यहां की मिट्टी बेहद उपजाऊ है और किसान मुख्य रूप से धान, जूट और गन्ने की खेती करते हैं। इसके साथ ही रेशम पालन और बुनाई भी ग्रामीण आय के बड़े स्रोत हैं।
अनुसूचित जाति और मुस्लिम समुदाय की यहां बड़ी आबादी है, जो किसी भी दल की जीत और हार तय करने में निर्णायक भूमिका निभाते हैं। अनुसूचित जाति के मतदाताओं की संख्या 36 प्रतिशत से अधिक है, जबकि मुस्लिम मतदाता करीब 29 प्रतिशत हैं। शहरी क्षेत्रों में रहने वाले 27 प्रतिशत लोग बुनियादी सुविधाओं और रोजगार के मुद्दों पर ज्यादा ध्यान देते हैं।
महल की विरासत और सरगर्मी के बीच चुनावी दंगल
कूचबिहार की पहचान उसके भव्य राजमहल से भी है, जिसे 1887 में महाराजा नृपेंद्र नारायण ने बनवाया था। यह इंडो-सारसेनिक वास्तुकला का एक बेहतरीन नमूना है जो पर्यटकों को अपनी ओर खींचता है। इसके अलावा सागरदीघी झील और मदन मोहन मंदिर जैसे ऐतिहासिक स्थल यहां की सांस्कृतिक गहराई को दर्शाते हैं। लेकिन चुनावी मौसम में इन विरासतों के संरक्षण और पर्यटन विकास की बातें भी खूब होती हैं।
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बांग्लादेश सीमा से महज 19 किलोमीटर की दूरी होने के कारण यहां घुसपैठ और सीमा सुरक्षा जैसे मुद्दे भी चर्चा में रहते हैं। तीस्ता और जलढाका जैसी नदियों से घिरे इस क्षेत्र में मानसून के दौरान होने वाली भारी बारिश भी एक बड़ी चुनौती होती है, जिसका सीधा असर यहां के कृषि आधारित जीवन पर पड़ता है।
क्या भाजपा बचा पाएगी अपना गढ़ या दीदी मारेंगी बाजी
अब सबकी निगाहें अप्रैल में होने वाले मतदान और 4 मई को आने वाले नतीजों पर टिकी हैं। पिछले चुनाव में भाजपा ने 46.8 प्रतिशत वोट हासिल कर अपनी ताकत दिखाई थी, लेकिन तृणमूल कांग्रेस भी 44 प्रतिशत वोटों के साथ बहुत पीछे नहीं थी। वहीं फॉरवर्ड ब्लॉक और कांग्रेस का गठबंधन अब काफी कमजोर पड़ चुका है और उनकी वोट हिस्सेदारी सिमटकर महज चार-पांच प्रतिशत रह गई है।
ऐसे में मुकाबला सीधे तौर पर भाजपा और तृणमूल कांग्रेस के बीच ही सिमटता नजर आ रहा है। मतदाता इस बार किसी पार्टी की विचारधारा को चुनेंगे या फिर स्थानीय विकास के दावों पर मुहर लगाएंगे, यह देखना वाकई रोमांचक होगा। कूचबिहार दक्षिण का यह दंगल बंगाल की भावी राजनीति की दिशा तय करने में एक अहम भूमिका निभाएगा।
