डूबता शेयर बाजार, लुटते निवेशक; सबसे बड़ी ‘IPO-OFS लूट’ का दुष्परिणाम, सरकार मूकदर्शक
IPO OFS: जब भारत सरकार अपनी कंपनियों के IPO केवल 9 से 20 के PE Ratio पर ही लाती है तो फिर निजी कंपनियों को 1000 के महंगे PE Ratio यानी मनमानी कीमतों पर भी IPO लाने की मंजूरी कैसे मिल जाती है?
- Written By: मनोज आर्या
कॉन्सेप्ट फोटो, (सोर्स- AI)
नवभारत के लिए विष्णु भारद्वाज की रिपोर्ट-
Share Market: जैसी की आशंका थी, देश में अब तक की सबसे बड़ी ‘आईपीओ-ओएफएस लूट’ (IPO-OFS Loot) के कारण भारतीय शेयर बाजार (Indian Stock Market) में मंदी का खतरा बढ़ने लगा है। अर्थव्यवस्था की तेज ग्रोथ ( High Economic Growth) के बावजूद शेयर बाजार मंदी के गर्त में धंसता जा रहा है। बीते सप्ताह भी बाजार में घोर मंदी छाई रही। वैसे बाजार में मंदी का यह माहौल अक्टूबर 2024 से ही है। यानी पिछले 16 महीनों से भारतीय शेयर बाजार मंदी से त्रस्त है।
बाजार में लिस्टेड 75% से अधिक कंपनियों के शेयरों में मंदी छाई हुई है और उनके शेयर भाव 20 से 50% तक नुकसान में आ गए हैं। अनेक कंपनियों के शेयर भाव गिरते हुए अपने नए न्यूनतम स्तरों पर आ रहे हैं। बीते शुक्रवार को बीएसई में करीब 190 कंपनियों के शेयर 52 सप्ताह के निचले स्तरों पर लुढ़क गए।
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महंगा आईपीओ में फंड हाउस क्यों कर रहे हैं इंवेस्ट?
मुख्य बेंचमार्क सेंसेक्स और निफ्टी भले ही सर्वोच्च स्तरों से केवल 4% ही नुकसान में हैं, लेकिन बाजार का व्यापक रूख दर्शाने वाला बीएसई स्मॉलकैप, जिसमें 1223 कंपनियों के शेयर शामिल हैं, अपने सर्वोच्च स्तर से 15% नुकसान में आ गया है। बजट के दिन तो स्मॉलकैप 18% और सेंसेक्स-निफ्टी 7% तक नीचे आ गए थे। बाजार के जो वास्तविक हालात हैं, उसको देखते हुए सेंसेक्स 83,300 अंक पर नहीं बल्कि 75,000 अंक के आस-पास आ चुका है। इसके विपरीत अमेरिका, जापान सहित दुनिया के अन्य बड़े देशों के शेयर इंडेक्स नई ऊंचाइयों पर पहुंच रहे हैं।
यह हैरान करने वाली स्थिति तब है जब इंडियन इकोनॉमी के तमाम फैक्टर पॉजिटिव हैं और म्यूचुअल फंड कंपनियों के द्वारा रिटेल निवेशकों का रिकॉर्ड निवेश बाजार में आ रहा है। यहां मंदी होने के पीछे यह तर्क दिया रहा है कि भारत का वैल्यूएशन महंगा है, इसलिए मंदी आ रही है। लेकिन सच्चाई यह नहीं है। सेंसेक्स-निफ्टी का पीई रेशियो (PE Ratio) 20-21 के उचित स्तर पर ही है। और जो फंड हाउस इस वैल्यूएशन को महंगा बता रहे हैं, वे 100-200 से लेकर 1000 पीई रेशियो तक के अत्यधिक महंगे वैल्यूएशन वाली कंपनियों के सार्वजनिक निर्गमों (IPOs) में बेधड़क करोड़ों का इन्वेस्ट क्यों कर रहे हैं? यह बड़ा सवाल है।
इंडेक्स मैनेजमेंट का ‘खेल’, सरकार मूकदर्शक
दरअसल, भारतीय बाजार में सेंसेक्स-निफ्टी को ऊपरी स्तरों पर रख कर इंडेक्स मैनेजमेंट का ‘खेल’ खेला जा रहा है और यह ‘खेल’ सट्टेबाजों और बड़े फंड हाउसेज के ‘कार्टेल’ द्वारा महंगे आईपीओ में रिटेल निवेशकों को लूटने के लिए खेला जा रहा है। इससे इंडिया ग्रोथ स्टोरी (India Growth Story) की हवा निकल रही है। सेबी (SEBI) की ‘खुली छूट’ का नाजायज फायदा उठाकर पिछले 5 साल में मनमानी कीमतों पर लाए गए महंगे आईपीओ से जितनी पूंजी बटोरी गयी है, उतनी तो पिछले 20 साल में भी नहीं जुटायी गयी।
पिछले 5 साल में करीब 360 आईपीओ के जरिए बाजार से रिकॉर्ड 5.50 ट्रिलियन रुपये से अधिक की पूंजी बटोरी गयी है, जो कि वर्ष 2000 से 2020 के बीच 20 साल में 658 आईपीओ के जरिए बटोरी गयी 4.55 ट्रिलियन रुपये की पूंजी से ज्यादा है। बड़ी चिंता की बात यह कि इसमें से 3.50 ट्रिलियन रुपये यानी 65% ऑफर फॉर सेल (OFS) की राशि है, जो करोड़ों रिटेल निवेशकों की हाथ से निकल कर सीधे पूंजीपतियों और विदेशियों की जेबों में चली गयी है। दूसरी चिंताजनक बात यह है कि करीब 45% आईपीओ में करोड़ों निवेशकों को नुकसान उठाना पड़ा है। आश्चर्य की बात यह है कि अब तक की इस सबसे बड़ी ‘आईपीओ-ओएफएस लूट’ पर नियामक सेबी और सरकार मूकदर्शक बनी हुई है।
IPO-OFS में नुकसान का अध्ययन कब कराएगी सेबी?
पिछले सप्ताह सेबी प्रमुख तुहिन कांत पांडे ने एक कार्यक्रम में बड़े गर्व के साथ कहा कि पिछले 10 वर्षों में भारत का बाजार पूंजीकरण 4 गुना से अधिक बढ़कर 470 लाख करोड़ रुपये से ऊपर पहुंच गया है। वित्त वर्ष 2024-25 में इक्विटी और ऋण निर्गमों के जरिये 14.3 लाख करोड़ रुपये जुटाए गए, जबकि वित्त वर्ष 2025-26 की अप्रैल-जनवरी अवधि में यह आंकड़ा 11.6 लाख करोड़ रुपये रहा। वर्ष 2025 में देश ने आईपीओ गतिविधि में वैश्विक स्तर पर अग्रणी स्थान हासिल किया और जुटाई गई राशि के मामले में तीसरे स्थान पर रहा। लेकिन सेबी प्रमुख ने यह नहीं बताया कि इन रिकॉर्ड संख्या में लाए गए महंगे आईपीओ में देश के कितने करोड़ रिटेल निवेशकों को कितना भारी नुकसान हुआ, उनकी कितनी जमा-पूंजी साफ हुई।
सेबी ने पिछले साल एक अच्छा अध्ययन तो किया कि फ्यूचर-ऑप्शन ट्रेडिंग (F&O) में 90% से अधिक रिटेल निवेशकों को भारी नुकसान हुआ। इसलिए F&O ट्रेडिंग पर अंकुश लगाया जा रहा है। सेबी और सरकार का यह कदम सराहनीय है, लेकिन सेबी यह अध्ययन कब कराएगी कि जब से उसने आईपीओ में कीमत तय करने की छूट मर्चेंट बैंकर (Merchant Bankers) और कंपनी प्रमोटरों (Promoters) को दी है, तब से लेकर अब तक आए हजारों महंगे आईपीओ में रिटेल निवेशकों और म्यूचुअल फंडों (Mutual Funds) के जरिए इन्वेस्ट करने वाले निवेशकों को कितने अरबों का नुकसान हुआ है? और क्यों फंड हाउस इतने महंगे वैल्यूएशन (High Valuations) पर रिटेल निवेशकों की पूंजी दांव पर लगा रहे हैं?
अंधेर नगरी और चौपट राजा…
आईपीओ मार्केट में कितनी अंधेरगर्दी है, इसका एक ताजा ज्वलंत उदाहरण पिछले माह जनवरी में आए भारत कोकिंग कोल (Bharat Coking Coal) तथा शेडोफेक्स टेक्नोलॉजी (Shadowfax Technologies) के आईपीओ हैं। भारत सरकार की 50 साल पुरानी लाभप्रद मजबूत कंपनी भारत कोकिंग कोल का 1068 करोड़ का आईपीओ मात्र 9 के पीई रेशियो यानी काफी उचित मूल्य पर लाया गया। 1240 करोड़ का वार्षिक लाभ कमाने वाली इस कंपनी की आईपीओ कीमत सिर्फ 23 रुपये रखी गयी। नतीजन निवेशकों को इसमें पहले ही दिन 77% का अच्छा फायदा हुआ।
इसके विपरीत 9 साल पुरानी निजी कंपनी शेडोफेक्स का 1907 करोड़ रुपये का आईपीओ 1020 के रिकॉर्ड महंगे पीई रेशियो पर लाया गया। मात्र 6 करोड़ का वार्षिक लाभ कमाने वाली इस लॉजिस्टिक्स कंपनी की आईपीओ कीमत 124 रुपये रखी गयी। नतीजन पहले ही दिन 9% नुकसान में लिस्ट होने के बाद इसका शेयर नीचे में 98 रुपये तक गिरा। यह सब जानते हैं कि पूरा शेयर बाजार वैल्यूएशन पर ही चलता है तो फिर मामूली लाभ कमाने वाली शेडोफेक्स को 1020 के अत्यधिक महंगे PE Ratio पर आईपीओ की अनुमति किस आधार पर दी गयी? यह बहुत गंभीर और चिंताजनक मसला है। इस तरह की अंधेरगर्दी के अनेक मामले हैं।
पेटीएम और ओला के आईपीओ में निवेशकों के करोड़ों डूबे
आज से 4 साल पहले भारी घाटे से त्रस्त पेटीएम के 18,000 करोड़ रुपये के आईपीओ को 2150 रुपये की सबसे महंगी कीमत पर लाने की मंजूरी दी गयी थी और तब उसमें करीब 10 लाख रिटेल निवेशकों को लूटा गया। आज 4 साल बाद भी पेटीएम का शेयर 47% के भारी नुकसान के साथ 1126 रुपये ही है और नीचे में तो यह 341 रुपये तक गिरा था। बड़ा सवाल यह है कि 10 लाख निवेशकों को हुए इस भारी नुकसान के दोषियों पर आज तक सेबी ने एक्शन क्यों नहीं लिया? जिन फंड हाउस ने पेटीएम (Paytam), ओला (Ola) या अन्य किसी काफी महंगे आईपीओ में करोड़ों इन्वेस्ट किए, क्या उन्हें इतनी भी समझ नहीं है या कोई ‘स्वार्थ’ में रिटेल निवेशकों का नुकसान किया?
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महंगे आईपीओ की मंजूरी पर बड़ा सवाल
जब केंद्र सरकार अपनी प्रॉफिट मेकिंग कंपनियों के सभी आईपीओ केवल 9 से 20 के पीई रेशियो यानी बहुत ही उचित मूल्य पर लाती है तो फिर मामूली प्रॉफिट कमाने वाली या घाटे वाली निजी कंपनियों को इतनी महंगी कीमतों पर आईपीओ लाने की मंजूरी कैसे मिल जाती है? क्या इस ‘अंधी लूट’ पर सेबी या वित्त मंत्री अंकुश लगाएंगी?
नवभारत के लिए विष्णु भारद्वाज की रिपोर्ट-
