छत्तीसगढ़ का ऐसा मंदिर जहां 8 दिन तक नहीं बदलते वस्त्र, नवमी पर मां का होता है राजश्री श्रृंगार, जानें महत्व

Ratanpur Maa Mahamaya Mandir: मंदिर के पुजारी पंडित संतोष शर्मा के मुताबिक, यहां नवरात्रि के पहले दिन माता को जो वस्त्र पहनाए जाते हैं और श्रृंगार किया जाता है, उसे अष्टमी तक नहीं बदला जाता।
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रतनपुर महामाया मंदिर(सोर्स: सोशल मीडिया)
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Highlights

  • रतनपुर महामाया मंदिर में नवमी पर मां का राजसी श्रृंगार।

  • 5 किलो सोने के आभूषण और 56 भोग हैं खास।

  • हवन के अगले दिन नवमी पर किया जाता है माता का राजसी श्रृंगार।

  • मंदिर परिसर में किए जाते हैं सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम।

Chhattisgarh Ratanpur Maa Mahamaya Mandir: छत्तीसगढ़ के रतनपुर स्थित मां महामाया मंदिर में शारदीय नवरात्रि की नवमी पर माता का राजसी श्रृंगार किया जाता है। सोने के हार, कुंडल, नथनी, मुकुट और छत्र सहित करीब पांच किलो सोने के आभूषणों से सजी मां की छवि भक्तों के लिए विशेष आकर्षण होती है। इस अवसर पर माता को छप्पन भोग भी अर्पित किया जाता है। मंदिर की यह परंपरा नवरात्रि के नौ दिनों तक चलने वाले अनुष्ठान के समापन से जुड़ी है।

मंदिर ट्रस्ट के चेयरमैन आशीष सिंह ठाकुर के अनुसार, राजसी श्रृंगार के लिए इस्तेमाल होने वाले कीमती आभूषण बैंक के लॉकर में सुरक्षित रखे जाते हैं। नवमी से एक दिन पहले इन्हें सुरक्षा व्यवस्था के बीच मंदिर लाया जाता है। विशेष श्रृंगार के दौरान मंदिर परिसर में सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए जाते हैं।

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आठ दिन तक नहीं बदलते वस्त्र

मंदिर के पुजारी पंडित संतोष शर्मा के मुताबिक, यहां नवरात्रि के पहले दिन माता को जो वस्त्र पहनाए जाते हैं और श्रृंगार किया जाता है, उसे अष्टमी तक नहीं बदला जाता। धार्मिक मान्यता है कि अनुष्ठान शुरू होने के बाद उसे बीच में बाधित नहीं करना चाहिए। अष्टमी के हवन के अगले दिन नवमी पर माता के वस्त्र बदले जाते हैं और राजसी श्रृंगार किया जाता है।

नवमी पर 56 व्यंजनों का भोग

नवरात्रि के शुरुआती आठ दिनों में माता को सुबह और दोपहर सूखे मेवों का भोग लगाया जाता है, जबकि शाम को सिंघाड़े के आटे का हलवा जैसे प्रसाद अर्पित किए जाते हैं। नवमी पर इस परंपरा के समापन के साथ माता को छप्पन भोग चढ़ाया जाता है। इसमें मिठाइयों के अलावा पूरी, कचौड़ी, सब्जियां और रायता सहित कई व्यंजन शामिल होते हैं।

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रतनपुर महामाया मंदिर(सोर्स: सोशल मीडिया)

साल में तीन बार होता है राजसी श्रृंगार

मां महामाया का राजसी श्रृंगार चैत्र नवरात्रि, शारदीय नवरात्रि और दीपावली के अवसर पर किया जाता है। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के रतनपुर आगमन के दौरान भी विशेष राजसी श्रृंगार किया गया था।

एक मंदिर में महालक्ष्मी और महासरस्वती

बिलासपुर से करीब 24 किलोमीटर दूर स्थित मां महामाया मंदिर 51 शक्तिपीठों में शामिल माना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, यहां माता सती का दाहिना स्कंध गिरा था। मंदिर की विशेषता यह भी है कि यहां महालक्ष्मी और महासरस्वती के स्वरूपों की पूजा होती है। नवरात्रि के दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालु मां के दर्शन और पूजा-अर्चना के लिए पहुंचते हैं।

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गिरा था माता सती का स्कंध

बिलासपुर जिले के रतनपुर में स्थित मां महामाया मंदिर (Mahamaya Mandir) 51 शक्तिपीठों में से एक है। रतनपुर धर्मनगरी है। रतनपुर को देवी और आस्था की नगरी के रूप में भी जाना जाता है। मंदिरो और तालाबों से भरा रतनपुर छत्तीसगढ़ के बिलासपुर शहर से 24 किलोमीटर दूर है। देवी महामाया को कोसलेश्वरी के नाम से भी जाना जाता है, जो पुराने दक्षिण कोसल क्षेत्र की अधिष्ठात्री देवी हैं। परंपरागत रुप से महामाया रतनपुर राज्य की कुलदेवी हैं। माना जाता है कि सती की मृत्यु से व्यथित भगवान शिव उनके मृत शरीर को लेकर तांडव करते हुए ब्रह्मांड में भटकते रहे। इस समय माता के अंग जहां-जहां गिरे, वहीं शक्तिपीठ बन गए।

इन्हीं स्थानों को शक्तिपीठ रूप में मान्यता मिली। महामाया मंदिर में माता का दाहिना स्कंध गिरा था। भगवान शिव ने स्वयं आविर्भूत होकर उसे कौमारी शक्ति पीठ का नाम दिया था। इसीलिए इस स्थल को माता के 51 शक्तिपीठों में शामिल किया गया। भगवान शिव ने स्वंय अविभूर्त होकर इसे कौमारी शक्तिपीठ का नाम दिया था। माना जाता है कि नवरात्र में यहां की गई पूजा कभी निष्फल नहीं होती। यहां प्रातः काल से देर रात तक भक्तों की भीड़ लगी रहती है।

मंदिर के संरक्षक कालभैरव को माना जाता है, जिनका मंदिर रतनपुर शहर पहुंचने से पहले ही मंदिर के ही रास्ते पर स्थित है। यह एक लोकप्रिय धारणा है कि महामाया मंदिर (Mahamaya Mandir) जाने वाले तीर्थयात्रियों को भी अपनी तीर्थयात्रा पूरी करने के लिए कालभैरव के मंदिर जाने की आवश्यकता होती है। चैत्र और क्वांर नवरात्रि के दौरान देवी मां को प्रसन्न करने के लिए ज्योतिकलश जलाया जाता है। नवरात्रि में मां महामाया के दर्शन करने के लिए लाखों भक्त यहां आते हैं और उनकी मांगी हर मनोकामना मां पूरी होती है।

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