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नीतीश की कुर्सी को लेकर बना सस्पेंस! पप्पू यादव ने बताया BJP का मकसद…बिहार में आ गया सियासी भूचाल
Nitish Kumar: नीतीश कुमार सोमवार को राज्यपाल से तो मिले लेकिन सरकार बनाने का दावा नहीं पेश किया। जिसके बाद यह अटकलें लगाई जाने लगीं कि वे डरे हुए हैं और भाजपा गुप्त रूप से कोई बड़ी योजना बना रही है।
- Written By: अभिषेक सिंह

कॉन्सेप्ट फोटो (डिजाइन)
Bihar Politics: नीतीश कुमार सोमवार को राज्यपाल से तो मिले लेकिन सरकार बनाने का दावा नहीं पेश किया। जिसके बाद यह अटकलें लगाई जाने लगीं कि वे डरे हुए हैं और भाजपा गुप्त रूप से कोई बड़ी योजना बना रही है। सांसद पप्पू यादव ने महागठबंधन की ओर से नीतीश को तुरंत घर वापसी का प्रस्ताव दिया।
कांग्रेस नेता पप्पू यादव ने कहा कि यह नीतीश कुमार की कृपा थी कि भाजपा 89 पर रुक गई। वरना उनका लक्ष्य 105 था। दोनों मिलकर सरकार बनाना चाहते थे। पप्पू यादव के इस बयान के बाद बिहार के राजनीतिक गलियारों में खलबली मच गई है।
इस्तीफा देते हुए क्यों बदला मन?
पप्पू यादव ने जो कहा कि उस पर महागठबंधन की ओर से कोई बयान जारी नहीं किया गया। लेकिन सवाल जरूर उठे। क्या नीतीश को भाजपा पर शक हो गया है? इस्तीफा देते समय उन्होंने अपना मन क्यों बदल लिया? उन्होंने विधानसभा भंग करने की तारीख 19 नवंबर क्यों बताई? जदयू विधायक दल की बैठक क्यों टाल दी गई?
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एनडीए नेता दे चुके हैं ये बयान
एनडीए के पांच दलों में से तीन के शीर्ष नेताओं ने पहले ही कह दिया है कि नीतीश ही मुख्यमंत्री होंगे। चिराग पासवान, जीतन राम मांझी और उपेंद्र कुशवाहा ने नीतीश कुमार के नाम का समर्थन किया है। यहां तक कि भाजपा के उप-मुख्यमंत्री विजय सिन्हा ने भी कहा है कि नीतीश के मुख्यमंत्री बनने को लेकर कोई संशय नहीं है।
आखिर क्यों बना हुआ है सस्पेंस?
इसके बावजूद मुख्यमंत्री के मुद्दे पर सस्पेंस बना हुआ है, क्योंकि बिहार में भाजपा नेता खुलकर बोल रहे हैं, जबकि दिल्ली में बैठे नेता खामोश हैं। कल तीनों नेताओं ने प्रधानमंत्री आवास पर तीन घंटे बैठक की, लेकिन कोई खबर सामने नहीं आई। एनडीए नेताओं का पटना स्थित नीतीश कुमार के घर आना-जाना बढ़ गया है, लेकिन वहां से भी कोई खबर सामने नहीं आ रही है।
43 से 85 पर पहुंच गई जदयू
एनडीए ने बिहार चुनाव नीतीश कुमार के नेतृत्व में लड़ा था, जिससे वे मुख्यमंत्री पद के प्रमुख दावेदार बन गए थे। भाजपा 89 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी, लेकिन यह भूलना नामुमकिन है कि जेडीयू ने भी अपनी सीटें 43 से बढ़ाकर 85 कर लीं। स्थिति यह है कि नीतीश कुमार बिहार की राजनीतिक धुरी हैं। वे सबसे स्वीकार्य नेता हैं। “सुशासन बाबू” के रूप में उनकी छवि ने एनडीए के जनादेश में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
केन्द्र सरकार को भी समर्थन
नीतीश की सीटें भाजपा से केवल चार कम हैं। जेडीयू दोगुनी ताकत के साथ वापस आई है। केंद्र में एनडीए सरकार जेडीयू के 12 सांसदों के समर्थन पर टिकी है। पिछली बार नीतीश कुमार की पार्टी के पास 43 सीटें थीं। फिर भी, 74 सीटों वाली भाजपा ने मुख्यमंत्री पद नीतीश के लिए छोड़ दिया।
नीतीश जरूरी भी, मजबूरी भी
लेकिन इस बार मुख्यमंत्री पद को लेकर इतना सस्पेंस क्यों है? क्या भाजपा अब अपने मुख्यमंत्री पर अड़ने की स्थिति में है? हिंदी पट्टी में बिहार इकलौता ऐसा राज्य है जहां भाजपा 35 सालों से अपने मुख्यमंत्री का सपना देख रही है। लेकिन हर बार नीतीश उसके लिए ज़रूरी भी बन जाते हैं और मजबूरी भी।
यह भी पढ़ें: बड़ी जीत पर बड़ा बखेड़ा…बिहार में BJP-JDU के बीच एक कुर्सी की जंग, नीतीश की हरकत से खड़े हुए सवाल
भाजपा के पास सिर्फ 3 ऑप्शन
ऐसे में बीजेपी के पास महज तीन विकल्प बचते हैं। पहला ये कि नीतीश कुमार CM बनाकर ताकतवर मंत्रालय अपनी झोली में रख ले। तब तक इंतजार करे, जब तक नीतीश संन्यास का एलान नहीं कर देते। 2030 विधानसभा चुनाव तक सब्र कर और अकेले लड़कर पूर्ण बहुमत जुटाए।
Nitish kumar position in doubt pappu yadav statement triggers political storm in bihar
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