राजनाथ सिंह, पीएम मोदी, अमित शाह और जेपी नड्डा, फोटो- सोशल मीडिया
West Bengal BJP Strategy: पश्चिम बंगाल की राजनीति पिछले एक दशक में एक ऐसे बड़े बदलाव की गवाह बनी है जिसने पुराने सभी समीकरणों को ध्वस्त कर दिया है। कभी वामपंथी दलों और क्षेत्रीय राजनीति का अभेद्य किला माना जाने वाला यह राज्य अब भाजपा और तृणमूल कांग्रेस के बीच सीधे मुकाबले का मैदान बन चुका है। यह बदलाव कोई रातों-रात नहीं आया बल्कि इसके पीछे वर्षों की योजनाबद्ध तैयारी और जमीन पर की गई कड़ी मेहनत छिपी है।
साल 2011 में जो पार्टी बंगाल के चुनावी नक्शे पर लगभग अदृश्य थी, वह आज राज्य की सत्ता की मुख्य दावेदार बनकर उभरी है। भाजपा की इस बढ़त ने न केवल तृणमूल कांग्रेस के लिए चुनौतियां खड़ी की हैं बल्कि बंगाल के पारंपरिक राजनीतिक ढांचे को भी पूरी तरह से बदलकर रख दिया है। इन सबके पीछे भाजपा ने कई रणनीतियों पर काम किया।
बंगाल में भाजपा के विकास की कहानी को आंकड़ों के जरिए समझना बेहद जरूरी है। साल 2011 के विधानसभा चुनावों में पार्टी को महज तीन से चार प्रतिशत वोट मिले थे और उसकी झोली में एक भी सीट नहीं आई थी। इसके पांच साल बाद 2016 में पार्टी का वोट शेयर बढ़कर दस प्रतिशत हुआ और विधानसभा में पहली बार उसके तीन प्रतिनिधियों ने प्रवेश किया।
असली चमत्कार 2021 के चुनावों में हुआ जब भाजपा ने अपनी ताकत को कई गुना बढ़ाते हुए 38 प्रतिशत वोट शेयर हासिल किया और 77 सीटों पर कब्जा जमाया। महज दस साल के भीतर तीस प्रतिशत से ज्यादा का यह वोट स्विंग भारत के किसी भी राज्य में सबसे तेज राजनीतिक उभारों में से एक माना जाता है।
भाजपा ने बंगाल को एक लक्षित राज्य के रूप में चुनकर अपनी रणनीति को अंजाम देना शुरू किया था। इसकी शुरुआत साल 2014 के लोकसभा चुनावों से हुई जब पीएम नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में पहली बार पार्टी ने बंगाल में अपनी प्रभावी मौजूदगी दर्ज कराई। इसके बाद 2019 का चुनाव पार्टी के लिए एक बड़ा टर्निंग पॉइंट साबित हुआ जब उसने 42 में से 18 सीटें जीतकर सबको हैरान कर दिया और उसका वोट शेयर करीब चालीस प्रतिशत तक पहुंच गया।
इस बड़ी जीत से यह साफ संदेश गया कि भाजपा अब ममता बनर्जी की सरकार को सीधी चुनौती देने के लिए तैयार है। पार्टी ने इस दौरान तृणमूल कांग्रेस के खिलाफ भ्रष्टाचार और सिंडिकेट राज जैसे मुद्दों को आक्रामक ढंग से उठाकर लोगों के बीच अपनी पैठ बनाई।
भाजपा की मजबूती के पीछे केवल बाहरी प्रचार नहीं, बल्कि जमीनी स्तर पर हुए संगठन का विस्तार भी है। आरएसएस के बढ़ते कैडर ने बूथ स्तर तक पार्टी का ढांचा खड़ा करने में बड़ी भूमिका निभाई है। इसके साथ ही तृणमूल कांग्रेस और वामपंथी दलों से आए बड़े नेताओं, विशेषकर शुभेंदु अधिकारी की एंट्री ने भाजपा को एक तैयार ग्राउंड नेटवर्क उपलब्ध करा दिया।
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पार्टी ने नागरिकता संशोधन कानून और एनआरसी जैसे संवेदनशील मुद्दों को उठाकर मटुआ समुदाय और सीमावर्ती इलाकों के मतदाताओं को अपनी ओर खींचने की कोशिश की। हिंदुत्व और धार्मिक पहचान की राजनीति के जरिए भाजपा ने विपक्ष के बिखरे हुए वोटों को अपने पक्ष में एकजुट करने का काम किया।
इतनी बड़ी बढ़त के बावजूद भाजपा के सामने कुछ ऐसी कमजोरियां रहीं जिन्होंने उसे सत्ता के शिखर तक पहुंचने से रोक दिया। पार्टी आज भी बंगाल में किसी बड़े स्थानीय चेहरे की कमी से जूझ रही है और उसे प्रधानमंत्री मोदी जैसे केंद्रीय नेतृत्व पर ही निर्भर रहना पड़ता है। तृणमूल कांग्रेस ने भाजपा को बाहरी पार्टी बताकर बंगाली अस्मिता का जो मुद्दा छेड़ा, उससे भाजपा को काफी नुकसान उठाना पड़ा। इसके अलावा वैचारिक और सांगठनिक स्तर पर अब भी पार्टी के भीतर कुछ कमियां नजर आती हैं जहां राष्ट्रीय मुद्दे स्थानीय समस्याओं पर भारी पड़ जाते हैं।