

Bastar Dussehra Traditional Nisha Jatra Rituals : घड़ी ने जैसे ही आधी रात पार की, अनुपमा चौक स्थित निशा गुड़ी में मंत्रोच्चार गूंजने लगा। ढोल-नगाड़ों की थाप, पुजारियों के वैदिक अनुष्ठान और राजपरिवार की मौजूदगी के बीच बस्तर दशहरा की सबसे रहस्यमयी और प्राचीन रस्म निशा जात्रा संपन्न हुई। यह वह रात है, जिसे बस्तर में केवल पूजा-अर्चना नहीं, बल्कि पूरे अंचल की सुख-समृद्धि, जनकल्याण और बुरी शक्तियों से रक्षा की कामना की रात माना जाता है।
विश्व विख्यात 75 दिवसीय बस्तर दशहरा की यह परंपरा करीब 600 वर्षों से चली आ रही है। देश के अधिकांश हिस्सों में जहां दशहरा रावण दहन के लिए जाना जाता है, वहीं बस्तर में यह पर्व मां दंतेश्वरी, आंचलिक देवी-देवताओं और जनजातीय परंपराओं के इर्द-गिर्द जीवित सांस्कृतिक विरासत के रूप में मनाया जाता है।
शाम से ही निशा गुड़ी में भैरमदेव और खमेश्वरी देवी की पूजा शुरू हो गई थी। रात करीब 12 बजे के बाद राजपरिवार के सदस्यों और पुजारियों की मौजूदगी में परंपरा के अनुसार अनुष्ठान के अगले चरण पूरे किए गए। मान्यता है कि प्राचीन काल में बस्तर के महाराजा इस विधान को राज्य की रक्षा और अमंगल शक्तियों के शमन के लिए करवाते थे, इसलिए निशा जात्रा को बस्तर दशहरा का सबसे विशिष्ट रात्रिकालीन विधान माना जाता है।
आंचलिक देवी-देवताओं के सम्मान में पारंपरिक बलि विधान निभाया गया। निशा गुड़ी में 11, मावली मंदिर में 2, सिंहद्वार में 2 और काली मंदिर में 1 बकरे की बलि दी गई। इस तरह चारों धार्मिक स्थलों पर कुल 16 बकरों की बलि के साथ परंपरागत अनुष्ठान संपन्न हुआ।
निशा जात्रा की सबसे भावुक तस्वीर गांवों की सामूहिक भागीदारी रही। राजूर, छिंदगुड़ा, एर्राकोट, मरलीगुड़ा, उडुवा, नेपपुर, रायकोट, आरापुर, चालकीगुड़ा, सिंघनपुर, चोकर सहित 12 से अधिक गांवों के ग्रामीण चावल और उड़द की दाल से पारंपरिक भोग तैयार करने पहुंचे। देवी-देवताओं को भोग अर्पित कर पूरे अंचल की खुशहाली और अच्छी फसल की कामना की गई। पीढ़ियों से चली आ रही यह परंपरा आज भी गांवों को एक सांस्कृतिक सूत्र में बांधे हुए है।
बस्तर दशहरा केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि पूरे बस्तर की सामाजिक व्यवस्था और सांस्कृतिक एकता का भी प्रतीक माना जाता है। श्रावण अमावस्या की पाट जात्रा से शुरू होकर 75 दिनों तक चलने वाले इस महापर्व में काछनगादी, जोगी बिठाई, मावली परघाव, रथ परिक्रमा, निशा जात्रा और अंत में मुरिया दरबार जैसे अनुष्ठान पूरे बस्तर को एक मंच पर जोड़ते हैं। निशा जात्रा इसी लंबी परंपरा का वह अध्याय है, जहां आधी रात के सन्नाटे में आस्था, जनजातीय संस्कृति और सदियों पुरानी मान्यताएं एक साथ जीवंत हो उठती हैं।