

मानवविज्ञान विषय के सहायक प्राध्यापक पदों को लेकर गहराया विवाद।
13 दिसंबर 2024 को जारी हुआ था विज्ञापन।
एसटी, एससी और अनारक्षित वर्ग के तीन पदों पर हुआ भर्ती।
शिकायतकर्ताओं का दावा: विभाग के सात पूर्व शोधार्थी भी पात्र थे।
PRSU Assistant Professor Recruitment Controversy: छत्तीसगढ़ के युवाओं को रोजगार में प्राथमिकता देने की बात सिर्फ सरकारी मंचों तक सीमित है या विश्वविद्यालयों में भी इसका पालन हो रहा है? पंडित रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय में मानवविज्ञान विषय के सहायक प्राध्यापक पदों पर हुई भर्ती ने ऐसे ही कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। आरोप है कि प्रदेश के पात्र और योग्य अभ्यर्थियों की मौजूदगी के बावजूद राज्य के बाहर की अभ्यर्थियों का चयन कर लिया गया। मामला इसलिए भी गंभीर है, क्योंकि राजभवन ने खुद भर्ती प्रक्रिया में स्थानीय अभ्यर्थियों को प्राथमिकता देने के निर्देश दिए थे।
दरअसल 16 जुलाई 2025 को हुई समीक्षा बैठक के कार्यवाही विवरण में स्पष्ट उल्लेख किया गया था कि विश्वविद्यालय के रिक्त पद यूजीसी के मापदंडों के अनुसार शीघ्र भरे जाएं और भर्ती में स्थानीय अभ्यर्थियों को प्राथमिकता दी जाए ताकि छत्तीसगढ़ के युवाओं को अधिक अवसर मिल सके। यह निर्देश 21 अगस्त 2025 के पत्र में दर्ज है। लेकिन रविवि की भर्ती प्रक्रिया को लेकर सामने आई शिकायत ने इन निर्देशों के पालन पर ही सवालिया निशान लगा दिया है।
विश्वविद्यालय ने 13 दिसंबर 2024 को मानवविज्ञान विभाग में एसटी, एससी और अनारक्षित वर्ग के तीन पदों के लिए विज्ञापन जारी किया था। 3 सितंबर 2026 को जारी संशोधित पात्रता सूची में 81 अभ्यर्थियों को पात्र बताया गया। इसके बाद 16 और 17 सितंबर को कुलपति कक्ष में साक्षात्कार आयोजित किए गए। शिकायतकर्ताओं का दावा है कि विभाग के सात पूर्व शोधार्थी भी पात्र थे, जिनमें NET, JRF, PhD और शोध-पत्र जैसी शैक्षणिक योग्यताएं रखने वाले अभ्यर्थी शामिल थे।
शिकायत में आरोप लगाया गया है कि छत्तीसगढ़ के बाहर से जुड़ी शोधार्थी का चयन हुआ जबकि राज्य में मौजूद अधिक शैक्षणिक उपलब्धियों वाले अभ्यर्थियों की दावेदारी को नजरअंदाज किया गया। चयन प्रक्रिया में अकादमिक प्रदर्शन के 60 और साक्षात्कार के 40 अंक निर्धारित करने का निर्णय भी विज्ञापन जारी होने के कई महीने बाद कार्यपरिषद से मंजूर कराने पर सवाल उठाए गए हैं। इसके अलावा दूसरे राज्यों के एससी-एसटी अभ्यर्थियों को पहले संबंधित आरक्षित श्रेणी में रखने और बाद में सामान्य वर्ग में शामिल करने की प्रक्रिया पर भी शिकायतकर्ताओं ने आपत्ति जताई है।
मामला अब राज्यपाल, मुख्यमंत्री और उच्च शिक्षा मंत्री तक पहुंच गया है। शिकायतकर्ताओं ने चयन प्रक्रिया की निष्पक्ष जांच, चयन समिति के सदस्यों के कॉल रिकॉर्ड और बैंक लेन-देन की जांच तथा नियुक्तियां निरस्त करने की मांग की है। सबसे बड़ा सवाल NAAC ग्रेड को लेकर भी है। राजभवन के दस्तावेज में रविवि का NAAC ग्रेड B++ दर्ज है। शोधार्थियों का दावा है कि विश्वविद्यालय की शैक्षणिक उपलब्धियों और ग्रेड सुधार में जिन शोधार्थियों के अकादमिक रिकॉर्ड का योगदान रहा, उन्हीं की योग्यता को नियुक्ति के समय पर्याप्त महत्व नहीं मिला।
इस मामले में विश्वविद्यालय प्रबंधन का पक्ष जानने के लिए लगातार संपर्क कर रहे हैं। लेकिन संबंधित अधिकारी इस मामले पर कुछ बोलने से बचते नजर आ रहे हैं। वहीं भर्ती के संदर्भ में चयनित अभ्यार्थियों से उनका पक्ष जानना चाहा तो उन्होंने स्पष्ट तौर पर कुछ कहने से इनकार कर दिया।