Budget Explained: सरकार के 1 रुपये का हिसाब-किताब, कहां से आता है और कहां खर्च होता है? आसान भाषा में समझें
Budget 2026: सरकार कुल कमाई का बड़ा हिस्सा टैक्स से, कुछ नॉन-टैक्स से, और बाकी उधार (कर्ज) से लाती है। सरकार जितना खर्च करती है, उसमें से करीब 35-40% केवल ब्याज और राज्यों को देने में चला जाता है।
- Written By: अर्पित शुक्ला
निर्मला सीतारमण (Image- Social Media)
Government 1 Rupee Spending Breakdown: केंद्र सरकार का बजट यह बताता है कि सरकार अगले वित्तीय वर्ष में कितना पैसा कमाएगी, कहां से कमाएगी और कहां खर्च करेगी। सरकार के हर 1 रुपये का हिसाब-किताब क्या होता है? आइए इसे सरल तरीके से समझते हैं…
सरकार को अलग-अलग योजनाओं और पॉलिसीज चलाने के लिए पैसों की जरूरत होती है – जैसे गरीबों के लिए योजनाएं, हाईवे बनाना, मेट्रो परियोजनाओं पर काम करना, सरकारी कर्मचारियों की सैलरी और रिटायर्ड कर्मचारियों को पेंशन देना। इन सबके लिए टैक्स, सेस और अन्य स्रोतों से पैसा जमा किया जाता है।
सरकार के पास 1 रुपये कहां से आता है?
सरकार की कमाई का बड़ा हिस्सा टैक्स से, कुछ हिस्सा नॉन-टैक्स से और बाकी उधारी (कर्ज) से आता है। सरकार के 1 रुपये का ब्रेकडाउन इस प्रकार है:
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उधार व अन्य देनदारियां – सरकार इस स्रोत से 24 पैसे कमाती है। सरकार बॉन्ड्स, ट्रेजरी बिल्स (T-bills), छोटी बचत स्कीम्स, RBI, बैंकों और विदेशी कर्ज से पैसा उधार लेती है।
इनकम टैक्स – 22 पैसे। यह वेतनभोगी लोगों, फ्रीलांसरों, और व्यवसायों से आता है।
GST और इनडायरेक्ट टैक्स – 18 पैसे। यह सामान और सेवाओं पर लगे टैक्स से आता है।
कॉर्पोरेट टैक्स – 17 पैसे। कंपनियों की कमाई पर लगने वाला टैक्स इसी में आता है।
नॉन-टैक्स रेवेन्यू – 9 पैसे। यह PSU डिविडेंड, ब्याज, लाइसेंस फीस और स्पेक्ट्रम रेवेन्यू से आता है।
सेस – 5 पैसे। पेट्रोल, डीजल, शराब आदि पर लगने वाला सेस इसी में आता है।
कस्टम ड्यूटी – 4 पैसे। यह इंपोर्ट-एक्सपोर्ट पर लगने वाली ड्यूटी से आता है।
कैपिटल रिसीट्स – 1 पैसा। इसमें संपत्ति की बिक्री आदि शामिल है।
कुल मिलाकर, टैक्स से लगभग 60-65% पैसा आता है, लेकिन कर्ज के बिना बजट चलाना मुश्किल है। यही वजह है कि सरकार को फिस्कल डेफिसिट (घाटा) का सामना करना पड़ता है। इसका मतलब है कि सरकार की कमाई से ज्यादा उधारी रहती है।
सरकार 1 रुपये कहां खर्च करती है?
सरकार के खर्च दो प्रकार के होते हैं: रेवेन्यू एक्सपेंडिचर (रोजमर्रा का खर्च) और कैपिटल एक्सपेंडिचर (नई संपत्तियां बनाने में)। यहां देखें, सरकार के खर्च का 1 रुपये में ब्रेकडाउन:
राज्यों को टैक्स व ड्यूटी में हिस्सा – 22 पैसे। इसमें GST और इनकम टैक्स का डेवोल्यूशन शामिल है।
ब्याज भुगतान – 20 पैसे। यह पुराने कर्ज का ब्याज चुकाने के लिए खर्च होता है।
केंद्र सरकार की योजनाएं – 16 पैसे। जैसे PM Awas, PM-KISAN, आयुष्मान भारत जैसी योजनाओं पर सरकार यह पैसा खर्च करती है।
केंद्र सरकार की योजनाएं (केंद्र और राज्य मिलकर) – 8 पैसे।
डिफेंस सेक्टर – 8 पैसे। यह सेना के लिए, हथियारों की खरीद और पेंशन पर खर्च होता है।
राज्यों को किया गया ट्रांसफर – 8 पैसे।
सब्सिडी – 6 पैसे। यह खाद्यान्न, LPG, फर्टिलाइजर जैसी सब्सिडी में खर्च होता है।
पेंशन – 4 पैसे। यह सरकारी कर्मचारियों की पेंशन पर खर्च होता है।
बाकी एक्सपेंस – 8 पैसे। इसमें सैलरी, ऑफिस खर्च और प्रशासनिक खर्च शामिल है।
सरकार के खर्च का लगभग 35-40% हिस्सा सिर्फ ब्याज और राज्यों को हिस्से के भुगतान में चला जाता है, जबकि विकास (इंफ्रास्ट्रक्चर, योजनाएं, रक्षा) के लिए बाकी बचता है।
कर्ज क्यों जरूरी है?
क्योंकि सरकार का टैक्स संग्रह खर्च के मुकाबले कम होता है, इसीलिए सरकार को कर्ज (उधारी) लेना पड़ता है। यही कारण है कि फिस्कल डेफिसिट होता है, जिसे सरकार कम करने की कोशिश करती है।
हाल के बजट में कैपिटल एक्सपेंडिचर (रोड, रेल, एयरपोर्ट आदि निर्माण में) को बढ़ाने पर जोर दिया गया है, जो लंबे समय में अर्थव्यवस्था को मजबूत करेगा।
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भविष्य में क्या बदल सकता है?
यह ब्रेकडाउन लगभग हर साल का औसत पैटर्न है, लेकिन अगर अगले बजट में कोई बड़ा बदलाव (जैसे टैक्स स्लैब में राहत, कैपेक्स बढ़ोतरी) होता है, तो यह थोड़ा बदल सकता है। हालांकि, बेसिक गणना वही रहती है।
