लिंडसे क्लैंसी (सोर्स- सोशल मीडिया)
विदेश

Explainer: क्या है पोस्टपार्टम साइकोसिस? एक मां को अपने ही बच्चों को मारने पर कर सकता है मजबूर

What is Postpartum Psychosis: लिंडसे क्लैंसी केस ने पोस्टपार्टम साइकोसिस को चर्चा में ला दिया है। जानिए यह गंभीर मानसिक स्थिति क्या है, इसके लक्षण क्या हैं और यह पोस्टपार्टम डिप्रेशन से कैसे अलग है।

अक्षय साहू

Lindsay Clancy Case: अमेरिका में इन दिनों पोस्टपार्टम साइकोसिस को लेकर एक कानूनी जंग चल रही है। जिसकें केंद्र में है एक 36 वर्षीय मां लिंडसे क्लैंसी, जिसने अपने ही तीन मासूम बच्चों की जान ले ली और अब अदालत में उसके वकील यह साबित करने की कोशिश कर रहे हैं कि क्लैंसी पोस्टपार्टम साइकोसिस से पीड़ित थी, जो एक दुर्लभ और गंभीर मानसिक बीमारी है जो बच्चे के जन्म के बाद हो सकती है। 

वहीं, सरकारी वकील ने दावा किया है कि, क्लैंसी को पता था कि वह क्या कर रही है और उसने अपने तीन बच्चों को मारने का सोचा-समझा फैसला लिया। इस हाई-प्रोफाइल ट्रायल खत्म हो गया है और बीते शुक्रवार को लिंडसे क्लैंसी के वकील ने अदालत में अपनी दलीलें पेश की। इस केस ने लोगों के सामने कई सवाल खड़े कर दिए हैं, पोस्टपार्टम साइकोसिस क्या है? क्या यह एक महिला की सोच और व्यवहार को इस हद तक प्रभावित कर सकता है कि वह अपने ही बच्चों को नुकसान पहुंचाने लगे? और कैसे पता कर सकते हैं कि महिला पोस्टपार्टम साइकोसिस का शिकार है या नहीं?  

क्या है लिंडसे क्लैंसी का मामला? 

लिंडसे क्लैंसी अमेरिका के मैसाचुसेट्स राज्य की रहने वाली हैं। साल 2023 में पुलिस ने उन्हें अपने तीन बच्चों की मौत के मामले में गिरफ्तार किया था। उनके बच्चों के नाम कोरा, डॉसन और कैलन थे। उनकी उम्र क्रमशः 5 साल, 3 साल और 8 महीने थी। मामला सामने आने के बाद पूरे अमेरिका में काफी चर्चा हुई। बहुत से लोगों के लिए यह समझना मुश्किल था कि कोई मां अपने बच्चों को नुकसान कैसे पहुंचा सकती है। सोशल मीडिया पर भी क्लैंसी के खिलाफ कई तरह की प्रतिक्रियाएं सामने आईं।

अदालत में सुनवाई के दौरान लिंडसे क्लैंसी

पोस्टपार्टम साइकोसिस क्या होता है?

केस वेस्टर्न यूनिवर्सिटी में फोरेंसिक और रिप्रोडक्टिव साइकेट्रिस्ट सुसान हैटर्स-फ्रीडमैन के मुताबिक, साइकोसिस को आसान भाषा में समझाया जाए, तो यह एक ऐसी स्थिति है जिसमें व्यक्ति का वास्ताविकता से संपर्क कमजोर हो जाता है या टूट जाता है। इस दौरान व्यक्ति को हैलुसिनेशन, डिल्यूज, कई दिनों तक बिल्कुल नींद न आना, गंभीर उदासी और असामान्य व्यवहार जैसी समस्याएं हो सकती हैं। 

गंभीर मानसिक स्थिति है पोस्टपार्टम साइकोसिस

पोस्टपार्टम साइकोसिस महिलाओं में बच्चे के जन्म के बाद होने वाली एक दुर्लभ और गंभीर बीमारी है। इसमें महिला को ऐसी चीजें दिखाई या सुनाई दे सकती हैं जो वास्तव में मौजूद ही नहीं हैं। लिंडसे क्लैंसी के वकीलों का दावा है कि उन्होंने अपने बच्चों की हत्या हैलुसिनेशन में की। यानी उन्होंने जब अपने बच्चों को मारा, तब वह यह नहीं पता था कि वो क्या कर रही है।  

पोस्टपार्टम साइकोसिस के प्रमुख लक्षण

  • भ्रम और गलत विश्वास

  • ऐसी आवाजें सुनाई देना जो वास्तव में मौजूद नहीं हैं

  • बहुत ज्यादा चिड़चिड़ापन या मूड में तेज बदलाव

  • अत्यधिक उदासी या असामान्य उत्साह

  • नींद न आना

  • उलझन और कन्फ्यूजन

  • सोचने और वास्तविकता को समझने में परेशानी

पोस्टपार्टम साइकोसिस के लक्षण

पोस्टपार्टम साइकोसिस आमतौर पर बच्चे के जन्म के बाद तेजी से विकसित हो सकता है। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि इसके लक्षण हमेशा एक जैसे नहीं रहते। कभी व्यक्ति सामान्य दिखाई दे सकता है और कुछ समय बाद उसकी सोच या व्यवहार में गंभीर बदलाव आ सकता है।

पोस्टपार्टम डिप्रेशन से यह कितना अलग है?

पोस्टपार्टम साइकोसिस के अलावा महिलाओं में बच्चे के जन्म के बाद पोस्टपार्टम डिप्रेशन की बीमारी का भी शिकार हो सकती हैं। पोस्टपार्टम डिप्रेशन और पोस्टपार्टम साइकोसिस एक जैसी बीमारी नहीं है। पोस्टपार्टम डिप्रेशन को पोस्टपार्टम साइकोसिस के मुकाबले कम गंभीर माना जाता है। इसमें महिलाएं लगातार उदास रह सकती हैं, किसी काम में रुचि कम हो सकती है, थकान महसूस हो सकती है, कम नींद आना या नींद नहीं आना, भूख में बदलाव और ध्यान लगाने में परेशानी जैसी समस्याएं हो सकती हैं। 

पोस्टपार्टम साइकोसिस और पोस्टपार्टम डिप्रेशन अलग-अलग मानसिक बीमारी

पोस्टपार्टम डिप्रेशन की तुलना में पोस्टपार्टम साइकोसिस ज्यादा गंभीर और दुर्लभ बीमरी है। इसमें व्यक्ति का वास्तविकता से संपर्क प्रभावित हो सकता है। उदाहरण के लिए उसे ऐसी आवाजें सुनाई दे सकती हैं जो मौजूद नहीं हैं या उसे ऐसे विश्वास हो सकते हैं जिनका वास्तविकता से कोई संबंध नहीं है। इसलिए दोनों स्थितियों को एक जैसा समझना सही नहीं है।

क्लैंसी के वकील ने अदालत में क्या कहा? 

क्लैंसी के वकील ने अदालत में उसकी मानसिक स्थिति को लेकर कई खुलासे किए। उन्होंने बताया कि क्लैंसी के बच्चे के जन्म के बाद उनमें हैलुसिनेशन और भ्रम जैसे लक्षण दिखाई देने लगे थे।

क्लैंसी के पूर्व पति पैट्रिक ने इस मामले में अदालत में गवाही दी है। पैट्रिक ने कोर्ट को बताया कि इससे पहले भी जब क्लैंसी मां बनी थी, तब बच्चे के जन्म के बाद वह बहुत उदास हो गई थीं। उनके मुताबिक, समय के साथ उनकी मानसिक स्थिति लगातार खराब होती गई और बच्चों की मौत से लगभग एक महीने पहले उनकी परेशानी काफी बढ़ गई थी। 

विशेषज्ञों की राय अलग? 

विशेषज्ञों के मुताबिक साइकोसिस से पीड़ित इंसान हमेशा बाहर से असामान्य या पूरी तरह अस्त-व्यस्त दिखाई दे, ऐसा जरूरी नहीं है। कोई व्यक्ति भ्रम या आवाजें सुनने के बाद भी कुछ सामान्य काम कर सकता है। किसी काम की योजना बना सकता है और अपने व्यवहार को व्यवस्थित भी कर सकता है। यही बात इस मामले को कानूनी रूप से जटिल बनाती है। 

लिंडसे क्लैंसी केस में विशेषज्ञों की राय अहम

विशेषज्ञों का मानना है कि पोस्टपार्टम साइकोसिस का अर्थ यह नहीं है कि महिला अपने बच्चे या किसी और को नुकसान पहुंचाएगी। पोस्टपार्टम साइकोसिस हिंसा का दूसरा नाम नहीं है। अधिकतर मानसिक बीमारी से पीड़ित लोग हिंसक नहीं होते हैं। ऐसे में किसी महिला का पोस्टपार्टम साइकोसिस से ग्रस्त होने का मतलब यह नहीं निकाला जा सकता कि वह अपने बच्चे को नुकसान पहुंचाएगी। हालांकि उसे इस बीमारी के चलते वास्तविकता समझने में इतनी परेशानी हो सकती है। वह ऐसा काम कर सकती है जो वह सामान्य मानसिक स्थिति में कभी नहीं करेगी। 

अदालत के सामने सबसे बड़ा सवाल क्या है?

किसी व्यक्ति को पोस्टपार्टम साइकोसिस का मेडिकल डायग्नोसिस मिलने से यह साबित नहीं होता कि वह कानूनी रूप से अपराध के लिए जिम्मेदार नहीं है। अदालत के सामने यह सवाल है कि वह यह देखे कि अपराध के समय बीमारी ने व्यक्ति की सोच और निर्णय लेने की क्षमता को किस तरह प्रभावित किया।

लिंडसे क्लैंसी मामले में भी अदालत के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या अपराध के समय वह मानसिक बीमारी या मानसिक कमी के कारण अपने काम की गलतता या उसकी आपराधिक प्रकृति को समझने में सक्षम थी।

इस मामले में जूरी क्या देखेगी?

लिंडसे क्लैंसी के मामले में जूरी को उनकी मानसिक बीमारी से जुड़े सबूतों के साथ-साथ उनके व्यवहार और उस समय किए गए कामों को भी देखना होगा। विशेषज्ञ यह बता सकते हैं कि उनके लक्षण क्या थे और बीमारी उनकी सोच को किस तरह प्रभावित कर सकती थी। लेकिन अंतिम फैसला जूरी को करना है।

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