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‘चाइनीज हार्वर्ड’ के आगे असली Harvard भी फेल! ऐसा क्या किया कि बन गई दुनिया की नंबर वन यूनिवर्सिटी?

Chinese Universities Growth: हार्वर्ड यूनिवर्सिटी को लंबे समय से दुनिया की सबसे बेहतरीन यूनिवर्सिटी माना जाता रहा है। हालिया वैश्विक यूनिवर्सिटी रैंकिंग में बड़ा बदलाव देखने को मिला है।

  • By अर्पित शुक्ला
Updated On: Jan 19, 2026 | 01:55 PM

'चाइनीज हार्वर्ड' के आगे असली Harvard भी फेल! ऐसा क्या किया कि बन गई दुनिया की नंबर वन यूनिवर्सिटी?

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Harvard University Ranking: हार्वर्ड यूनिवर्सिटी को दशकों तक दुनिया की सबसे प्रतिष्ठित और भरोसेमंद यूनिवर्सिटी माना जाता रहा है, लेकिन अब वैश्विक शिक्षा का परिदृश्य तेजी से बदल रहा है। हालिया अंतरराष्ट्रीय रैंकिंग में एक चौंकाने वाला बदलाव देखने को मिला है। पढ़ाई, रिसर्च और प्रतिष्ठा के मामले में लंबे समय तक शीर्ष पर रहने वाली हार्वर्ड को अब कड़ी चुनौती मिल रही है। चीन की तीन यूनिवर्सिटियां—झेजियांग यूनिवर्सिटी, शिंघुआ यूनिवर्सिटी और पेकिंग यूनिवर्सिटी—रिसर्च के क्षेत्र में हार्वर्ड से आगे निकलती नजर आ रही हैं।

किस रैंकिंग ने खींचा ध्यान?

न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, हालिया ग्लोबल यूनिवर्सिटी रैंकिंग में हार्वर्ड कुछ रिसर्च से जुड़े पैमानों पर करीब 30वें स्थान तक फिसल गया है। वहीं दूसरी ओर चीन की ये तीनों यूनिवर्सिटियां टॉप रैंक में शामिल हो गई हैं, जिससे वैश्विक शिक्षा जगत में हलचल मच गई है।

किन आधारों पर तय होती है रैंकिंग?

विश्व यूनिवर्सिटी रैंकिंग आमतौर पर इन प्रमुख मानकों पर तय की जाती है-

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  • रिसर्च पेपर की संख्या: हर साल अंतरराष्ट्रीय जर्नल्स में प्रकाशित शोध पत्र
  • उद्धरण (Citations): अन्य वैज्ञानिकों द्वारा उन शोधों का उपयोग
  • कुल वैज्ञानिक आउटपुट: साइंस, टेक्नोलॉजी, मेडिकल और इंजीनियरिंग में शोध
  • रिसर्च का प्रभाव: समाज, तकनीक और नीतियों पर शोध का असर
  • अंतरराष्ट्रीय सहयोग: विदेशी संस्थानों और शोधकर्ताओं के साथ साझेदारी

जिन रैंकिंग सिस्टम्स में रिसर्च की संख्या और citations को ज्यादा महत्व दिया जाता है, वहां चीनी यूनिवर्सिटियां आगे निकल रही हैं। वहीं हार्वर्ड का रिसर्च आउटपुट अपेक्षाकृत स्थिर रहने के कारण उसकी रैंकिंग नीचे आई है।

चीनी यूनिवर्सिटियां क्या अलग कर रही हैं?

चीन की यह सफलता अचानक नहीं आई है। पिछले दो दशकों में चीन ने उच्च शिक्षा और रिसर्च में अरबों डॉलर का निवेश किया है। AI, इंजीनियरिंग, मेडिकल, एनर्जी और साइंस जैसे क्षेत्रों पर विशेष फोकस किया गया। प्रोफेसरों की पदोन्नति और फंडिंग को रिसर्च आउटपुट से जोड़ा गया, जिसके चलते बड़ी संख्या में अंतरराष्ट्रीय स्तर के शोध पत्र प्रकाशित होने लगे।

क्या हार्वर्ड कमजोर हो गया है?

विशेषज्ञों का मानना है कि पढ़ाई की गुणवत्ता, नए विचारों और वैश्विक प्रतिष्ठा के मामले में हार्वर्ड आज भी अग्रणी है। फर्क सिर्फ इतना है कि जहां हार्वर्ड का रिसर्च ग्रोथ स्थिर है, वहीं चीनी यूनिवर्सिटियों का शोध कार्य बेहद तेज गति से बढ़ा है। कई मामलों में वे अमेरिका की यूनिवर्सिटियों की तुलना में हर साल दो से तीन गुना ज्यादा रिसर्च पेपर प्रकाशित कर रही हैं।

अमेरिका को क्यों हो रही है चिंता?

रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिकी यूनिवर्सिटियों को रिसर्च फंडिंग में अनिश्चितता, सख्त इमिग्रेशन नियमों और अंतरराष्ट्रीय सहयोग में दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। इन कारणों से रिसर्च की रफ्तार धीमी हुई है, जिसका असर रैंकिंग में साफ दिखाई देता है।

यह भी पढ़ें- कनाडा में पढ़ाई के बाद जॉब के लिए वर्क परमिट मिलेगा या नहीं? यहां से कर सकते हैं चेक

छात्रों के लिए क्या मायने रखता है यह बदलाव?

इस बदलाव का मतलब यह है कि अब उच्च शिक्षा और रिसर्च के लिए अमेरिका ही एकमात्र विकल्प नहीं रहा। चीन तेजी से वैश्विक शिक्षा का नया केंद्र बनता जा रहा है। छात्रों और रिसर्चर्स के लिए नए देशों में भी बड़े अवसर खुल रहे हैं। हार्वर्ड की प्रतिष्ठा अब भी मजबूत है, लेकिन रिसर्च आधारित रैंकिंग में चीनी यूनिवर्सिटियां बढ़त बना रही हैं। आने वाले वर्षों में वैश्विक शिक्षा और रिसर्च में चीन की भूमिका और भी अहम हो सकती है।

Chinese universities challenge harvard top university global ranking

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Published On: Jan 19, 2026 | 01:55 PM

Topics:  

  • America
  • China
  • Harvard

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