

More Than 10 Lakh Devotees Mahakal Darshan: उज्जैन में भाद्रपद माह के दूसरे सोमवार को भगवान श्री महाकालेश्वर की अंतिम प्रमुख राजसी सवारी पूरे राजसी ठाट-बाट, भव्यता और धार्मिक उत्साह के साथ निकली। रजत पालकी में श्री चंद्रमौलेश्वर के स्वरूप में विराजित बाबा महाकाल जब नगर भ्रमण के लिए निकले तो पूरी अवंतिका नगरी ‘जय श्री महाकाल’ के जयकारों से गूंज उठी। सवारी मार्ग पर लाखों श्रद्धालु बाबा की एक झलक पाने के लिए घंटों इंतजार करते नजर आए। मंदिर प्रबंध समिति के अनुसार, सवारी के पूरे मार्ग पर करीब 10.20 लाख श्रद्धालुओं ने भगवान महाकाल के छह स्वरूपों के दर्शन किए।
राजसी सवारी में रजत पालकी में श्री चंद्रमौलेश्वर, गजराज पर श्री मनमहेश, गरुड़ रथ पर श्री शिव तांडव, नंदी रथ पर श्री उमा-महेश, रथ पर होल्कर स्टेट के मुखारविंद और बैलगाड़ी में श्री सप्तधान के मुखारविंद शामिल रहे। सवारी निकलने से पहले महाकाल मंदिर के सभामंडप में विधि-विधान से पूजन और आरती की गई। इसके बाद भगवान की पालकी निर्धारित समय पर नगर भ्रमण के लिए रवाना हुई। मुख्य द्वार पर पहुंचते ही सशस्त्र पुलिस बल ने बाबा महाकाल को गार्ड ऑफ ऑनर दिया।
राजसी सवारी को भव्य और आकर्षक बनाने के लिए इस बार आधुनिक तकनीक का भी इस्तेमाल किया गया। सवारी मार्ग पर 15 ड्रोन के माध्यम से 500 किलोग्राम से अधिक फूलों की पुष्पवर्षा की गई। शहनाई द्वार, रामघाट और दत्त अखाड़ा सहित प्रमुख स्थानों पर आसमान से हुई पुष्पवर्षा ने श्रद्धालुओं को रोमांचित कर दिया। वहीं सवारी मार्ग पर एक लाख वर्गफीट से अधिक क्षेत्र में विशाल रंगोली बनाई गई, जिसमें सिंहस्थ महाकुंभ, भगवान महाकाल की दिव्यता और भारतीय संस्कृति को दर्शाया गया।
सवारी में उज्जैन की प्राचीन धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत को दर्शाती 84 महादेव की विशेष झांकी प्रमुख आकर्षण रही। इसके अलावा सिंहस्थ महाकुंभ पर आधारित विभिन्न झांकियों और सांस्कृतिक प्रस्तुतियों ने भी श्रद्धालुओं का ध्यान खींचा। देश-प्रदेश के पांच प्रसिद्ध बैंड दलों के एक हजार से अधिक कलाकारों ने संगीत और वादन की प्रस्तुति दी। वहीं उज्जैन और अन्य शहरों से आईं 73 भजन मंडलियां झांझ, मंजीरे, डमरू और ढोल के साथ बाबा महाकाल का गुणगान करती हुई सवारी में शामिल हुईं।
परंपरागत मार्ग से होती हुई बाबा महाकाल की सवारी रामघाट पहुंची, जहां मां क्षिप्रा के जल से श्री चंद्रमौलेश्वर और श्री मनमहेश का पूजन-अर्चन किया गया। इसके बाद सवारी गोपाल मंदिर पहुंची, जहां सिंधिया स्टेट की वंशपरंपरा के अनुसार भगवान श्री चंद्रमौलेश्वर का पूजन हुआ। यहां हरि और हर के मिलन की परंपरा ने धार्मिक वातावरण को और विशेष बना दिया। इसके बाद सवारी पटनी बाजार और गुदरी चौराहे से होती हुई रात करीब 8:30 बजे पुनः महाकाल मंदिर पहुंची। पूरे आयोजन के दौरान भक्ति, संस्कृति, परंपरा और आधुनिक तकनीक का अनूठा संगम देखने को मिला।