दुनिया में तीसरे विश्व युद्ध की आशंका। इमेज-एआई 
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इस साल मचेगी तबाही! तीसरे विश्व युद्ध की ओर बढ़ रही दुनिया, अमेरिका-यूरोप की क्या भूमिका?

Third World War : इस साल की शुरुआत के साथ अंतरराष्ट्रीय राजनीति खतरनाक मोड़ पर पहुंच चुकी है। अमेरिका, रूस, चीन, ईरान जैसे देशों के बीच बढ़ते टकराव ने तीसरे विश्व युद्ध की आशंका को गंभीर बनाया है।

रंजन कुमार

Global Tensions : साल 2026 की दहलीज पर खड़ी दुनिया इस वक्त एक ऐसी बारूद की ढेर पर बैठी नजर आ रही है, जहां जरा सी चिंगारी भी महाविनाश का कारण बन सकती है। अमेरिका, रूस, चीन और ईरान जैसी महाशक्तियों के बीच गहराता मनमुटाव अब केवल कूटनीतिक बयानों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसने तीसरे विश्व युद्ध की आहट को तेज कर दिया है।

हैरानी की बात है कि कभी बर्फ की चादर से ढका और शांत रहने वाला ग्रीनलैंड अब वैश्विक राजनीति के केंद्र में आ गया है। अमेरिका की बढ़ती दिलचस्पी और यूरोपीय देशों की सैन्य सक्रियता ने इस क्षेत्र को रणनीतिक संघर्ष का नया अखाड़ा बना दिया है। आर्कटिक संसाधनों पर कब्जे की होड़ ने इसे दुनिया के सबसे संवेदनशील इलाकों में शामिल कर दिया है।

यूक्रेन संकट: पांचवें साल की दहलीज पर

रूस-यूक्रेन युद्ध अब अपने पांचवें साल में प्रवेश कर चुका है। रूस की निरंतर बढ़त और नाटो देशों की सीधी सैन्य भागीदारी की संभावना ने इस क्षेत्रीय संघर्ष को वैश्विक युद्ध के मुहाने पर खड़ा कर दिया है। यह लड़ाई अब केवल दो सीमाओं के बीच की नहीं, बल्कि विचारधाराओं और अस्तित्व की जंग बन चुकी है।

सुलगते हुए अन्य मोर्चे: ताइवान, ईरान और कोरियाई प्रायद्वीप

ताइवान जलडमरूमध्य : चीन की बढ़ती सैन्य घेराबंदी और अमेरिका की रक्षात्मक नीतियों के बीच ताइवान एक ऐसे नाजुक मोड़ पर है, जहां छोटी सी सैन्य चूक पूरे प्रशांत क्षेत्र में आग लगा सकती है।

मध्य पूर्व (ईरान) : ईरान के परमाणु कार्यक्रम और अमेरिका की सैन्य चेतावनियों ने पश्चिम एशिया को अस्थिर कर दिया है। यदि यहां युद्ध छिड़ता है, तो इसकी लपटें कई देशों को अपनी चपेट में ले लेंगी।

कोरियाई प्रायद्वीप : युद्ध विराम के बावजूद उत्तर और दक्षिण कोरिया के बीच अविश्वास की खाई इतनी गहरी है कि वहां की आक्रामक बयानबाजी कभी भी परमाणु युद्ध का रूप ले सकती है।

वैश्विक व्यवस्था का पतन और कूटनीति की चुनौती

आज के दौर में संयुक्त राष्ट्र (UN) जैसी संस्थाएं काफी कमजोर नजर आ रही हैं। नियम-आधारित व्यवस्था के चरमराने से शक्तिशाली देशों को अपनी मनमानी करने का अवसर मिल गया है। इतिहास इस बात का प्रमाण है कि जब कई मोर्चों पर एक साथ तनाव बढ़ता है तो विश्व व्यवस्था को बिखरने में वक्त नहीं लगता। विशेषज्ञों का मानना है कि 2026 या तो सुलह और समझदारी का साल बनेगा या फिर एक ऐसे आत्मघाती संघर्ष का गवाह, जिसका खामियाजा आने वाली कई पीढ़ियों को भुगतना होगा। यह समय दुनिया के नेताओं के लिए अपनी रणनीतियों से ऊपर उठकर मानवता के बारे में सोचने का है।

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