जज पसंद नहीं तो केस हटा दोगे? लालू यादव का जिक्र कर CBI ने केजरीवाल की दलीलें कीं फेल, हाई कोर्ट में क्या हुआ?

Arvind Kejriwal News: सीबीआई ने केजरीवाल की रिक्यूजल याचिका का विरोध करते हुए इसे 'बेंच हंटिंग' बताया। दिल्ली हाई कोर्ट में जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा को हटाने की मांग पर 13 अप्रैल को होगी अगली सुनवाई।
Delhi High Court
अरविंद केजरीवाल (सोर्स- सोशल मीडिया)
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Arvind Kejriwal in Delhi High Court: सेंट्रल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन (CBI) ने दिल्ली हाई कोर्ट में पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल(Arvind Kejriwal) और अन्य 23 आरोपियों की उस याचिका का विरोध किया है, जिसमें जस्टिस डॉ. स्वर्ण कांता शर्मा को मामले की सुनवाई से अलग करने (रिक्यूजल) की मांग की गई है। जांच एजेंसी ने इस याचिका को “तुच्छ, परेशान करने वाला और बेबुनियाद” बताते हुए कहा कि यह अदालत की गरिमा को ठेस पहुंचाने की कोशिश है।

सीबीआई ने अपने जवाब में कहा कि रिक्यूजल की मांग केवल अंदाजों और अटकलों पर आधारित है और न्यायिक निष्पक्षता पर सवाल उठाने के लिए जरूरी कानूनी मानकों को पूरा नहीं करती। एजेंसी के अनुसार, अंतरिम आदेशों या टिप्पणियों से असहमति किसी जज के खुद को मामले से अलग करने का आधार नहीं हो सकती।

सेमिनार में शामिल होना विचारधारा से जुड़ाव का प्रमाण नहीं

जांच एजेंसी ने यह भी चेतावनी दी कि यदि ऐसी याचिकाओं को बढ़ावा दिया गया, तो इससे “बेंच हंटिंग” यानी अपनी पसंद की पीठ चुनने की प्रवृत्ति बढ़ेगी और न्यायपालिका की स्वतंत्रता प्रभावित हो सकती है। जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा फिलहाल उस याचिका पर सुनवाई कर रही हैं, जो ट्रायल कोर्ट द्वारा केजरीवाल(Arvind Kejriwal) समेत 23 आरोपियों को बरी किए जाने के फैसले के खिलाफ दायर की गई है। सीबीआई ने अपने हलफनामे में यह आरोप भी खारिज किया कि जस्टिस शर्मा का राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की लीगल विंग अखिल भारतीय अधिवक्ता परिषद (ABAP) से वैचारिक जुड़ाव है। एजेंसी ने कहा कि किसी सेमिनार में शामिल होना किसी विचारधारा से जुड़ाव का प्रमाण नहीं होता।

आरोप न्यायिक प्रक्रिया में हस्तक्षेप के समान

सीबीआई ने यह भी कहा कि किसी जज पर केवल इस आधार पर पक्षपात का आरोप लगाना कि उन्होंने किसी गैर-राजनीतिक कानूनी कार्यक्रम में भाग लिया, न्यायिक प्रक्रिया में हस्तक्षेप के समान है और इसे अदालत की अवमानना माना जा सकता है। एजेंसी ने तर्क दिया कि अगर ऐसे आधार को स्वीकार किया जाए, तो कई हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जजों को राजनीतिक रूप से संवेदनशील मामलों से खुद को अलग करना पड़ेगा। इसके अलावा, सीबीआई ने इस आरोप को भी खारिज किया कि जस्टिस शर्मा मामले की जल्दबाजी में सुनवाई कर रही हैं। एजेंसी ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने सांसदों और विधायकों से जुड़े मामलों को तेजी से निपटाने के निर्देश दिए हैं, और उनका पालन करना पक्षपात नहीं माना जा सकता।

लालू यादव केस की दलील

उदाहरण देते हुए सीबीआई ने लालू प्रसाद यादव और उनके परिवार से जुड़े मामले का जिक्र किया, जिसकी सुनवाई भी जस्टिस शर्मा कर रही हैं। एजेंसी के मुताबिक, इस मामले में तीन महीने से कम समय में 27 सुनवाई हो चुकी हैं।

गौरतलब है कि 27 फरवरी को राउज एवेन्यू कोर्ट ने आबकारी नीति से जुड़े कथित भ्रष्टाचार मामले में अरविंद केजरीवाल(Arvind Kejriwal), मनीष सिसोदिया समेत 23 आरोपियों को बरी कर दिया था। इसी फैसले को चुनौती देते हुए सीबीआई ने दिल्ली हाई कोर्ट का रुख किया है।

इस बीच, केजरीवाल(Arvind Kejriwal), सिसोदिया और अन्य आरोपियों ने जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा को मामले की सुनवाई से अलग करने के लिए याचिकाएं दाखिल की हैं। 6 अप्रैल को केजरीवाल खुद कोर्ट में पेश हुए थे और अपनी अर्जी पर पक्ष रखा था। कोर्ट ने सीबीआई को नोटिस जारी कर जवाब मांगा था। अब इस मामले की अगली सुनवाई 13 अप्रैल को होगी।

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