नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह (सोर्स-सोशल मीडिया) 
विदेश

नेपाल के पीएम बालेन शाह ने फिर छेड़ा Border Dispute! भारत-नेपाल की इस तनातनी के बीच आखिर कहां खड़ा है चीन?

Nepal Border Dispute: नेपाली के प्रधानमंत्री बालेन शाह ने भारत-नेपाल सीमा विवाद पर कहा कि दोनों देशों ने एक-दूसरे की जमीन पर कब्जा किया है। इस मामले में उन्होंने चीन को भी शामिल करने की बात कही है।

प्रिया सिंह

Nepal PM Balen Shah Statement On Border Dispute: नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह ने अपनी संसद में भारत-नेपाल सीमा विवाद पर एक बहुत ही विवादित बयान दिया है। उनके इस नए बयान ने दक्षिण एशियाई कूटनीति में एक नई और बड़ी बहस छेड़ दी है। बालेन शाह के इस बयान को दोनों देशों के संबंधों के लिए काफी अहम और चुनौतीपूर्ण माना जा रहा है।

संसद में बालेन शाह ने कहा कि जमीन पर कब्जे का यह पूरा मामला बिल्कुल भी एकतरफा नहीं है। उन्होंने दावा किया कि नेपाल ने भी कई जगहों पर भारत की कुछ जमीन पर अपना कब्जा किया हुआ है। उन्होंने इस पुराने विवाद में चीन और ब्रिटेन को भी शामिल करने की जोरदार वकालत की है।

विपक्ष का भारी विरोध

बालेन शाह के इस बयान पर नेपाली कांग्रेस और कम्युनिस्ट पार्टी जैसी मुख्य विपक्षी पार्टियों ने तीखी आपत्ति जताई है। विपक्ष ने प्रधानमंत्री के इस चौंकाने वाले बयान को पूरी तरह से राष्ट्रहित के खिलाफ बताया है। इन पार्टियों ने संसद के रिकॉर्ड से प्रधानमंत्री के इस बयान को तुरंत हटाने की सख्त मांग की है। विवाद बढ़ता देख नेपाल के विदेश मंत्रालय को तुरंत ही अपना डैमेज कंट्रोल मोड पूरी तरह से अपनाना पड़ा है। मंत्रालय ने सफाई दी है कि प्रधानमंत्री के इस बयान का मतलब किसी भी औपचारिक क्षेत्रीय दावे से नहीं था। वे केवल दशगजा क्षेत्र और वहां गायब हुए सीमा स्तंभों के कारण हुए अनजाने कब्जे का जिक्र कर रहे थे।

सुगौली संधि का जिक्र

नेपाल लिपुलेख क्षेत्र पर अपना दावा 1816 की ऐतिहासिक सुगौली संधि की अपनी पुरानी व्याख्या पर आधारित करता है। कालापानी, लिम्पियाधुरा और लिपुलेख क्षेत्र पर इस बड़े विवाद की चर्चा के दौरान ही ये टिप्पणियां की गई हैं। यह क्षेत्र भारत, नेपाल और तिब्बत के त्रि-जंक्शन के पास स्थित एक बहुत ही ज्यादा रणनीतिक इलाका है।

भारत-नेपाल सीमा विवाद और विशेषकर लिपुलेख दर्रे को लेकर चीन का रुख हमेशा बेहद रणनीतिक और संतुलित रहा है। चीन का आधिकारिक रुख है कि यह सिर्फ भारत और नेपाल के बीच का एक द्विपक्षीय मुद्दा है। चीन इसमें सीधे तौर पर मध्यस्थ बनने से बचता है और दोनों देशों को आपसी बातचीत से सुलझाने की सलाह देता है।

आगे की बड़ी चुनौती

भारत और नेपाल के बीच लगभग 97 प्रतिशत सीमा विवाद पहले ही पूरी तरह से सुलझ चुका है। बची हुई 3 प्रतिशत सीमा जिसमें कालापानी और सुस्ता शामिल हैं, उसे भी बातचीत से आसानी से सुलझाया जा सकता है। भारत के लिए अब सबसे बड़ी चुनौती चीन को इस क्षेत्र में किसी भी रणनीतिक बढ़त से रोकना है।

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