

Pulses Price Hike Reasons: कमजोर मानसून तथा आयात महंगा होने से पिछले एक माह में दाल-दलहनों की कीमतों में 20% तक का उछाल आ गया है। चावल-चीनी के बाद अब चना, मसूर, सफेद मटर, तूर दाल सहित विभिन्न दाल-दलहनों के महंगे होने का सीधा असर आम उपभोक्ताओं के रसोई के बजट पर पड़ रहा है।
मुंबई के थोक बाजार में पिछले माह 55 से 70 रुपये प्रति किलो बिकने वाली आयातित तूर (अरहर) दाल अब 70 से 85 रुपये बिकने लगी है। जबकि आयातित सफेद मटर 35 रुपये से उछलकर 47 रुपये प्रति किलो पहुंच गया है।
इसी तरह चना 54-58 रुपये से बढ़कर 68-70 रुपये प्रति किलो हो गया है। मसूर भी 53 से बढ़कर 59 रुपये प्रति किलो हो गया है। दाल-दलहनों की महंगाई पर कन्फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स (कैट) के राष्ट्रीय मंत्री शंकर ठक्कर ने कहा है कि इस साल देश में कमजोर मानसून के कारण महाराष्ट्र, कर्नाटक तथा राज्यों में दलहनों का उत्पादन प्रभावित हुआ है। जबकि अमेरिका-ईरान तथा रूस-यूक्रेन युद्ध के चलते वैश्विक बाजारों में कीमतें बढ़ गई हैं। जिससे आयात महंगा हो गया है।
ऐसी स्थिति में सरकार को तत्काल हस्तक्षेप करते हुए आयात को सुगम बनाने और बाजार में पर्याप्त उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक कदम उठाने चाहिए। दालों एवं दलहनों की बढ़ती कीमतों को नियंत्रित करने के लिए सरकार को आयात शुल्क की समीक्षा करने के साथ-साथ आयात प्रक्रिया में व्यावहारिक सुधार करने की आवश्यकता है।
चने में अफ्रीकी देशों को छोड़कर अन्य देशों से होने वाले आयात पर 10 प्रतिशत बेसिक कस्टम ड्यूटी तथा 1 प्रतिशत सेस सहित कुल 11 प्रतिशत का टैक्स भार है। इसी प्रकार मसूर पर भी लगभग 11 प्रतिशत आयात शुल्क लागू है। वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए सरकार को चना और मसूर पर आयात शुल्क तत्काल हटाने पर विचार करना चाहिए, ताकि घरेलू बाजार में आपूर्ति बढ़े और आगामी त्योहारी सीजन में कीमतों में कुछ कमी आ सके।
मूंग के आयात पर वर्तमान प्रतिबंध के कारण घरेलू बाजार में उपलब्धता प्रभावित हो रही है। मूंग के भाव में भी उल्लेखनीय वृद्धि हुई है और बाजार में थोक कीमतें 80 रुपये से बढ़कर 125 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गई हैं। सरकार को मूंग के आयात से संबंधित प्रतिबंधों में तत्काल राहत देकर पर्याप्त मात्रा में आयात की अनुमति देने पर विचार करना चाहिए।
देश में सफेद मटर की आपूर्ति का एक बड़ा हिस्सा कनाडा, रूस, यूक्रेन सहित विभिन्न देशों से आयात के माध्यम से आता है। अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों तथा आयात-लॉजिस्टिक्स में आ रही बाधाओं का असर घरेलू कीमतों पर पड़ रहा है। इसलिए सरकार को सफेद मटर के आयात की प्रक्रिया को सरल और सुगम बनाने की आवश्यकता है।
आयातित दालों एवं दलहनों के लिए वर्तमान में माल आने के बाद बिक्री की समय सीमा 180 दिन निर्धारित है, इसको अब आवश्यकता के मुताबिक 90 दिन करने की जरूरत है। साथ में इसका प्रभावी पालन व्यवस्था की नियमित निगरानी करनी चाहिए और आयातित माल की समयसीमा से संबंधित नियमों का प्रभावी क्रियान्वयन सुनिश्चित करना चाहिए।
व्यापारियों का कहना है कि दाल-दलहनों के आयात की लागत बढ़ाने वाला एक महत्वपूर्ण कारण अंतरराष्ट्रीय कंटेनर भाड़े में हुई वृद्धि भी है। पिछले 30 से 45 दिनों में कंटेनर शिपिंग भाड़े में लगभग सामान्य दरों की तुलना में 8 से 10 गुना तक अधिक भाड़ा मांगे जाने की शिकायतें सामने आ रही हैं।
शंकर ठक्कर ने कहा कि यदि आयात लागत लगातार बढ़ती रही तो उसका सीधा असर उपभोक्ता कीमतों पर पड़ेगा। इसलिए सरकार को शिपिंग एवं कंटेनर भाड़े की स्थिति की समीक्षा कर अनावश्यक एवं असामान्य वृद्धि पर प्रभावी निगरानी तथा नियंत्रण की व्यवस्था करनी चाहिए।
नवी मुंबई के दाल व्यापारी देवेंद्र वोरा ने कहा कि इस वर्ष महाराष्ट्र, कर्नाटक जैसे राज्यों में वर्षा की कमी के कारण तूर और अन्य दलहनों की फसल पर काफी प्रभाव पड़ा है। कई जगह फसलें सूख गयी हैं। आगे भी अल नीनो के चलते मौसम ज्यादा शुष्क होने की संभावना जताई जा रही है। ऐसे में आगामी रबी फसलें भी प्रभावित हो सकती हैं। इसके लिए समय रहते सरकार को आवश्यक कदम उठाने की जरूरत है, ताकि कीमतों पर अंकुश रखा जा सके।
कैट के राष्ट्रीय मंत्री शंकर ठक्कर ने कहा कि दालें भारतीय परिवारों के दैनिक भोजन का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। कीमतों में इस तरह का तेज उछाल विशेष रूप से निम्न एवं मध्यम आय वर्ग के परिवारों के घरेलू बजट को प्रभावित करता है। इसलिए सरकार को केवल कीमतों पर निगरानी रखने तक सीमित न रहते हुए आयात शुल्क, आयात प्रतिबंध, लॉजिस्टिक्स लागत और बाजार में उपलब्धता, इन सभी पहलुओं पर एक साथ काम करना होगा।
उन्होंने केंद्र सरकार से आग्रह किया कि चना और मसूर पर आयात शुल्क में तत्काल राहत, मूंग के आयात पर प्रतिबंध में आवश्यक छूट, सफेद मटर सहित अन्य दलहनों के आयात को सुगम बनाने तथा कंटेनर भाड़े में असामान्य वृद्धि पर नियंत्रण के लिए शीघ्र ठोस कदम उठाए जाएं, ताकि बाजार में पर्याप्त आपूर्ति सुनिश्चित हो और आम जनता को बढ़ती दालों की कीमतों से राहत मिल सके।