जीडीपी (सोर्स-सोशल मीडिया)
Impact of GDP on Indian Economy 2026: सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी (GDP) किसी भी देश की आर्थिक प्रगति और उसकी वित्तीय स्थिति को मापने का सबसे महत्वपूर्ण पैमाना माना जाता है। सरल शब्दों में कहें तो एक निश्चित समय के भीतर देश की सीमाओं में उत्पादित सभी वस्तुओं और सेवाओं के कुल मौद्रिक मूल्य को ही जीडीपी कहते हैं। यह न केवल अर्थव्यवस्था के आकार को दर्शाता है, बल्कि यह भी बताता है कि देश विकास की राह पर है या मंदी की ओर बढ़ रहा है। जीडीपी के आंकड़ों के आधार पर ही सरकारें अपनी भविष्य की आर्थिक नीतियां और बजट तैयार करती हैं, जिससे आम नागरिक के जीवन पर सीधा प्रभाव पड़ता है।
जीडीपी मुख्य रूप से दो प्रकार की होती है, जिनमें पहली सांकेतिक (Nominal) जीडीपी है जो वर्तमान बाजार की कीमतों पर आधारित होती है। दूसरी वास्तविक (Real) जीडीपी है जिसमें महंगाई के प्रभाव को समायोजित कर उत्पादन का सटीक मूल्य निकाला जाता है। वास्तविक जीडीपी ही किसी देश के असली आर्थिक उत्पादन की सही तस्वीर पेश करती है क्योंकि इसमें कीमतों का उतार-चढ़ाव शामिल नहीं होता।
भारत में जीडीपी के आंकड़ों को जारी करने की जिम्मेदारी राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO) की होती है जो सांख्यिकी मंत्रालय के अधीन काम करता है। ये आंकड़े हर तीन महीने में एक बार यानी तिमाही आधार पर सार्वजनिक किए जाते हैं जिससे साल में चार बार रिपोर्ट आती है। इसके अलावा वित्त वर्ष के अंत में वार्षिक जीडीपी के अनुमान पेश किए जाते हैं जो पूरे साल के प्रदर्शन का लेखा-जोखा होते हैं।
भारतीय अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से तीन प्रमुख क्षेत्रों पर टिकी हुई है जिनमें सेवा क्षेत्र यानी सर्विस सेक्टर का सबसे बड़ा योगदान रहता है। दूसरे स्थान पर औद्योगिक क्षेत्र आता है जिसमें मैन्युफैक्चरिंग और निर्माण कार्य शामिल होते हैं, जबकि तीसरा स्थान कृषि क्षेत्र का है। सेवा क्षेत्र में आईटी, बैंकिंग और रिटेल जैसे विभाग आते हैं जो देश की आय और रोजगार सृजन में अग्रणी भूमिका निभाते हैं।
जब किसी देश की जीडीपी बढ़ती है तो इसका अर्थ है कि अर्थव्यवस्था में सकारात्मक माहौल है और नए निवेश आ रहे हैं। इससे बाजार में रोजगार के अवसर पैदा होते हैं और आम लोगों की प्रति व्यक्ति आय में भी सुधार देखने को मिलता है। सरकार की टैक्स वसूली भी बढ़ती है जिससे जनकल्याणकारी योजनाओं और बुनियादी ढांचे के विकास के लिए अधिक धन उपलब्ध हो पाता है।
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हालांकि जीडीपी बढ़ने से देश अमीर होता है, लेकिन यह पूरी तरह से लोगों के जीवन स्तर या खुशहाली का पैमाना नहीं हो सकता। यह आर्थिक उत्पादन को तो मापता है, लेकिन गरीबी, स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता और शिक्षा के स्तर की पूरी जानकारी नहीं देता। इसके बावजूद, प्रति व्यक्ति जीडीपी एक औसत अनुमान जरूर प्रदान करती है कि नागरिक आर्थिक रूप से कितना उत्पादन कर रहे हैं।